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लखनऊ

सीएम अखिलेश की घोषणाओं को नौकरशाह नजरअंदाज कर रहे हैं?

हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घोषणा की है कि किसानों को भूमि अधिग्रहण मूल्य सर्किल रेट से छह गुना अधिक दिया जायेगा। पर यहाँ जो अहम् सवाल खड़ा है वो ये कि कैसे दिया जायेगा? जबकि अभी तक सपा सरकार ने नई भूमि अधिग्रहण नीति घोषित ही नहीं की है। घोषित होना तो दूर इस नीति के लिए गठित समिति ने अभी तक इसका ड्राफ्ट भी नहीं तैयार किया है। फिर भी मुख्यमंत्री अखिलेश शान से ये घोषणा कर रहे है कि वो किसानों को उनकी भूमि का मूल्य सर्किल रेट से 6 गुना ज्यादा देंगे।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घोषणा की है कि किसानों को भूमि अधिग्रहण मूल्य सर्किल रेट से छह गुना अधिक दिया जायेगा। पर यहाँ जो अहम् सवाल खड़ा है वो ये कि कैसे दिया जायेगा? जबकि अभी तक सपा सरकार ने नई भूमि अधिग्रहण नीति घोषित ही नहीं की है। घोषित होना तो दूर इस नीति के लिए गठित समिति ने अभी तक इसका ड्राफ्ट भी नहीं तैयार किया है। फिर भी मुख्यमंत्री अखिलेश शान से ये घोषणा कर रहे है कि वो किसानों को उनकी भूमि का मूल्य सर्किल रेट से 6 गुना ज्यादा देंगे।

वास्तव में इस तरह की घोषणा ये साबित करती है सरकार और प्रशासन में आपसी समनवय की कमी है। क्योंकि यदि सरकार और प्रशासन में समन्वय ठीक होता तो सरकार के मुखिया हमारे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ये पता होता कि बिना नयी नीति बने किसानों को उनकी जमीन की कीमत सर्किल रेट से 6 गुना जयादा नहीं दी जा सकती है। हाँ ये हो सकता है कि जो भूमि अधिग्रहण नीति मायावती शासन में 2 मई 2011 को लागू हुई थी और उसी के अनुरूप जो सर्किल रेट निर्धारित है सपा सरकार उसका 6 गुना ज्यादा मूल्य किसानों को दे दें।

सनद हो कि 2 मई 2011 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के नेतृत्‍व में प्रदेश में नई भूमि अधिग्रहण नीति लागू हुई थी। इस भूमि अधिग्रहण नीति को तीन हिस्सों में बांटा गया था। पहला निजी क्षेत्र के लिए दूसरा बुनियादी जरूरतों के लिए और तीसरा विकास प्राधिकरणों और औद्योगिक विकास प्राधिकरणों के लिए अधिग्रहण। इस भूमि अधिग्रहण नीति के अनुसार निजी कंपनियों को किसानों से सीधे जमीन खरीदनी थी, वह भी आपसी सहमति के आधार पर। किसानों से विकासकर्ता को ही जमीन की रजिस्ट्री करना था। इसमें सरकार की सिर्फ मध्यस्थ की भूमिका थी। सरकार को सिर्फ भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी करनी थी। इसके साथ ही इस भूमि अधिग्रहण नीति में इस बात का प्रावधान किया था कि निजी कंपनियां किसानों की जमीन का अधिग्रहण तब तक नहीं कर सकती, जब तक उस क्षेत्र के 70 फीसदी किसान इसके लिए राजी न हों। यदि 70 प्रतिशत किसान सहमत नहीं होते हैं तो परियोजना पर पुनर्विचार किया जाएगा। मायावती सरकार की इस नीति में जमीनों की कीमत पर किसानों को आपत्ति थी। किसानों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया जिसका फ़ायदा उठाते प्रदेश की समस्त विपक्षी पार्टियों ने इस नई भूमि अधिग्रहण नीति की आलोचना की थी। उस समय विपक्ष में बैठी समाजवादी पार्टी ने तो बाकायदा इसे अपना चुनावी मुद्दा बनाया था और घोषणा की थी कि यदि 2012 के विधानसभा चुनावों के बाद वो प्रदेश की सत्ता में आयी तो इस नीति की जगह पर नयी नीति बनायेगी और उस नई नीति के आधार पर किसानों को उनकी जमीन का मूल्य देगी।

