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सुख-दुख...

एमपी के पत्रकारों के लिए विकास संवाद मीडिया फेलोशिप आवे‍दन आमंत्रित

भारतीय लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका नीति निर्धारकों को दिशा दिखाने की है, ताकि समाज के सबसे निचले व्यक्ति को उसका संवैधानिक हक दिलाया जा सके। इसके लिए मुद्दों के प्रति गहरी समझ और जमीनी स्तर पर शोध की जरूरत पड़ती है, क्योंकि तभी दृष्टिकोण को व्यापक किया जा सकता है।

भारतीय लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका नीति निर्धारकों को दिशा दिखाने की है, ताकि समाज के सबसे निचले व्यक्ति को उसका संवैधानिक हक दिलाया जा सके। इसके लिए मुद्दों के प्रति गहरी समझ और जमीनी स्तर पर शोध की जरूरत पड़ती है, क्योंकि तभी दृष्टिकोण को व्यापक किया जा सकता है।

विकास संवाद नौ साल से मध्यप्रदेश के पत्रकारों इन बुनियादी मुद्दों से वाकिफ कराने के लिए फैलोशिप प्रदान कर रहा है। हमारा मकसद है कि इससे पत्रकारों की मुद्दों के प्रति समझ बढ़े और जमीनी शोध से उनका वैचारिक स्तर और मजबूत हो। फैलोशिप का मकसद मुख्यधारा मीडिया में सामाजिक मुद्दों का दायरा व्यापक बनाना है। फेलोशिप फील्ड रिपोर्टिंग को बढ़ावा देने और पत्रकारीय दृष्टिकोण के साथ संबंधित विषय पर विस्तार से काम करने (शोध कार्य करने) के लिए प्रेरित करती है।

विकास संवाद की सोच उस दौर में उभरी, जब विकास की उपभोक्तावादी अवधारणा से प्रभावित मुख्यधारा के मीडिया में समाज के सबसे कमजोर तबकों से जुड़े मुद्दों के लिए जगह लगातार कम होती चली गई। विकास संवाद ने पिछले 10 सालों में मीडिया और जमीनी स्तर पर जनमुद्दों की पैरवी कर रहे संगठनों के बीच एक सेतु बनाने की कोशिश की है। विकास संवाद मीडिया फेलोशिप का यह लगातार नौवां साल है। अभी तक इस फेलोशिप के जरिए 58 पत्रकार साथी लेखन और शोध कार्य कर चुके हैं।

फेलोशिप के लिए आवेदन करने की अंतिम 5 मार्च 2013 है।

विकास संवाद इस बार 4 फेलोशिप के लिए आवेदन आमंत्रित कर रहा है|

यह चारों फेलोशिप हिन्दी व अंग्रेजी के प्रिंट मीडिया के पत्रकारों के लिए है। फेलोशिप की सम्मान राशि प्रतिमाह 14,000 रुपये है जिसमें यात्रा व्यय भी शामिल है।
    
फेलोशिप के लिये चयन के आधारों के संदर्भ में यह तय है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में चार-पांच वर्ष का सक्रिय अनुभव वाले मुद्दों की पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों, क्षेत्रीय एवं महिला पत्रकारों को प्राथमिकता दी जाएगी। विकास संवाद के फेलोशिप के दरम्यान फेलो को किसी अन्य फेलोशिप करने की पात्रता नहीं होगी।
    
विकास संवाद फेलोशिप के लिए पूर्व में विकास संवाद की फेलोशिप कर चुके पत्रकार भी आवेदन कर सकते हैं|
    
छह माह की फेलोशिप में संबंधित विषय पर फेलो को एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना होगा। उसे, विस्तृत रिपोर्ट के लिए एक माह की छुट्टी लेकर या प्रत्येक माह में कम से कम पांच दिन का क्षेत्र भ्रमण करना अनिवार्य है।
    
आवेदनों पर विचार कर उम्मीदवारों के चयन का कार्य वरिष्ठ संपादकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक स्वतंत्र समिति करेगी। विकास संवाद फेलोशिप से संबंधित आवेदन-पत्र का प्रारूप पत्रकार अपने संपादक के कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं। ई-मेल भेजकर ([email protected]) या पत्र लिखकर विकास संवाद से आवेदन पत्र मंगाया भी जा सकता है।
    
आवेदन पत्र वेबसाइट – www.mediaforrights.org से डाउनलोड भी किया जा सकता है।

विषय/प्रस्ताव

विकास संवाद फेलोशिप का विषय पोषण की सुरक्षा और कुपोषण पर केंद्रित है|
    
आवेदक को अपना प्रस्ताव और कार्य योजना को मध्यप्रदेश के किसी एक अंचल (मालवा, महाकौशल, चम्बल, मध्य क्षेत्र, विन्ध्य, बघेलखंड, बुंदेलखंड) में रहने वाले “किसी एक” आदिवासी, दलित या अन्य वंचित तबके की पोषण और खाद्य सुरक्षा (बच्चों के सन्दर्भ में) पर केंद्रित रखना होगा|
    
