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प्रेस परिषद की रिपोर्ट, काटजू और बिहार के एडिटर इन चीफ

बिहार में सत्तापक्ष द्वारा मीडिया को नियंत्रित किए जाने को लेकर भारतीय प्रेस परिषद की रिपोर्ट पर जांच समिति के अलावा बाकी सदस्यों की मुहर लगती उसके पहले ही वह मीडिया के हाथ लग गई। इस संबंध में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मानना है कि यह काम खुद परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की मेल आईडी से किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि इस रिपोर्ट पर गंभीरता से बात होने के बजाय पूरा मामला समाचार चैनलों के अखाड़े में होने वाली रोजमर्रा की राजनीतिक बहसों में तब्दील हो गया। उसके बाद इस पूरे प्रकरण पर मीडिया के चरित्र को लेकर बात करने वाला कोई नहीं बचा।

बिहार में सत्तापक्ष द्वारा मीडिया को नियंत्रित किए जाने को लेकर भारतीय प्रेस परिषद की रिपोर्ट पर जांच समिति के अलावा बाकी सदस्यों की मुहर लगती उसके पहले ही वह मीडिया के हाथ लग गई। इस संबंध में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मानना है कि यह काम खुद परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की मेल आईडी से किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि इस रिपोर्ट पर गंभीरता से बात होने के बजाय पूरा मामला समाचार चैनलों के अखाड़े में होने वाली रोजमर्रा की राजनीतिक बहसों में तब्दील हो गया। उसके बाद इस पूरे प्रकरण पर मीडिया के चरित्र को लेकर बात करने वाला कोई नहीं बचा।

सब इसे राजनीतिक मुद्दे में बदलने में लग गए। यह भारतीय प्रेस परिषद के लिए कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि लोकसभा चुनाव 2014 के पहले वह पेड न्यूज और राजनीतिक पार्टियों की ओर से मीडिया नियंत्रण के मामले पर मुस्तैदी से काम करता, रिपोर्ट जारी करता, खुद उसकी हास्यास्पद छवि बना दी गई। उसमें राजनीतिक पार्टियों सहित मुख्यधारा मीडिया ने भी जम कर सक्रियता दिखाई। यहां तक कि जांच समिति के सदस्य भी रिपोर्ट सार्वजनिक होने के पहले ही टीवी परिचर्चा में आने का लोभ संवरण नहीं कर पाए।

नतीजा, भारतीय प्रेस परिषद की रिपोर्ट और न्यायमूर्ति काटजू को लेकर एक के बाद एक आए राजनीतिक बयानों को मजबूती मिली। भारतीय प्रेस परिषद की छवि मीडिया को नियंत्रित करने वाली एक स्वायत्त संस्था के रूप में बने, इसके लिए जरूरी था कि इस संस्था से जुड़े लोगों पर किसी भी राजनीतिक दल या सत्ता प्रतिष्ठान के प्रभाव में काम करने के आरोप न लगे। लेकिन इस रिपोर्ट के आने से पहले ही मीडिया में बिहार के सत्तारूढ़ दल की तरफ से बयान आने शुरू हो गए और न्यायमूर्ति काटजू को कांग्रेस का आदमी बताया जाने लगा। इस रिपोर्ट के लीक होने के दौरान ही न्यायमूर्ति काटजू के गुजरात और मोदी को लेकर लिखे लेख पर तो राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने काटजू के परिषद अध्यक्ष पद से इस्तीफे की मांग तक कर डाली। यही नहीं, उन्हें कांग्रेसियों से भी बड़ा कांग्रेसी बताया।

यह पहली बार नहीं है जब अध्यक्ष पद पर रहते हुए न्यायमूर्ति काटजू पर कांग्रेसी होने के आरोप लगे और यह काम सिर्फ गैर-कांग्रेसी राजनीतिकों ने किया। न्यायमूर्ति काटजू ने 5 अक्तूबर, 2011 को अध्यक्ष पद संभाला और उसके पांच दिन बाद अखबारों के संपादकों को संबोधित करते हुए कहा कि मौजूदा मीडिया के काम करने का तरीका ठीक नहीं है। अब आम आदमी भी कहने लगा है कि मीडिया निरंकुश होने लगा है। अगर पत्रकार अपने मालिकों की सेवा करते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं, लेकिन उन्हें जनता का भी ध्यान रखना होगा।

न्यायमूर्ति काटजू की इस बात को मुख्यधारा मीडिया ने उनकी तरफ से दी गई चुनौती के रूप में प्रसारित किया। फिर 30 अक्तूबर, 2011 को करन थापर के कार्यक्रम में दिए साक्षात्कार के बाद से तो मुख्यधारा मीडिया ने खुलेआम काटजू का विरोध शुरू कर दिया। यहीं से उनकी छवि कांग्रेस का आदमी बनाने के रूप में हुई। उस बातचीत में उन्होंने मौजूदा मीडिया को जनविरोधी और ज्यादातर पत्रकारों के बारे में ठीक राय न होने की बात कही थी। उन्हें बहुत कम पढ़ा-लिखा बताया था। उसी में उन्होंने भारत सरकार से प्रेस परिषद के लिए और अधिक अधिकारों की मांग की थी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी प्रेस परिषद के दायरे में लाने और इसका नाम मीडिया परिषद करने की बात कही थी।

