Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

बीजेपी माने बेटा जमाओ पार्टी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा से निष्कासित भ्रष्ट नेताओं को कमल थमाकर पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने बीजेपी को भ्रष्टाचारी जुटाओ पार्टी का तमगा दिलाया था। अब जब पार्टी लोकसभा की लड़ाई के लिए तैयारी कर रही है तो यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने प्रदेश कार्यकारिणी में कई वरिष्ठ और कर्मठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को खुड्डे लाइन लगाकर दिग्गज और गुटबाज नेताओं के बेटों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाकर बीजेपी को बेटा जमाओ पार्टी का नया खिताब दिलाया है। यूं तो बीजेपी कांग्रेस और सपा पर वंशवाद की राजनीति करने का आरोप लगाती रही लेकिन खुद उसके आंगन में वंशवाद की बेल खूब मजे से फल फूल रही है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा से निष्कासित भ्रष्ट नेताओं को कमल थमाकर पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने बीजेपी को भ्रष्टाचारी जुटाओ पार्टी का तमगा दिलाया था। अब जब पार्टी लोकसभा की लड़ाई के लिए तैयारी कर रही है तो यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने प्रदेश कार्यकारिणी में कई वरिष्ठ और कर्मठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को खुड्डे लाइन लगाकर दिग्गज और गुटबाज नेताओं के बेटों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाकर बीजेपी को बेटा जमाओ पार्टी का नया खिताब दिलाया है। यूं तो बीजेपी कांग्रेस और सपा पर वंशवाद की राजनीति करने का आरोप लगाती रही लेकिन खुद उसके आंगन में वंशवाद की बेल खूब मजे से फल फूल रही है।

लखनऊ से दिल्ली तक पार्टी के गुटबाज, मठाधीश टाइप नेताओं के पुत्र, भाई और रिशतेदार जमे हुए हैं। प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और लखनऊ के सांसद एवं प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री लालजी टण्डन के नकारा बेटों को खासी तवज्जो दी गई है। पार्टी नेताओं का पूरा ध्यान अपने बेटे-बेटियों का राजनीतिक कैरियर चमकाने और जमाने में लगा है। विधान सभा चुनाव में बीजेपी के धृतराष्ट्र नेताओं के पुत्र मोह ने पार्टी की लुटिया डुबोने में बड़ी भूमिका निभाई थी, लेकिन ऐसा लगता है कि पिछली गलतियों से पार्टी नेताओं और नेतृत्व न कोई सबक नहीं लिया है और कम होने की बजाय उनका पुत्र मोह दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। इन नेताओं के पुत्र मोह के पार्टी के जुझारू, संघर्षशील और पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की अनदेखी तो हुयी ही वहीं लोकसभा चुनावों की तैयारी से पूर्व ही पहले से ही कई धड़ों में बंटी पार्टी में अंसतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक और धड़ा खड़ा हो गया है।

उत्तर प्रदेश भाजपा नेताओं के पुत्र प्रेम के दर्जनों किस्से पार्टी के प्रदेश कार्यालय और लखनऊ की सड़कों में फैले हुये हैं। अटल जी की चरण पादुकाओं को पूज-पूजकर कई बार प्रदेश मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री का पद और लखनऊ के सांसद की सौगात पाने वाले लालजी टण्डन किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पेश से व्यापारी टण्डन जी पुत्र मोह में इस कदर डूबे हुये हैं कि 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब पार्टी ने उन्हें पार्टी प्रत्याशी घोषित किया तो उन्हें विधायक की सीट खाली करनी पड़ी। तब टण्डन जी चाहते थे कि इस सीट के लिए होनेवाले उप चुनाव में उनके सुपुत्र आशुतोष टण्डन उर्फ गोपाल जी को पार्टी उम्मीदवार बनाया जाए। लेकिन उनकी इच्छा के विपरित पार्टी ने पुराने कार्यकर्ता अमित पुरी को टिकट सौंप दिया तो कहते हैं कि टण्डन जी की कृपा से जो सीट बरसों से भाजपा का गढ़ मानी जाती थी, वह कांग्रेस के खाते में चली गई। टण्डन जी यही नहीं रूके। अपने रूतबे और पद का इस्तेमाल कर 2012 के विधानसभा चुनाव में अपने बेटे आशुतोष टण्डन उर्फ गोपाल जी को लखनऊ के उत्तर विधान सभा क्षेत्र से टिकट दिलाने में कामयाब रहे। लेकिन टण्डन जी और उनके सर्मथकों के जोर लगाने के बावजूद भी आशुतोष मुख्य लड़ाई से बाहर ही रहे। बरसों बरस सत्ता का स्वाद चखने वाले टण्डन जी इन दिनों पुत्र को राजनीति में स्थापित करने के लिए आतुर दिखाई देते हैं। प्रदेश कार्यकारिणी में प्रदेश महामंत्री पद पर विराजित गोपाल टण्डन का इस बार प्रोमोशन कर उपाध्यक्ष पद की अहम् जिम्मेदारी सौंपी है। गोपाल जी टण्डन की सबसे बड़ी योग्यता यही है कि वो लाल जी टण्डन के बेटे हैं।

लेकिन लालजी टण्डन कोई अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिनका पुत्रप्रेम हिलोरे मारता है। पार्टी में पुत्र प्रेम में डूबे नेताओं की लंबी लाइन है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी, ओम प्रकाश सिंह सीरखे कई नेता है जो पार्टी से अधिक अपने पुत्रों के राजनीतिक करियर को लेकर चिंतित रहते हैं। कल्याण सिंह की पार्टी का भाजपा में विलय यूं ही नहीं हुआ उसकी बड़ी वजह उनके बेटे और बहू हैं, दोनों ही पूर्व में विधायक रह चुके हैं। जबकि राजबीर सिंह तो कुछ कैबिनेट मंत्री भी रहे।

