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लखनऊ

एडीजी अरुण कुमार के बयान के बाद डिप्टीएसपी कांड में पुलिसकर्मियों की स्वतंत्र जांच की मांग

डिप्टी एसपी जिया उल हक की हत्या मामले में कल 04 मार्च को रात्रि लगभग 09.30 बजे एनडीटीवी न्यूज़ चैनल पर एक कार्यक्रम में अरुण कुमार, एडीजी ला एंड ऑर्डर, यूपी द्वारा यह कहा गया था कि इस घटना में जिन पुलिसकर्मियों की जांच चल रही है उन्हें जल्द ही बर्खास्त कर दिया जाएगा. उन्होंने बताया कि इस सम्बन्ध में उच्चस्तर पर चर्चा हो चुकी है और यह निर्णय भी हो गया है कि ये सभी पुलिसकर्मी बर्खास्त किये जायेंगे.

डिप्टी एसपी जिया उल हक की हत्या मामले में कल 04 मार्च को रात्रि लगभग 09.30 बजे एनडीटीवी न्यूज़ चैनल पर एक कार्यक्रम में अरुण कुमार, एडीजी ला एंड ऑर्डर, यूपी द्वारा यह कहा गया था कि इस घटना में जिन पुलिसकर्मियों की जांच चल रही है उन्हें जल्द ही बर्खास्त कर दिया जाएगा. उन्होंने बताया कि इस सम्बन्ध में उच्चस्तर पर चर्चा हो चुकी है और यह निर्णय भी हो गया है कि ये सभी पुलिसकर्मी बर्खास्त किये जायेंगे.

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने इस पर कड़ा प्रतिरोध जताते हुए कहा है कि विभागीय कार्यवाही एक अर्धन्यायिक कार्यवाही होती है जिसमे किसी प्रकार के पूर्वाग्रह के लिए कोई स्थान नहीं है. अरुण कुमार द्वारा पहले से ही विभाग का मंतव्य बताने से दिखता है कि यह कार्यवाही मात्र दिखावा है और प्राकृतिक न्यायक सिद्धांत के विपरीत है. अतः उन्होंने मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश को निवेदन किया है कि न्याय के लिए ये जांच पुलिस विभाग से अलग किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी से कराये जाएँ .

In the DSP Zia Ul Haq murder case, yesterday (04 March) at around 09.30 PM, Arun Kumar ADG (Law and order), UP said in a program on NDTV channel that all the policemen against whom enquiry has been initiated will be soon dismissed from service. He said that high level discussions have taken in this matter and it has been decided that all policemen will be dismissed.

Social activist Dr Nutan Thakur has opposed this stating that Departmental Enquiry is a quasi-legal proceeding where there is no place for preconceived notions. Arun Kumar’s statement shows that the Police department has already made up its mind and the enquiry is merely a showpiece and is against the Principal of Natural Justice. Hence she has requested the Chief Secretary, UP to get the enquiry conducted by a senior officer of some other department in the interest of justice.

Copy of letter—

सेवा में,
मुख्य सचिव,
उत्तर प्रदेश शासन,
लखनऊ
विषय- स्वर्गीय डिप्टी एसपी जिया उल हक मामले में पुलिसकर्मियों पर की जाने
वाली कार्यवाही विषयक
महोदय,

कृपया निवेदन है कि 02/03/2013 को ग्राम बलीपुर जनपद प्रतापगढ़ में हुए तिहरे हत्याकांड, जिसमे स्वर्गीय डिप्टी एसपी जिया उल हक की हत्या हुई है, का सन्दर्भ लेने की कृपा करें.

हम सभी सहमत हैं कि यह अत्यंत ही जघन्य घटना है और इसमें एक होनहार, मेधावी युवा डिप्टी एसपी की जान चली गयी. समाचारपत्रों के अनुसार इस घटना के समय स्वर्गीय हक के साथ कुछ अन्य पुलिसकर्मी भी थे जिन्होंने अपनी भूमिका नहीं निभायी और अब तक प्राप्त खबरों के अनुसार संभवतः स्वर्गीय हक को मौके पर अकेला छोड़ कर भाग गए.

समाचारपत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार कर्तव्यपालन में शिथिलता तथा अन्य गंभीर आरोपों के सन्दर्भ में कई उपनिरीक्षक तथा कॉन्स्टेबल स्तर के पुलिसकर्मी निलंबित किये गए हैं अथवा उनके कृत्यों/अकृत्यों के सम्बन्ध में जांच कराई जा रही है. यदि इन पुलिसकर्मियों ने अपनी भूमिका सही नहीं निभायी है अथवा किसी प्रकार से अनुचित पायी जाती है तो उनके विरुद्ध निश्चित रूप से कठोरतम दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए. यह भी उचित हो कि ऐसी कार्यवाही यथाशीघ्र हो ताकि इसका कठोर सन्देश दूसरे पुलिसकर्मियों को भी जाये.

लेकिन इसके साथ यह भी देखा जाना नितांत आवश्यक है कि कोई भी कार्यवाही पूर्वाग्रह अथवा पूर्व निर्धारित भावना से नहीं की जाए. वस्तुतः यह प्राकृतिक न्याय का आवश्यक सिद्धांत है कि न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए. यदि पूर्वाग्रह के भाव के साथ किसी भी कर्मचारी के विरुद्ध कार्यवाही की जाती है तो वह सर्वथा अनुचित और गलत होगी.