न्यायमूर्ति काटजू की इन बातों का इस रूप में विरोध हुआ कि एक के बाद एक अखबारों और टीवी चैनलों ने उन्हें कांग्रेस का आदमी कहना शुरू कर दिया। एक अंग्रेजी अखबार ने तो अपनी खबर का शीर्षक दिया- ही डजंट डिजर्ब टू बी द चीफ आफ द परिषद- वे प्रेस परिषद के अध्यक्ष पद के काबिल नहीं हैं। एनबीए (न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने भारतीय प्रेस परिषद को ही भंग करने की बात कही थी। दिलचस्प है कि जब मीडिया न्यायमूर्ति काटजू का विरोध करते हुए उन्हें कांग्रेस का एजेंट बता रहा था, कांग्रेस सांसद और सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने उनके बयान को तूल देने का विरोध किया था।

उन्होंने यहां तक कहा था कि वे जो कुछ कह रहे हैं, नया नहीं है। इससे पहले न्यायमूर्ति जेएन राय ने भी इसी तरह के सुझाव दिए थे। इस पूरे मामले पर गौर करें तो गैर-कांग्रेसी राजनीतिकों से पहले मुख्यधारा मीडिया न्यायमूर्ति काटजू को कांग्रेस का आदमी साबित कर चुका है, जिसके पीछे उसके ऊपर उठाए गए सवाल का विरोध शामिल है। ऐसे में अगर वह अब दुबारा उनके लेख, टिप्पणी या रिपोर्ट को एक खास राजनीतिक संदर्भ में पेश कर रहा है तो आश्चर्य नहीं, क्योंकि उसने दो साल पहले ही तय कर लिया था कि अध्यक्ष के रूप में काटजू की छवि खराब करनी है। यह अलग बात है कि न्यायमूर्ति काटजू पिछले करीब दस साल से उसी अंग्रेजी अखबार में साहित्य, कला और मीडिया पर लेख लिखते आए हैं।

अगर बिहार में मीडिया की स्थिति पर प्रेस परिषद की रिपोर्ट बाहर न भी आती और मुख्यधारा मीडिया के प्रति चुप्पी बनी रहती तब भी यह सचाई छिपी नहीं रह गई थी कि वहां का मीडिया विज्ञापन और सरकारी लाभ की खातिर किनके इशारे पर काम करता है। यह सब हमारे बीच लगातार आ रहा था। सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग जानते हैं कि 2011 में फेसबुक पर नीतीश सरकार के खिलाफ टिप्पणी किए जाने पर डॉ. मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण को न केवल नौकरी से निकाल दिया गया, बल्कि उन्हें लगातार परेशान किया गया। उस दौरान मुख्यधारा मीडिया में लगभग चुप्पी बनी रही, लेकिन सोशल मीडिया पर लगातार खबरें आती रहीं। इस घटना के करीब एक महीने बाद 16 अक्तूबर, 2011 को उन टिप्पणियों को ‘बिहार में मीडिया कंट्रोल : बहुजन ब्रेन बैंक पर हमला’ शीर्षक से किताब की शक्ल में प्रकाशित किया गया। इसमें संकलित लेख इस बात की विस्तार से चर्चा करते हैं कि बिहार में दलित, पिछड़े वर्ग और मुसलमानों की आवाज को मुख्यधारा मीडिया सरकारी शह पर दबाने का काम करता है। इसी संदर्भ में प्रमोद रंजन की पुस्तक ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ वहां के पूरे मीडिया परिदृश्य को उभारती है।

इसी कड़ी में 14 अप्रैल, 2012 को ‘ओपन’ पत्रिका में धीरेंद्र के. झा की विशेष रिपोर्ट प्रकाशित हुई- ‘एडिटर इन चीफ आफ बिहार’। इसमें विस्तार से बताया गया कि बिहार के बड़े-बड़े अखबारों में, जिनके देश भर में संस्करण प्रकाशित होते हैं, जद (एकी) के खजांची विनय कुमार सिन्हा के घर आयकर छापे की खबर गायब रही। वह खबर लोग उन छोटे अखबारों के जरिए जान पाए, जिन्हें सरकारी विज्ञापनों से दूर रखा गया है। इन अखबारों को दबाने के लिए सरकार क्या-क्या नहीं करती, यह लंबी कहानी है। दूसरी तरफ ऐसे अखबारों की लंबी फेहरिस्त है, जो हमारी नजरों से नहीं गुजरते, लेकिन उनमें सरकारी विज्ञापन मौजूद होते हैं। ऐसे में सवाल है कि अब जबकि मुख्यधारा मीडिया इस रिपोर्ट को लेकर सिर्फ राजनीतिक माहौल बनाने में जुटा है, क्या वह खुद इसमें प्रमुखता से शामिल नहीं है! अगर इन रिपोर्टों, खबरों पर गौर करें तो यह स्पष्ट नहीं होने लगता है कि कॉरपोरेट मीडिया इस पूरे प्रकरण को अपने से काट कर सत्ता के गलियारों की गेंद बनाने में लगा है! उसमें उसके खुद के फंसने की पूरी संभावना है, क्योंकि जिस समय सरकार उनकी आवाज दबाने का काम कर रही थी, उस समय उसका विरोध करने के बजाय वर्ष के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री से नवाजने में मशगूल था। (साभार : जनसत्‍ता)

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