प्रस्ताव में यह सपष्ट होना चाहिए कि आप किन नए पक्षों को अपने लेखन और शोध के जरिये उभार पायेंगे|

विषय के सन्दर्भ में

विकास संवाद इस बार अपनी फेलोशिप को आपके अंचल के किसी एक (केवल एक) आदिवासी समुदाय की पोषण सुरक्षा/असुरक्षा के सन्दर्भ में केन्द्रित करना चाहता है|
    
पोषण असुरक्षा यानी जिसे हम कुपोषण कहते हैं| इस विषय को लेकर हमारी अपेक्षा यह देखना है कि किसी भी आदिवासी समुदाय के अपने सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से क्या मान्य तरीके थे, जिन पर ये आश्रित थे!
    
यह तंत्र कैसे टूटा और उसके पीछे क्या कारण रहे? उनकी पोषण को लेकर अपनी सुरक्षा क्या थी, वह कैसे जीवित थी और आखिर क्या कारण है कि जिससे समाज की अपनी व्यवस्था नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई!
    
इस पूरी व्यवस्था की भूमिका पर अध्ययनपरक लेखन करते समय हम तंत्र की भूमिका को भी देखने की अपेक्षा रखते हैं यानी कहीं इस सरकारी तंत्र, उसकी नीति/नियमों ने तो कुछ उलझनें पैदा तो नहीं कर दी हैं या वे तो इस पोषण सुरक्षा के साथ तादात्म्य बिठाने में मदद करते हैं|
    
क्या आज की पोषण सुरक्षा के ना होने के सन्दर्भ में हमें प्राकृतिक संसाधनों के अधिकारों को परिभाषित करने की आवश्यकता महसूस होगी? यदि आपको लगता है होगी, तो आप उसे भी देख सकते हैं|
    
कुल जमा हम इस विषय में किसी एक आदिवासी समुदाय के समक्ष उसकी पोषण सुरक्षा को लेकर उनके भूत और वर्तमान स्थिति के बीच के खाके को खींचने की कोशिश करते हुए और इसके पीछे के कारकों को समझने की कोशिश भी करेंगे| यह कैसे बची रहेगी, यदि यह भी हम अपने पूरे काम के दौरान समझ कर उभार सकें तो यह भी बेहतर होगा (लेकिन वह प्राथमिक अपेक्षा नहीं है )

व्यापक सन्दर्भ

आज मध्यप्रदेश अभूतपूर्व भुखमरी के दौर से गुजर रहा है। इस भुखमरी ने भी सबसे ज्यादा यदि किसी को लीला है, अपनी चपेट में लिया है तो वह हैं बच्चे और महिलायें। राष्ट्रीय पोषण संस्थान के नवीनतम सर्वेक्षण को मानें तो आज मध्यप्रदेश के आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं और इन बच्चों में से भी लगभग 72 फीसदी बच्चे आदिवासी समुदाय से हैं। साठ फीसदी से ज्यादा महिलायें खून की कमी का शिकार हैं। यही नहीं दलित समुदाय भी इससे अछूता नहीं है। दलित समुदाय भी आज सबसे ज्‍यादा भूख का शिकार होने वाले समुदायों में से एक है।

पर सवाल यह है क्या यह तंत्र ऐसा ही था, या समाज का अपना भी कुछ तंत्र था। या यूं कहें कि कमोबेश हर समुदाय के पास कुपोषण से निपटने अपना तंत्र अवश्य रहा होगा, जो कि अब टूट चुका है। हम बैगाओं में देखें तों उनके पास बेवर खेती थी, जंगल पर आधारित पूरी व्यवस्था थी। भारिया समुदाय, मध्यप्रदेश का एक ओर आदिम जनजाति समूह (प्रिमिटिव ट्राइबल ग्रुप-पीटीजी) शायद 1960-70 के दशक में मुख्यधारा के संपर्क में आया और वह भी केवल नमक के लिये ही। उसके पहले वह सभी तरीकों से सुविधासंपन्न था। उसके पास ना तो आधुनिक चिकित्सा पद्धति थी और न राशन की दुकान थी और न ही आंगनबाड़ी। पर आज तो भारिया के बच्चे भी कुपोषित हैं।

