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सुख-दुख...

उनके लिए जिन्हें मनीषा पांडेय के बोलने से मिर्ची लगती है….

Shahnawaz Malik : जिन लोगों को मनीषा पांडेय के बोलने से मिर्ची लग रही है, ये दरअसल वही लोग और वही मानसिकता है, जिसके खिलाफ उसकी लड़ाई है। और ये लड़ाई भी सिर्फ मनीषा की नहीं, बल्कि किसी भी पढ़े-लिखे, समझदार और संवेदनशील व्‍यक्ति की है। और अगर नहीं है तो होनी चाहिए। कुंठित लोगों के पास जब कुछ और नहीं बचता तो निजी टीका-टिप्‍पणियों पर उतर आते हैं। मैं पूछता हूं कि आप लोग उसे जानते कितना हैं? उसकी पढ़ाई, उसके काम, उसके लिखने से कितना वाकिफ हैं? पत्‍नी को "नौकरानी" कहने पर इतनी तकलीफ क्‍यों हो रही है आपको? आपको लगता है कि नौकरानी के लिए कुछ महान शब्‍द ईजाद कर देने से वास्‍तविकता बदल जाएगी। क्‍या आप वो भोले इंसान हैं जो सचमुच "यत्र नार्यस्‍तु पूज्‍यंते" टाइप स्‍लोगन को सच माने बैठा है।

Shahnawaz Malik : जिन लोगों को मनीषा पांडेय के बोलने से मिर्ची लग रही है, ये दरअसल वही लोग और वही मानसिकता है, जिसके खिलाफ उसकी लड़ाई है। और ये लड़ाई भी सिर्फ मनीषा की नहीं, बल्कि किसी भी पढ़े-लिखे, समझदार और संवेदनशील व्‍यक्ति की है। और अगर नहीं है तो होनी चाहिए। कुंठित लोगों के पास जब कुछ और नहीं बचता तो निजी टीका-टिप्‍पणियों पर उतर आते हैं। मैं पूछता हूं कि आप लोग उसे जानते कितना हैं? उसकी पढ़ाई, उसके काम, उसके लिखने से कितना वाकिफ हैं? पत्‍नी को "नौकरानी" कहने पर इतनी तकलीफ क्‍यों हो रही है आपको? आपको लगता है कि नौकरानी के लिए कुछ महान शब्‍द ईजाद कर देने से वास्‍तविकता बदल जाएगी। क्‍या आप वो भोले इंसान हैं जो सचमुच "यत्र नार्यस्‍तु पूज्‍यंते" टाइप स्‍लोगन को सच माने बैठा है।

अपनी बात मैं एक कहानी के जरिए कहना चाहूंगा। रूसी लेखक अस्‍कद मुख्‍तार का एक उपन्‍यास है- चिंगारी। रूसी क्रांति की पृष्‍ठभूमि में दागिस्‍तान के इलाके में हो रही भयानक समाजिक उथल-पुथल, बदलाव और स्‍त्री मुक्ति उपन्‍यास की विषयवस्‍तु हैं। सैकड़ों पात्रों की उस कहानी में एक कैरेक्‍टर है, जो एक गांव में रहने वाला अमीर व्‍यक्ति है। अविवाहित है। उसके घर में एक विधवा औरत नौकरानी का काम करती है। उसी के घर में रहकर पूरा घर संभालती है। बदले में वह उसे दो वक्‍त का खाना और कपड़ा देता है। याद रखें- तंख्‍वाह नहीं। और उसका यौन उपभोग भी करता है। वो बहुत ही गरीब बेसहारा औरत है। उपन्‍यास के बाद के हिस्‍सों में दिखाया है कि कैसे रूस में क्रांति हो चुकी है और सोवियत सोशलिस्‍ट प्रजातंत्र संघ बन गया है। क्रांति के बाद अब नए रूसी कानून के तहत घर में काम करने वाले नौकरों की तंख्‍वाह तय की दी गई है। अब उतना पैसा देना जरूरी ही नहीं, बल्कि कानून है।

ये कानून आते ही एक दिन वो आदमी अपनी नौकरानी को लेकर मौलवी साहब के पास जाता है और निकाह पढ़ा लाता है। अब वो उसकी ब्‍याहता है। सबकुछ वैसे ही चलता रहता है, जैसे चल रहा था। बस अब उसे तंख्‍वाह नहीं देनी पड़ेगी। सिर्फ नौकरानी रहती तो तंख्‍वाह देनी पड़ती। नौकरानी को पत्‍नी बना दिया तो उस जिम्‍मेदारी से भी छूट गए। पत्‍नी के घरेलू कामों पर प्‍यार और रिश्‍तों का मुलम्‍मा चढ़ाकर ही उसे आसानी से गुलाम बनाए रखा जा सकता है। अगर उसे एहसास हो जाए कि पत्‍नी शब्‍द सिर्फ छलावा है और हकीकत तो यही है कि वो नौकरानी है तो क्‍या होगा। इसलिए मैं चाहता हूं कि सच से डरने और उसे तोड़-मरोड़कर पेश करने वालों के खिलाफ मनीषा की ये लड़ाई जारी रहे। आपका तिलमिलाहट बता रही है कि उसके लिखे में ताकत है। वो मर्म पर चोट करती है। इसलिए आप बेचैन हैं।

शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से. जिन मनीषा पांडेय के बारे में शाहनवाज ने अपने फेसबुक पोस्ट में जिक्र किया है, वो मशहूर ब्लागर, इंडिया टुडे मैग्जीन के फीचर एडिटर और प्रखर महिलावादी है.

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