कल दिनांक 04/03/2013 (सोमवार) को समय लगभग 09.20-09.25 बजे रात्रि को एनडीटीवी के हिंदी न्यूज़ चैनल को देखने के बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि शायद इन पुलिसकर्मियों के साथ न्याय नहीं हो सके. मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि मैं कल रात एनडीटीवी पर प्रख्यात उद्घोषक श्री रवीश कुमार का एक प्रोग्राम देख रही थी तो उसमे श्री रवीश कुमार के साथ श्री एस आर दारापुरी, अवकाशप्राप्त आईपीएस और अन्य लोगों के साथ श्री अरुण कुमार, एडीजी ला एंड ऑर्डर, उत्तर प्रदेश भी इस कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे. बातचीत के दौरान जब श्री रवीश कुमार ने श्री अरुण कुमार से यह पूछा कि बाकी अफसर क्यों हट गए, इन पर हत्या का मामला बनता है क्या? श्री अरुण कुमार ने उसके उत्तर में कहा था कि इस घटना में दोषी तथा अपने कर्तव्यपालन में लापरवाही करने वाले सभी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही होगी. यहाँ तक तो बिलकुल ठीक था लेकिन उसके बाद श्री

अरुण कुमार ने यह भी कहा कि इन पुलिसकर्मियों को जल्द ही बर्खास्त किया जाएगा. उन्होंने बताया कि इस सम्बन्ध में उच्चस्तर पर चर्चा हो चुकी है और यह निर्णय भी हो गया है कि ये सभी पुलिसकर्मी बर्खास्त किये जायेंगे. उन्होंने कहा कि अभी भी तने साक्ष्य उनके पास हैं कि वे पुलिसकर्मी बर्खास्त किये जा सकते हैं लेकिन इन्हें कोर्ट में लाभ मिल सकता है. अतः यह तय किया जा चुका है कि एक महीने में विभागीय कार्यवाही कर लिया जाए और इन्हे बर्खास्त कर दिया जाए.

यह समाचार पुनः आज दिनांक 05/03/2013 को प्रातः नौ से दस बजे तक एनडीटीवी पर दिखाया गया.

चूँकि मैं मानव अधिकार और न्यायिक अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत हूँ अतः मुझे श्री अरुण कुमार की यह बात बहुत अजीब और गलत लगी. विभागीय कार्यवाही एक अर्धन्यायिक कार्यवाही होती है और यह एक विधिक प्रक्रिया के तहत सम्पादित की जाती है. इस कार्यवाही में किसी भी प्रकार का पूर्वाग्रह अनुमन्य नहीं है और दोषी कर्मचारियों को अपनी बात कहने का पूरा अवसर दिया जाता है.

ऐसे में पुलिस के सर्वोच्च पद पर बैठे एक जिम्मेदार अधिकारी द्वारा शासन तथा पुलिस विभाग की ओर से इस प्रकार की बात कहना और ऐसे निष्कर्ष निकालना इस बात को दर्शाता है कि इन पुलिसकर्मियों के मामले में पहले से ही मंतव्य बना लिया गया है और मात्र अब औपचारिकताएं की जा रही हैं. यह सीधे-सीधे न्याय का गला घोंटना होगा. हमारे देश में आतंकी अभियुक्त अजमल कसाब तक को पूरी न्यायिक प्रक्रिया के बाद फांसी दी गयी पर इस मामले में एडीजी स्तर के जिम्मेदार अधिकारी ने पहले ही यह निर्णित और घोषित कर दिया है कि इन सभी पुलिसकर्मियों को जल्द ही बर्खास्त कर दिया जायेगा.

मैं एक बार भी नहीं कह रही कि वे पुलिसकर्मी निर्दोष थे अथवा नहीं. मैं इस सम्बन्ध में व्यक्तिगत स्तर पर अधिक नहीं जानती यद्यपि समाचारपत्रों के माध्यम से आ रही खबरें उन्हें दोषी बता रही हैं. यदि वे दोषी हों तो निश्चित रूप से दण्डित हों पर दंड का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के पूर्व ही कर लिया जाना सर्वथा अनुचित है.

मैं चाहूंगी कि आप मेरी बात ना मान कर इस सम्बन्ध में अपने स्तर से दिखवा लें कि श्री अरुण कुमार द्वारा कथित रूप से कही गयी जिन बातों का मैं उल्लेख कर रही हूँ क्या वे सही हैं अथवा नहीं. मेरी समझ में इसके लिए एनडीटीवी के उस प्रोग्राम की सीडी से पूरी बात स्वयं ही स्पष्ट हो जायेगी. यदि मेरी कही बात सही पायी जाति है तो ऐसी स्थितियों में यह नहीं दिखता कि
पुलिस विभाग द्वारा स्वर्गीय जिया उल हक की हत्या से सम्बंधित मामले में प्रथमद्रष्टय दोषी ठहराए गए पुलिसकर्मियों के साथ पुलिस विभाग के किसी अधीनस्थ अधिकारी द्वारा न्यायसंगत और निष्पक्ष जांच की जा सकेगी.

अतः मैं न्याय के तकाजे के लिए आपसे यह निवेदन करती हूँ कि कृपया न्याय की मूलभूत अवधारणा तथा उपरोक्त वर्णित तथ्यों के दृष्टिगत इस मामले में सभी पक्षों को न्याय देने की शासन की अनिवार्यता के तहत ये जांच पुलिस विभाग से अलग किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी से कराये जाएँ ताकि कथित दोषी पुलिसकर्मियों के सम्बन्ध में बिना पूर्वाग्रह के निष्पक्ष और न्यायपरक कार्यवाही हो सके.

पत्र संख्या- NT/ZUH/ADG/01
भवदीय,
दिनांक-05/03/2013

(डॉ नूतन ठाकुर )

5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
094155-34525

प्रतिलिपि- 1. प्रमुख सचिव (गृह), उत्तर प्रदेश शासन को आवश्यक कार्यवाही हेतु
2. पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश को आवश्यक कार्यवाही हेतु

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