इसी प्रकार दलित समुदायों की भी अपनी एक पद्धति रही है। हमारे पारंपरिक ढांचे में दलित खेतिहर समाज पर निर्भर रहे हैं। यानि उनके रोजगार (जो बेहद कीमती और महत्‍वपूर्ण रहे हैं) और आय के साधन किसानों की संपन्‍नता पर अधिक आश्रित रहे हैं। यानी जब एक समुदाय प्रभावित होगा तो दूसरा उसके साथ स्वभावतः परेशान होगा ही। यहां हमें यह भी देखना होगा कि गांव में सामाजिक साहचर्य और सहयोग का एक सुगठित ताना-बाना था। यह ताना-बाना भी पिछले तीन-चार दशकों में छिन्न-भिन्न हुआ है। बुंदेलखंड में बंसोड़ इसके अच्‍छे उदाहरण हैं। मूर्तिकार, शिल्‍पकार, बढ़ई, चर्मकारों की आजीविका अब गांवों पर निर्भर नहीं है। सरकारी नीतियों ने आजादी के बाद से ही गांव की समूची अर्थव्‍यवस्‍था और स्‍वावलंबन के हर प्रतीक पर गहरी चोट की है।  

तस्‍वीर का दूसरा पहलू यह भी कहता है कि आज से 20 साल बाद देश के तकरीबन हर गांव का (चाहे वह आदिवासी या पीटीजी बहुल गांव ही क्‍यों न हो) अपना कहने के लिए कुछ नहीं होगा। न अपना खान-पान, न तो कृषि व्‍यवस्‍था और न ही अपनी संस्‍कृति। लोग सरकारी गोदामों में अनाज भरने के लिए खेती कर रहे हैं या फिर बाजार में बेचने के लिए। वे अपने लिए कुछ क्‍यों नहीं उगाते?   

हमें उस सरकारी तंत्र और उसमें भागीदार रहे पंचायती निकाय की भूमिकाओं का विश्‍लेषण भी करना चाहिए, जिसने कृषि प्रधान ग्रामीण समाज और जंगलों में बसे आदिवासी समाज को विकास की मुख्‍य धारा में जोड़ने के लिए बराबरी के सिद्धांत पर अमल करने के बजाय उसके मूल तानेबाने को ही तोड़ दिया।  

अचानक ऐसा क्या हुआ कि बापू का स्वावलम्बी गांव आज पिछडे, शोषित-वंचित, बेबस परिवारों से भरा एक ऐसा समाज बन रहा है, जिसका सब-कुछ छिन चुका है। सिवाय उस जमीन के, जो परिवार के सदस्‍यों का बड़ी मुश्‍किल से आधा पेट भर देती है। जमीन से जुड़ाव ही लोगों को गांव से जुड़े रहने को मजबूर करता है।

दलित, हमेशा से जातिगत और वर्ण व्यवस्था में निचले पायदान पर ही रहे हैं। समाज ने उनके साथ हमेशा से ही दोयम दर्जे का व्यवहार किया है। इस निचले पायदान पर होने के कारण जहां एक ओर उनके समक्ष छुआछूत जैसी सामाजिक बीमारियों से जूझने का यक्ष प्रश्न था, वहीँ दूसरी ओर उनकी एक घोषित लड़ाई भूख के विरूद्ध चलती रही है। हताशा से भरे और किनारे कर दिए इस समुदाय ने भी अपने जीवन के संघर्ष के चलते कुछ पद्धतियां अवश्य ही विकसित की होंगी।  
इस फेलोशिप के माध्यम से हमें कुपोषण से निपटने के आदिवासी समाज के तंत्र का पता करना होगा। इसकी वर्तमान स्थिति के विषय में जानना, समझना और पंजीबद्ध करना होगा, ताकि उसे नीति नियंताओं, समाज के बीच काम करने वाले लोगों के बीच में रखा जा सके और इन समुदायों के बच्चों को भूख और कुपोषण से निजात दिलाई जा सके। इस पूरे मामले में सरकारी तंत्र की भूमिका पर भी बात करनी होगी। सरकारी तंत्र ने बहुत ही मशीनी अंदाज में इसे देखा। इसके अंदर झांकने की कभी कोशिश नहीं की और न ही इसे समझा। इसके उपयोग को बढ़ावा देने वाली रणनीति पर काम करना तो बहुत दूर की बात है। सरकार ने भुखमरी और कुपोषण से निपटने की योजनाएं तो बहुत बनाईं, लेकिन वे लोगों की पहुंच से दूर ही रहे।

इस बार हम विकास संवाद फेलोशिप के माध्यम से अलग-अलग समुदायों के बीच में भुखमरी/आपदा के संकट से निपटने की पद्धतियों को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ हम यह भी देखने की कोशिश कर रहे हैं कि इसमें विभिन्न भागीदारों की भूमिका क्या थी और क्या है? जैसे किसान/ व्यापारी/ मजदूर/ सरकार/ समाज की भूमिका और तौर-तरीके आदि को खंगालने की कोशिश करते हैं।

