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अखबारों ने अपनाया जो मिले लूट लो का फार्मूला

: लोगों को खुद लुटवाने में लगे अखबार : यशवंत, जी हद हो गई एक तरफ अखबार चलाने वाले लोगों को इंसाफ दिलाने का दम भरते हैं वहीं दूसरी तरफ खुद अखबार ही जनता को लुटवाने में लगे हुए हैं। तमाम अखबारों में विज्ञापन को लेकर इस कदर होड़ मची रहती है कि वो ये तक नहीं देखते की जनता तक जो मैसेज पहुंचाया जा रहा है उसमें कितनी सच्चाई है। इसका उदाहरण मैं इस तरह से देना चाहूंगा। अमर उजाला में क्लासीफाइड पेज आता है। उस पर दुनियाभर के अनगिनत विज्ञापन छोटे छोटे कोलम में दिए होते हैं।

: लोगों को खुद लुटवाने में लगे अखबार : यशवंत, जी हद हो गई एक तरफ अखबार चलाने वाले लोगों को इंसाफ दिलाने का दम भरते हैं वहीं दूसरी तरफ खुद अखबार ही जनता को लुटवाने में लगे हुए हैं। तमाम अखबारों में विज्ञापन को लेकर इस कदर होड़ मची रहती है कि वो ये तक नहीं देखते की जनता तक जो मैसेज पहुंचाया जा रहा है उसमें कितनी सच्चाई है। इसका उदाहरण मैं इस तरह से देना चाहूंगा। अमर उजाला में क्लासीफाइड पेज आता है। उस पर दुनियाभर के अनगिनत विज्ञापन छोटे छोटे कोलम में दिए होते हैं।

कोई बेरोजगारों को जॉब दिलाने का दावा करता है तो कोई टेलीफोन का टॉवर लगाने के लिए नाम पर लोगों को लाखों रुपये की इनकम दिलवाने की बात करता है। इस विज्ञापन में बकायदा संबंधित कंपनी का नाम मोबाइल नंबर भी दिया होता है। चाहे बात जॉब दिलाने की हो या फिर टेलीफोन का टॉवर लगाने की ऐसे जाने कितने ही मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें लोगों अपनी खून पसीने की कमाई लूटा चुके हैं। जब भी इस तरह की कोई घटना होती है अखाबार से लेकर न्यूज़ चैनल इन खबरों को जमकर चलाते हैं। लेकिन सवाल ये है कि इन घटनाओं को जिम्मेदार भी तो मीडिया खुद ही हैं। लोगों का कहना होता है कि उन्होंने अखबार में विज्ञापन पढ़ा था और उसे पढ़ने के बाद ही वो संबंधित व्यक्ति या कंपनी के झांसे में आ गए, ऐसे में यहां सवाल ये उठता है कि क्या इन विज्ञापनों को बुक करते वक्त इनकी वास्तविकता की जांच नहीं की जाती है। जब मीडिया को इस बात की पहले से ही जानकारी है कि इन तरह के विज्ञापनों में हमेशा धोखाधड़ी की बात ही सामने आते है तो फिर उन्हें अखबारों में छापा ही क्यों जाता है। इन बातों से साफ होता है कि पैसे कमाने के लिए अखबार वाले अपना स्तर इतना गिरा चुके हैं जनता की परेशानियों से कोई सरोकार नहीं है।

अखबार वाले अब भागते चोर की लंगोटी ही सही वाली कहावत पर काम कर रहे हैं। अमर उजाला में छपे एक विज्ञापन की वास्तविकता परखने के लिए मैंने टेलीफोन टॉवर लगाने का दावा करने वाली एक कंपनी के पास कॉल की। कॉल सुनने वाले ने खुद को किसी एक्सिस कंपनी का वर्कर बताया। उसने कहा कि वो टेलीफोन का टॉवर लगवा देगा लेकिन उसके लिए पहले मुझे 5 सौ रुपये रजिस्ट्रेशन कराना होगा। उस व्यक्ति ने मेरे मोबाइल पर इस नंबर 09889369947 से पीएनबी बैंक का ये एकाउंट नंबर 0540000102471082 और नाम हरी प्रकाश का एसएमएस भेजा। इस एकाउंट में ही ये पैसे डलवाने को कहा गया है। ऐसे ही एक वाकया भरतपुर का है। अमर उजाला में ही एक विज्ञापन छपा जिसमें मारूति सुजुकी के गुडगांव मानेसर प्लांट में नौकरी दिलाने का दावा किया गया है। विज्ञापन के साथ ये नंबर 09829519017 दिया गया और कॉल करने पर संबंधित व्यक्ति ने अपना नाम जितेंद्र बताया। जो लोग विज्ञापन पर दिए गए पते पर भरतपुर पहुंचे उनसे साढे़ 6 सौ रुपये रजिस्ट्रेशन फीस वसूली गई और एक ज्वानिंग लैटर थमा दिया गया। लेकिन इनकी नौकरी कब लगेगी ये भगवान भरोसे है। कुल मिलाकर ये सब लिखने का मकसद ये है कि अखबार ऐसे लोगों के खिलाफ मुहिम चलाने की बजाए खुद उन्हें को सपोर्ट कर रहे हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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