पूर्व में राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह को छोड़कर हर नेता का पुत्र चुनाव मैदान में जोर आजमाइश कर चुका है और सब के सब औंधे मुंह गिरे हैं। बावजूद इसके भाजपा के नेता अपने पुत्रों को माननीय बनाने की कोशिश में थके जरूर हैं लेकिन हारे नहीं हैं। जो काम पार्टी के नेताओं के हाथ में है वो तो कर ही रहे हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश अध्यक्ष रहे सूर्य प्रताप शाही ने राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को आउट ऑफ टर्न प्रोमोशन देते हुए उन्हें प्रदेश कार्यकारिणी में मंत्री से महामंत्री बना दिया था। प्रदेश नेतृत्व के विरोध में दो मंत्रियों ने इस्तीफा भी दे दिया था। हालांकि पंकज सिंह को 2007 के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया गया था लेकिन वो चुनाव लड़ने का साहस नहीं दिखा सके। अब चूंकि उनके पिता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तो कहना ही क्या। प्रदेश कार्यकारिणी में फिर कोई नया विवाद न हो इसके लिए पंकज की प्रदेश महामंत्री पद की स्थिति को यथावत रखा गया है। पंकज मैदानी नेता नहीं है लेकिन वो संगठन में अपना प्रभाव बनाये हुये हैं नेता पुत्रों की बढ़ती भीड़ के बाद यूपी के बाकी नेताओं की चिंता स्वाभाविक है।

पार्टी के नेताओं को संगठन पदाधिकारी या कार्यकर्ता से ज्यादा चिंता अपने बेटों के सेटलमेंट को लेकर है। बार-बार नेता पुत्रों के फ्लाप होने के बाद भी उन्हें मौका दिये जाने का ही नतीजा है कि पार्टी के कार्यकर्ता झण्डा, डण्डा उठाने तक ही सीमित हैं। इसी प्रकार भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह के पुत्र अनुराग सिंह भी मिर्जापुर से लोकसभा चुनाव लड़कर अपनी हैसियत दिखा चुके हैं। अनुराग ने 2009 का लोकसभा चुनाव मिर्जापुर से लड़ा था और बुरी तरह परास्त हुये थे। यही नहींय क्षेत्र में इन पिता पुत्र के खिलाफ इतनी नाराजगी है कि इसकी कीमत ओम प्रकाश सिंह को पिछले विधानसभा चुनाव में अपनी सीट गंवा कर चुकानी पड़ी। भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के पुत्र शरद त्रिपाठी भी सांसदी का चुनाव लड़कर अपना दमखम देख चुके हैं। इनमें से किसी को किसी भी सदन में पहुंचने का मौका नहीं मिला। हालांकि रमापति राम त्रिपाठी भी कोई करिशमाई नेता नहीं रहे। तीन बार विधानसभा का चुनाव लड़े और हार गये। जो नेता पुत्र चुनाव मैदान में फ्लाप हुये उन्हें संगठन में एडजस्ट कराने के लिए पार्टी के दिग्गज पीछे नहीं हैं।

पिछले महीने भाजपा में शामिल हुये पूर्व मुख्यमंत्री के पुत्र राजबीर सिंह उर्फ राजू भैया को प्रदेश कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष के पद से नवाजा गया है और उनकी पत्नी प्रेमलता वर्मा को कार्यकारिणी में सदस्य बनाया गया है। हालांकि राजबीर और उनकी पत्नी प्रेमलता वर्मा 2012 के विधानसभा चुनाव में अपने ही गढ़ चुनाव हारकर अपनी ताकत देख चुके हैं। ऐसे में राजबीर भाजपा के लिये कितने फायदेमंद होंगे ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन फिलहाल तो पार्टी कल्याण सिंह और उनके परिवार के समक्ष नतमस्तक दिख रही है। पूर्व मंत्री प्रेमलता कटियार खुद भले ही पदाधिकारी न बनी हो परन्तु उनकी बेटी नीलिमा कटियार को प्रदेश मंत्री नियुक्त किया गया। पूर्व मंत्री स्व. ब्रह्मादत्त द्विवेदी के पुत्र मेजर सुनील दत्त द्विवेदी इस बार पदाधिकारी नहीं बने सके परन्तु उनका समायोजन कार्यकारिणी सदस्य के रूप में कर लिया गया है।

दिल्ली की गद्दी का रास्ता वाया लखनऊ जाता है इसकी फिक्र किसी भी भाजपा नेता को नहीं है। प्रदेश में अपनी खोयी जमीन और जनाधार बढ़ाने की जद्दोजहद में लगी भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में पिता-पुत्र व मां-बेटी की जोड़ी से सीटों की संख्या बढ़ाने की रणनीति तैयार की है। प्रदेश भाजपा लगातार अपना जनाधार खो रही है। पिछले डेढ़ दशक में पार्टी के सांसदों की संख्या 57 से घटकर 10 व विधायकों की संख्या 187 से घटकर 47 पर पहुंच गई है। इसके बावजूद पार्टी कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद संघ ने चलते आड़े हाथों लिया था। संघ ने सवाल उठाया था कि भाजपा में कार्यकर्ताओं से ज्यादा नेता क्यों हैं? क्या इसका जवाब अब भी कठिन है।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...