फैलोशिप के नियम

विकास संवाद फैलोशिप के अंतर्गत चयनित आवेदक को निर्धारित अवधि तक नियमानुसार कार्य करना होगा, जिसमें प्रत्येक माह उन्हें अनिवार्यतः कम से कम पांच दिन अध्ययन भ्रमण करना होगा।
    
प्रिंट मीडिया के फेलो को हर माह अपने मुद्दे पर प्रतिष्ठित समाचार-पत्र/पत्रिका में चार सामग्रियों का प्रकाशन कराना होगा। छह माह में कम से कम 20 आलेखों या विस्तृत समाचारों के प्रकाशन की अनिवार्यता रहेगी। इनमें 4 नीतिगत् मुद्दों पर विस्तृत आलेख 1500 शब्दों में होना अनिवार्य है।
    
फेलोशिप में चयनित विषय पर फेलोशिप की समाप्ति पर फेलो को एक विस्तृत शोधपत्र व एक अनुभव आधारित रिपोर्ट चयन समिति को प्रस्तुत करना होगा।
    
प्रत्येक फेलो को फेलोशिप के रूप में निर्धारित अवधि तक प्रत्येक माह चौदह हजार रुपए (रुपए 14,000/- की सम्मान राशि दी जाएगी, जिसमें यात्रा व्यय एवं अन्य सभी खर्च समाहित होंगे। सम्मान राशि प्रति तीन माह में रिपोर्ट और शोध-पत्र जमा करने के बाद या समीक्षा के बाद ही दी जाएगी।
    
प्रत्येक फेलो को प्रति माह कार्य की प्रगति रिपोर्ट देनी होगी। विकास संवाद द्वारा आयोजित समीक्षा बैठक में उपस्थिति अनिवार्य होगी।
    
कार्य संतोषजनक और मापदण्डों के अनुरूप न होने पर समीक्षा समिति की अनुषंसा के आधार पर फेलोशिप केा बीच में समाप्त किया जा सकता है।
    
विकास संवाद के फेलोशिप के दरम्यान फेलो को किसी अन्य फेलोशिप करने की पात्रता नहीं होगी।
    
फेलो अपने चुने हुये विषय पर प्रकाशित/लिखित आलेखों को संकलन के रूप में प्रकाशित कराने का अपने स्तर पर प्रयास कर सकते हैं।
    
फेलोशिप के अन्तर्गत चयनित व्यक्ति को मुद्दों से संबंधित घटनाओं, नीति संबंधी पक्षों, राजनैतिक एवं सामाजिक विचारधारा से जुड़े पक्षों पर समान रूप से लेखन करना होगा।
    
बेहतर अध्ययन एवं ठोस कार्य के लिए यह सुझाव है कि आप भौगोलिक क्षेत्र, विषय के विभिन्न पक्ष, उपलब्ध संदर्भ व्यक्ति एवं सामग्री आदि बिन्दुओं पर योजनाबद्ध ढंग से कार्य योजना बनाकर कार्य करें।

फेलोशिप चयन के आधार

मध्यप्रदेश में कार्यरत।
        
पत्रकारिता में पांच वर्ष का अनुभव।
        
विकास के मुद्दों पर लेखन का अनुभव।
       
फेलोशिप में शोध के लिए एक माह की अनिवार्य छुट्टी की सहमति।
        
प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में अध्ययन भ्रमण में सक्षम।

अपने अखबार के संपादक से फेलोशिप के अंतर्गत तैयार सामग्री के प्रकाशन का सहमति-पत्र।

स्वतंत्र पत्रकार के संबंध में कम से कम दो प्रतिष्ठित समाचार-पत्र/पत्रिका के संपादकों की सहमति और अनुशंसा-पत्र।
    
चयनित विषय पर अवधारणात्मक समझ।

संलग्नक (आप जांच लें कि ये सभी दस्तावेज आपने संलग्न किये हैं या नहीं)

आवेदन पत्र।

बायोडाटा।
        
अनुभव प्रमाण-पत्र।

चयनित विषय की अवधारणात्मक समझ पर 1500 शब्दों का एक आलेख प्रस्ताव  जिसमें फैलोशिप के तहत काम करने की रणनीति दर्शाना होगा (जिसमें विषय चयन का आधार, विषय से जुड़़े विभिन्न पहलू, अध्ययन क्षेत्र आदि का जिक्र हो)।

फेलोशिप के तहत तैयार सामग्री के प्रकाशन हेतु संपादक का सहमति-पत्र।

(स्वतंत्र पत्रकार के लिए दो अखबारों के संपादकों का सहमति-पत्र)।

सामाजिक मुद्दों पर प्रकाशित पांच लेखों/समाचारों की छाया प्रति (पांच से अधिक नहीं)।
        
पत्रकारिता और सामाजिजक मुद्दों के क्षेत्र में आपके कार्य को जानने वाले दो संदर्भ व्यक्तियों के नाम।

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