अपने वायदे के अनुसार समाजवादी पार्टी ने किसानों को उनकी जमीन का मूल्य सर्किल रेट से 6 गुना ज्यादा देने की घोषणा भी कर दी। पर इस घोषणा को अमलीजामा पहनने के लिए जिम्मेदार राजस्व विभाग के पास अभी तक इस संदर्भ में नयी नीति नहीं है। राजस्व विभाग की लापरवाहियों और नयी नीति बनाने के गठित समिति के गैर जिमेदार रवैयो के चलते मुख्यमंत्री की इस घोषणा का किसानों को हाल फिलहाल कोई लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। हालांकि यह पहली बार नहीं हो रहा जब मुख्यमंत्री ने कोई घोषणा की हो और उसको अमलीजामा पहनने वाले विभाग ने लापरवाही न की हो। सवाल ये है कि आखिर वो कौन से कारण हैं जिनके चलते मुख्यमंत्री की ही घोषणाओं को नौकरशाह नजरअंदाज कर रहे हैं? जवाब साफ़ है कि सत्ता में आने के लगभग 11 महीने बाद भी युवा मुख्यमंत्री नौकरशाही पर अपनी पकड़ नहीं बना पाए जिसके चलते बे-लगाम नौकरशाही अपने मन मर्जी से काम कर रही है।

अगले महीने मार्च में ये सरकार अपने एक साल पूरे कर लेगी। एक साल पूरे होने पर सरकार की तरफ से बड़े ही जोश के साथ एक साल उपलब्धियां रखी जाएँगी। सुशासन और विकास के बड़े बड़े दावे किये जायेंगे जिनमें आधी से ज्यादा दावे सिर्फ कागजी होंगे, जिनका जमीनी रूप में कोई आकार नहीं होगा। पर मुख्यमंत्री को इससे क्या मतलब कि कितने दावें सही हैं और कितने गलत? उन्हें तो वही दिखता है जो नौकरशाह दिखाते हैं। साथ में चलने वाले सचिव ने जो भाषण लिख दिया वो मुख्मंत्री ने बोल दिया। किसी जनसभा में कार्यकर्ताओं ने जोश भर तो फिर लगा दी घोषणाओं की झड़ी, उनका घोषणाओं पर कितना अमल हुआ और कितना नहीं ये जानने की फुर्सत मुख्यमंत्री के पास नहीं है।

कुछ यही हाल सपा की नई भूमि अधिग्रहण नीति का है जो पिछले 11 महीने से कछुए की चाल चल रही है। ये नीति कब बनेगी, कब लागू होगी इस संदर्भ कोई भी अधिकारी बोलने को तैयार नहीं है। हाँ ये पूछने पर कि मुख्यमंत्री की घोषणा का क्या होगा कुछ अधिकारी दबी जुबान कहते हैं कि कुछ नहीं होगा तो जो नीति बनी है यानि (मायावती शासन) की नीति उसी के अनुरूप मुख्यमंत्री की घोषणाओं को अमल में लाया जायेगा। ऐसा नहीं हैं कि बसपा शासन की केवल यही एक नीति है जो इस सरकार में भी चल रही है, अपितु ऐसी कई ऐसी नीतियाँ है जो बनी तो बसपा शासन में थी पर
क्रियान्वित वो सपा शासन में भी हो रही है। ऐसे में युवा मुख्यमंत्री का ये कहना कि मायवती शासन की नीतियां जनविरोधी थी, समझ से परे है। क्योंकि अगर ये नीतियाँ जनविरोधी थी तो फिर सपा शासन के इन 11 महीनों मुख्यमंत्री अखिलेश ने इनको बदलवाने पर क्यों नहीं जोर दिया? और यदि जोर दिया है तो ये नीतियाँ क्यों नहीं बदली? क्यों नहीं अब तक नयी भूमि अधिग्रहण नीति बन सकी? जब तक इन सवालों का जवाब न मिल जाये मुख्यमंत्री अखिलेश को मायावती शासन की नीतियों की आलोचना करने का नैतिक हक नहीं है।

लेखक अनुराग मिश्र लखनऊ के स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. इनसे संपर्क मो नम्‍बर- 09389990111 के जरिए किया जा सकता है.

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