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सुख-दुख...

जब गलत-सही काम कर ही रहे थे तो भीख मांगने की क्‍या जरूरत थी पत्रकार मित्रों?

ग्रामीण पत्रकार को स्टाफर की तरह मोटी पगार मिले। संपादक जैसी सुविधायें मिले। गाड़ी मिले, घर मिले, तरह तरह के भत्ते मिले। संवादसूत्र और संवाददाता के काम से ही पूरा मीडिया हाउस चलता है, वो ही पत्रकारिता के असली लड़ाकू हैं लेकिन अखबारों के मालिक मोटी रकम खुद रखकर जमीन से जुडे़ ऐसे जुझारू लोगों को कुछ नही देते, यदि उनके साथ ऐसा ही होता रहा तो भारत से पत्रकारिता का नाश हो जायेगा और न जाने क्या-क्या कहा नासमझ पत्रकारों ने कहा। जिन्हें पत्रकारिता की जानकारी थी वो तो बोले ही, वो भी खूब चिल्लाये जिनका लेखनी से कोई लेना देना तक नहीं थी।

ग्रामीण पत्रकार को स्टाफर की तरह मोटी पगार मिले। संपादक जैसी सुविधायें मिले। गाड़ी मिले, घर मिले, तरह तरह के भत्ते मिले। संवादसूत्र और संवाददाता के काम से ही पूरा मीडिया हाउस चलता है, वो ही पत्रकारिता के असली लड़ाकू हैं लेकिन अखबारों के मालिक मोटी रकम खुद रखकर जमीन से जुडे़ ऐसे जुझारू लोगों को कुछ नही देते, यदि उनके साथ ऐसा ही होता रहा तो भारत से पत्रकारिता का नाश हो जायेगा और न जाने क्या-क्या कहा नासमझ पत्रकारों ने कहा। जिन्हें पत्रकारिता की जानकारी थी वो तो बोले ही, वो भी खूब चिल्लाये जिनका लेखनी से कोई लेना देना तक नहीं थी।

खैर, पूरा माजरा कानपुर नगर की बिल्हौर तहसील में चल रहे मकनपुर मेले का है। गुरुवार 21 फरवरी दोपहर का 12 बजने को था, एक पत्रकार मित्र ने कॉल की और कहा पत्रकार सम्मेलन है मकनपुर मेले में, जल्दी आ जाओ। मैं यह सोचकर की शायद कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा सम्मेलन स्थल पर पहॅुचा। वहां पर कई कार्यरत पत्रकारों के परिवार बाल बच्चों मॉ-बहनों संग पहले से ही डटे थे। सही भी है, मेला है तो जाना ही चाहिये, फ्री का भौकाल भी टाइट हो जायेगा। इसके बाद बहुत से खुद को नगर का प्रतिष्ठित संवादाता/ब्यूरोचीफ/जिला संवाददाता/मुख्य प्रतिनिधि कहने वाले बारी-बारी से सामने आने लगे। कोई बैनर लगा रहा था तो कोई मोबाइल पर अतिथियों की लोकेशन ले रहा था।

पूरा कार्यक्रम अस्थायी मकनपुर तहसील परिसर में था। परिसर में तम्बू कनात में फिल्मी गाने पर दर्जनों वर्दीधारी आनंदित हो रहे थे। मेले के आयोजक छपासे थे इसलिये अखबारों वालों को चाटे डाल रहे थे। वकील भी सक्रिय थे तो किसानी-राजनीति करने वाले भी बुलाये गये थे। तथाकथित पत्रकार सम्मेलन में अच्छे बुरे सब सीना ताने थे। कन्नौज प्रेस क्लब के कई सदस्य भी बुलावे में आये थे।
ऐतिहासिक जिंदा शाह मदार की सरजमीं पर पत्रकारों ने अपनी पीड़ा को सार्वजनिक करने के लिये तथाकथित पत्रकार सम्मेलन में मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश श्रम संविदा बोर्ड के अध्यक्ष सतीश दीक्षित को आमंत्रित किया था।

एक बात बोलूं – पत्र से जुड़े लोगों को महात्मा गांधी समेत अनेकों महापुरुष स्वयं सेवक कहते थे। ये पेशा पग पग पर बलिदान मांगता है, चाहे बालगंगाधर तिलक हो या विद्यार्थी जी, इनमें जज्बा था।  कलम के प्रति पर आजादी पा गये पा गये। लालच आ गया। पैसा, रुतबा और हनक मानो पत्रकारिता का आधार बन चुकी है। पत्र से जुड़े लोगों के खयालात बदल चुके हैं। 60 बरस बाद लालच की लत लग चुकी है उनके तेबर बगावती हो चुके हैं। उसी की एक बानगी झलकी बिल्हौर के मकनपुर मेला में। अपनी मांगों को लेकर कई क्षेत्रीय और पड़ोसी जिलों के प्रेस क्लबों के सदस्य गरजे, किसी ने बसों, रेल, होटलों में फ्री सुविधा की मांग की और वाहवाही लूटने के चक्कर में कइयों ने तो अपने मीडिया हाउस के मालिकों को भी नही बख्सा। हद तो तब हो गई जब एक पत्रकार बंधु ने सभी पत्र के पेशे से जुडे़ लोगों को रिवाल्वर मिलने के मांग उठा दी। सच बताऊ गुस्सा भी आयी बुरा भी लगा।
 
