Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

लखनऊ

खुमार बाराबंकवीं की पुण्यतिथि को भूल गयी बाराबंकी की अवाम

बाराबंकी। दुनिया में देश का नाम रोशन करने वाले मशहूर शायर खुमार बाराबंकवी को उनकी पुण्यतिथि पर लोग भूल गये। किसी ने मुशायरा और कवि सम्मेलन तो छोड़िए उनकी कब्र पर जाकर दो फूल डालना भी मुनासिब नहीं समझा। अफसोस तो इस बात का है कि खुमार अकादमी और खुमार एसोसिएशन व खुमार फैन्स क्लब नाम की संस्थाओं ने खुमार साहब के इन्तकाल के बाद उनके नाम को भुनाने के लिए झगड़ा तो खूब किया लेकिन आज पुण्यतिथि पर उनकी याद में कोई छोटा-मोटा कार्यक्रम भी नहीं किया।

बाराबंकी। दुनिया में देश का नाम रोशन करने वाले मशहूर शायर खुमार बाराबंकवी को उनकी पुण्यतिथि पर लोग भूल गये। किसी ने मुशायरा और कवि सम्मेलन तो छोड़िए उनकी कब्र पर जाकर दो फूल डालना भी मुनासिब नहीं समझा। अफसोस तो इस बात का है कि खुमार अकादमी और खुमार एसोसिएशन व खुमार फैन्स क्लब नाम की संस्थाओं ने खुमार साहब के इन्तकाल के बाद उनके नाम को भुनाने के लिए झगड़ा तो खूब किया लेकिन आज पुण्यतिथि पर उनकी याद में कोई छोटा-मोटा कार्यक्रम भी नहीं किया।

मालूम हो कि खुमार बाराबंकवी वो अजीम शायर थे जिनके सादे लफ्जों में पिरोई गजल उनके मख्सूस तरन्नुम के साथ जब हवा में गूँजती तो मुशायरे महक उठते थे। गजलों के इस शहंशाह ने हिन्दी फिल्म जगत के लिए गीतों का एक गुलदस्ता भी सजाया था। इनमें दर्द, प्रेम की मस्ती, खुदा की इबादत, मासूम लोरी के जुदा-जुदा रंग दिखाई दिए। 15 सितम्बर 1919 को हैदर खान के रूप में जन्मे एक बच्चे ने खुमार बाराबंकवी के रूप में 20 फरवरी 1999 को अंतिम सांस ली। युवावस्था के कई साल उन्होंने हिन्दी फिल्म जगत को दिए फिर मुशायरों की ओर रूख किया तो चाहने वालों ने उन्हें शहंशाहे गजल कहकर नवाजा। खुमार बाराबंकवी को एक शायर के रूप में जितनी पहचान मिली है। उनकी इतनी ही कद्र देश के फिल्म जगत में एक गीतकार के रूप में हुई। नई पीढ़ी भले ही इन गीतों से अनजान हो मगर पुरानी फिल्मों के शौकीन आज भी इन्हें गुनगुनाते हैं।

गायक के.एल.सहगल, रफी, तलत महमूद, लता शमशाद बेगम, गीता दत्त गायिकाओं ने उनके गीतों को आवाज दी तो परदे पर यह गीत नरगिस, दिलीप कुमार, अजीत, चन्द्रशेखर, सुरैया पर फिल्माए गये। फिल्मों के सुनहरे दौर में नौशाद, रवि, रोशन लाल जैसे नामचीन संगीतकारों के वह पसंदीदा गीतकार बने रहे। 1946 में फिल्म शाहजहाँ रिलीज हुई। के.एल.सहगल ने उनके खुबसूरत गीत ‘चाह बरबाद करेगी हमें मालूम न था रोते-रोते ही कटेगी हमें मालूम न था’ को अपनी आवाज दी तो खुमार साहब चर्चा में आ गए। फिर तो एक सिलसिला चल निकला। 1949 में रिलीज रूपलेखा के गीत ‘तुम हो जाओ हमारे हम हो जाएँ तुम्हारे’ को रफी साहब ने, तो इसी साल आई फिल्म दिल की बस्ती में गीता दत्त व जोहरा खान ने ‘हसरत भरी नजर को तेरा इंतजार है आजा कि तेरी याद में दिल बेकरार है’ गीत को स्वर दिया। 1951 में दिलीप कुमार नरगिस की फिल्म हलचल आई इसमें लता मंगेशकर ने खुमार साहब के लिखे गीत ‘लूट लिया मेरा करार फिर दिले बेकरार ने, दर्द ने मेरे चौन को खाक में फिर मिला दिया’ को अपनी आवाज में गाया। 1955 में फिल्म बारादरी के सभी गीत हिट रहे। इनमें आई बैरन बहार किए सोलह श्रृंगार, मोहब्बत की बस इतनी दास्तां है, भुला नहीं देना जी भुला नहीं देना और तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती आदि गीतों ने धूम मचा दी। इसके अलावा उन्होंने 1955 में बलराज साहनी अभिनीत फिल्म जवाब, 1958 में हीरो अजीत की फिल्म मेंहदी में उन्होंने गीतों के साथ एक कव्वाली ‘अल्लाह की रहमत का जिसको भी सहारा मिल जाए, टूटी हुई कश्ती को उसकी मौजों में किनारा मिल जाए’ भी लिखी। इसी फिल्म में एक लोरी ‘झूलो लालना चांदी की डोरी सोने का पालना’ भी दी। वहीं से शेरों के जरिए गुफ्तगू करते हुए जुदा अंदाज का गीत ‘अपने किए पे कोई पशेमान हो गया, लो और मेरी मौत का सामान हो गया, आखिर तो रंग लाईं मेरी बेगुनाहियां मुझको सता के वह भी परेशां हो गया’ फिल्माया गया।
    
