हमारी कांग्रेस हमारे नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय नेता नहीं मानती। हालांकि कांग्रेस के मानने या नहीं मानने से मोदी के होने या नहीं होने पर कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हमारे राजीव शुक्ला को आगे करके कांग्रेस जिस तरीके से नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय नेता नहीं मानने की बात कहती है, इससे मोदी को शुक्ला की बराबरी का नेता साबित करने का तुच्छ कांग्रेसी प्रयास कहा जा सकता है। हालांकि अपन थोड़ी बहुत राजनीति समझते हैं, इसलिए यह जानते है कि राजीव शुक्ला को तो मजा ही आ रहा है क्योंकि उनको मीडिया, क्रिकेट, कांग्रेस और फिल्मी दुनिया के अलावा मोदी के संदर्भों में भी अब समूचे देश में पहचाना जाने लगा है। लेकिन दिल पर हाथ रखकर उनसे कहने को कहेंगे, तो राजीव भी इतना तो जानते ही हैं कि मोदी सचमुच बहुत बड़े नेता हैं।
वैसे, राजनीति की भाषा में मोदी को राष्ट्रीय नेता नहीं बताने के राजीव शुक्ला के बयान को पार्टी के आदेश से बंधे हुए एक मजबूर आदमी का बयान कहा जा सकता है। अपना मानना है कि मोदी अगर राष्ट्रीय नेता नहीं होते, तो कांग्रेस को उनके होने को खारिज करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। सही मायने में कहा जाए तो, भारतीय राजनीति में बहुत समय बाद कोई ऐसा आदमी आया है, जिसके विरोध में खड़े हो जाना भले ही बहुत आसान हो, लेकिन उसे नजर अंदाज करना बहुत मुश्किल है। खासकर कांग्रेस के लिए। कांग्रेस इसीलिए लगी पड़ी है।
अपन कभी मोदी के मुरीद नहीं रहे। पर, राजीव शुक्ला की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर कांग्रेस के कहे कहे मोदी के जलवे को खारिज करने पर भी नहीं उतर सकते। राजीव शुक्ला अगर कांग्रेस की दया से मंत्री या राज्यसभा में नहीं होते, तो शायद नहीं करते। लेकिन क्योंकि राजीव शुक्ला के जीवन का वर्तमान कांग्रेस की मेहरबानियों पर निर्भर हैं, और भविष्य कांग्रेस की कलम से लिखा जा रहा है, सो मोदी की माया को खारिज करना भी उनकी किस्मत में लिखा है। कांग्रेस अपने पर राजीव शुक्ला जितनी मेहरबान होती तो अपन राजीव शुक्ला से भी आगे जाकर मोदी को किसी गली का नेता ही बताते। लेकिन फिलहाल ऐसा नही है सो, कांग्रेस पर हंसी आती है और तरस भी कि वह मोदी की तुलना शीला दीक्षित से करती है।
हालांकि सरदार मनमोहन सिंह तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के पीएम होने के बावजूद देश और राज्य के तो क्या किसी पंचायत स्तर के भी नेता नहीं बन पाए है, यह कांग्रेस भी समझती ही है। फिर वह इतना भी जानती ही है कि सिर्फ लगातार तीन बार सीएम बन जाने भर से ही कोई मजबूत सीएम या देश का नेता नहीं हो जाता। हमारे राजीव शुक्ला भी इतने अज्ञानी तो नहीं हैं कि वे यह नहीं जानते ही हों कि नरेंद्र मोदी न केवल एक सफल मुख्यमंत्री हैं, बल्कि घोर विरोध और तीव्र टकराव के बीच से निकले एक ऐसे नेता हैं, जिनके साथ के लिए बहुत सारे लोग पलक पांवड़े बिछाने को तैयार रहते हैं तो बहुत से लोग उन्हें दूर रखने के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। शीला दीक्षित तो बेचारी किसी गिनती में भी नहीं आती।
मोदी के राष्ट्रीय नेता होने को खारिज करने की राजनीति का सबसे दिलचस्प दृश्य यह है कि राजीव शुक्ला जब अपनी आत्मा की आवाज के विरुद्ध कांग्रेसी बयान दे रहे थे तो उसके ठीक उलट मोदी का आकषर्ण और विकषर्ण भारत की सीमाओं के बहुत पार जाकर यूरोप और अमेरिका तक में अपनी नई पटकथाएं लिख रहा था। बीजेपी के राष्ट्रीय अधिवेशन में मोदी का स्वागत जिस ढंग से किया गया, वह मोदी के राष्ट्रीय नेता होने का सबूत था। लेकिन कांग्रेस ने जिस तरह, तरीके और तासीर से उनके जलवे को खारिज करने की कोशिश की, उसे वंचित के विलाप से ज्यादा कुछ भी नहीं कहा जा सकता। वंचित का विलाप इसलिए, क्योंकि हमारे देश की राजनीति में नेता होने की जो जगह मोदी को हासिल है, उसके लिए उन्हें राहुल गांधी की तरह किसी वंश की विरासत का वारिस होने की जरूरत नहीं पड़ी। कांग्रेस का पेट तो इसलिए दुख रहा है साहब।
लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं.