खैर कई बुजुर्ग पत्रकारों की कई बातें जायज थी, पर मेरी नजर में पूरा तरीका गलत था। अपनी बिरादरी के बातों को जगजाहिर करना मूर्खता ही कहलाती है। अगर परिवारिक सदस्य नहीं सुनते तो बिरादरी में एकजुटता बनानी चाहिये। एकता है नहीं चले हैं युद्ध करने। पत्रकार सम्मेलन के जितने भी आयोजक थे उनकी कोई कुछ भी मंशा समझे पर मेरी नजर में उन सभी में व्यक्तिगत लाभ लेने की होड़ थी। संचालकों में कुछ एक को छोड़ दें तो सभी किसी न किसी राजनैतिक पार्टी से संबंधित हैं और पूर्व में कई तरह से सरकारी और गैरसरकारी ढंग से क्षेत्र में लाभ कामते रहे हैं। ये सब मौका परख कर बार करते हैं। लाभ लेने के लिये अपने मित्रों ही नहीं पितामाह को भी नहीं छोड़ते।

मैं पूरे आयोजन का माजरा नहीं समझ पा रहा था, तभी मुख्य अतिथि जी ने पूरा पर्दाफाश कर दिया। उन्होंने सम्मेलन का संचालन कर रहे बिल्हौर से सहारा अखबार के संवाददाता को कहा आप ने लालच को ओढ़नी ओढ़कर अपने आह्वान में मुझे बड़ा भाई बोल दिया जबकि मैं रिश्ते में तुम्हारा मामा हूं। मुख्य अतिथि चूंकि मंझे हुयी पत्रकारिता के माहिर लगे। उन्होंने सख्त हिदायत दी की पत्रकारिता मिशन है, कोई व्यापारिक पेशा नहीं। उन्होंने पत्रकार होने के नाते सभी जायज मांगों को सूबे के मुखिया तक पहॅुचाने की बात कही है। थोड़ी बहुत शेरो-शायरी की। पत्रकारों और तथाकथित पत्रकारों संग फोटो खिंचायी और सम्मेलन का संचालन कर रहे संवादाता के संग लाल बत्ती में बिल्हौर शायद उनके घर चले गये। अब देखना यह होगा आखिर भला किसका होने वाला है?

हॉ एक सबसे हैरान करने वाली बात मैं यहां और बताना चाहता हॅू कि पत्रकार सम्मेलन मंच का संचालन बिल्हौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष कर रहे थे। मुख्य वक्ताओं ने कई बार इसको दोहराया। प्रेस क्लब वो भी बिल्हौर में कम से कम मुझे नहीं मालूम था न कभी चर्चा में बात आई। जब बकरी बंदर मरने की खबर कानों में बिना पड़े नहीं जाती। मैं पत्रकारिता मिशन से जुड़ा हूं और बिल्हौर मेरा गृह नगर भी है, मुझे नहीं मालूम चला। खैर मुझे क्या कोई व्यक्तिगत लाभ के लिये कुछ भी बना ले। यहां एक बात का उल्लेख करना बेहद जरुरी है कि बिल्हौर में बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्होंने कलम के बल पर खूब चांदी काटी है और लाखों लाख की संपति बनायी है। किसी ने व्यापारिक भूमि कब्जाई, किसी ने नगर पालिका में टेण्डर हासिल किये, कोई नेताओं के मतलब की खबर छापने पर शहर में प्लाट लेता है और न जाने क्या क्या।

हॉ बिल्हौर क्षेत्र में कई ऐसे तथाकथित पेशेवर खुद को पत्रकार बताने वाले हैं जो प्राइमरी में जाकर शिक्षिकाओं से वसूली करते हैं और गैस एजेन्सी से कलम की हनक पर सिलेण्डर लेकर ब्लैक करते है। इतना बहुत था, फिर भीख मांगने की क्या जरुरत थी मेरे पत्रकार मित्रों।

‘‘किसी पर कीचड़ उछालना मेरा पेशा नही, हकीकत से है बस मतलब।           
  कुत्ता भी कुत्ता को नहीं काटता, मुझे थी क्या जरूरत।।’’

लेखक राहुल त्रिपाठी पत्रकार हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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