फिल्म दो रोटी वर्ष 1957 में रिलीज हुई मो. रफी और गीता दत्त ने ‘घिर के बरसे यह घटाएँ तो मजा आ जाए अब घर जाने न पाएँ तो मजा आ जाए’ को आवाज दी। जानी वाकर इस फिल्म के हीरो थे। एक लम्बे अंतराल के बाद संगीतकार नौशाद की ख्वाहिश पर उन्होंने वर्ष 1986 में रिलीज हुई के. आसिफ की फिल्म लव एंड गाड के लिए खुबसूरत नगमे लिखे। एक गीत देखिए इधर ढूंढ़ता उधर ढूंढ़ता हूँ, मैंजहाँ में तुझे दर बदर ढूंढ़ता हूँ, मैं खुद खो गया हूँ तेरी जुस्तजू में मगर तुझको शामो सहर ढूंढ़ता हूँ। अपनी धुन के पक्के इस गीतकार ने तेजी सी बदल रहे फिल्मों के ट्रेंड के साथ खुद को नहीं बदला इसीलिए एक शायर के रूप में संतुष्टि भरा दौर जीने के बाद उन्होंने खुद को भेड़चाल से अलग कर लिया। उनके लिखे हर गीत में एक शायर की रूह झलकती रही। वह इसे ही हर हाल में जिंदा रखना चाहते थे और इसमे कामयाब रहे। खुमार बाराबंकवी ने अपने सादे लहजे और खास तरन्नुम से गजल को नया लिबास पहनाया। उर्दू शायरी के जरिए आम आदमी से गुफ्तगू करने की खासियत ने उन्हें शहंशाहे गजल के मुकाम तक पहुँचा दिया।
    
हैदर खान नाम के बच्चे के बारे में किसी को इल्म नहीं था कि आँगन में खेलता यह लाडला उर्दू मुशायरों की जीनत होगा, हिन्दी फिल्मों के लिए लिखे गए उसके नगमे सब गुनगुनाएँगे। बचपन से जवानी में कदम रखते-रखते उन्हें शायरी अपनी ओर खींचती गई फिर क्या, उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी उसके नाम कर दी। हदीसे दीगरा, आतिशे तररक्शे मय को उन्होंने किताबों की शक्ल दी और मुशायरों का भी सिलसिला जारी रखा। अपने क्लासिकल अंदाज ने उन्हें जल्द ही हसरत और जिगर मुरादाबादी की कतार में ला खड़ा किया। उनकी शायरी में आशिकी है तो जमाने की तेज रफ्तार भी, दोस्ती की परख तो समाज के लिए संदेश भी। तरक्की में आम आदमी का दर्द इस शेर में है ‘यह कैसी हवा ए तरक्की चली है, दिए तो दिए दिल बुझे जा रहे हैं’ तो जमाने पर तंज भी कस देते हैं ‘चरागों के बदले मकां जल रहे हैं, नया है जमाना नयी रोशनी है’। दोस्तों के लिए दुआ मांग कर कहते हैं ‘इलाही मेरे दोस्त हों खैरियत से, यह क्यूँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं’। जुल्म के खिलाफ वह आवाज बुलंद करने को कहते हैं, ‘अरे ओ जफाओं पे चुप रहने वाले खामोशी जफाओं की ताइदगी है’। इश्क के अंजाम पर वह कहते हैं, ‘वो हमें हम उन्हें भुला बैठे, दो गुनाहगार जहर खा बैठे’। तनहाई का आलम देखिए ‘अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं, मेरी याद से जंग फरमा रहे हैं’।
    
अलीगढ़, दुबई, पाकिस्तान के बड़े मुशायरों में शिरकत करने वाले इस शायर के लिए कोई मंच छोटा नहीं था इसीलिए उनके कद्रदान लाखों की संख्या में है। संगीतकार नौशाद के चहेते शायर खुमार के दिल में छुपे इस गीतकार ने मसलन ‘तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती’ जैसे कई नगमे लिखे। उनकी खुद्दारी ही थी कि अपनी शर्तों से न हटते हुए उन्होंने कुछ अमर गीत देकर हिन्दी फिल्मों से किनारा कर लिया। आज उसी शहनशाहे गजल खुमार बाराबंकवीं की पुण्यतिथि पर कर्बला सिविल लाइन में मौजूद कब्र आज अपने चाहने वालों को तलाशती रही। लेकिन कोई भी एक फूल डालने नहीं आया।

बाराबंकी से रिजवान मुस्‍तफा की रिपोर्ट.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...