: डीएनए टेस्ट की अर्जी लगी, टेस्ट हुआ और वह बेगुनाह साबित हुआ, लेकिन उसके पहले कोर्ट और पुलिस गुनाहगार मानकर सात साल की सजा सुना चुके थे : दिल्ली में दामिनी के साथ जो गैंगरेप हुआ उसके बाद बलात्कार पर खूब हल्ला मचा। नेताओं, प्रशासकों, पुलिस से लेकर आम आदमी तक के बयान हर जगह पढ़ने और सुनने को जमकर मिले। अपराध के खिलाफ यह सब होना भी चाहिए और कड़ी से कड़ी सजा के प्रावधान के अलावा नेक और सही नागरिक बनाने के लिए जो कदम उठाए जा सकते हैं वे भी होने चाहिए।
दिल्ली गैंग रेप के बाद सरकार ने कानून में बदलाव की कई घोषणाएं की और कड़ी सजा के अलावा फांसी तक की मांग हुई और काफी कुछ हुआ भी। यह भी कहा गया कि जिसने बलात्कार किया हो, मर्डर किया हो उसे होने वाली फांसी पर राष्ट्रपति को दया नहीं दिखानी चाहिए। हालांकि, विरोधाभास देखें तो पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने पद से विदाई पूर्व जिन लोगों की फांसी की सजा माफ की उनमें कुछ बलात्कार और हत्या के आरोपी भी थे। एक महिला राष्ट्रपति यदि एक महिला की पीड़ा को समझती तो बेहतर होता लेकिन यह राष्ट्रपति का अधिकार है कि उन्हें क्या करना है।
बलात्कार की खबरों के कवरेज में आम नागरिक के आक्रोश को मीडिया भी उबाल देता है। मीडिया ट्रायल यह चलती है कि देखना है कि कानून इस पीडि़ता को कब इंसाफ देता है और बलात्कारी को फांसी होती है या नहीं। समूचे देश में इस बलात्कारी को फांसी की सजा होनी चाहिए, यह मांग उठ रही है। लेकिन, यहां मैं एक ऐसे केस का जिक्र कर रहा हूं जिस व्यक्ति ने कभी बलात्कार नहीं किया. लेकिन एक औरत के पक्ष में बने कानून का कैसे दुरुपयोग किया गया और निर्दोष को जेल में डलवा दिया गया। उसे शारीरिक से ज्यादा मानसिक यातना भोगनी पड़ी। जेल से छूट भी गया कुछ साल बाद लेकिन एक तबाह मन मस्तिषक लेकर। मीडिया तो पकड़ते ही चिल्ला रहा था कि ऐसे बलात्कारी को फांसी होनी चाहिए। मान लें उसे फांसी जाती और बाद में पता चलता कि यह तो निर्दोष था, तो कोई उसे कैसे लौटा पाता। फिर जांच करने वालों को कौन कठघरे में खड़ा करता और उन्हें एक निर्दोष मानववध के लिए सजा देता।
यह किस्सा है मुंबई के समीप एक उपनगर बदलापुर का। बदलापुर में कुछ साल पहले एक लड़की ने अपने ही मौहल्ले के एक युवक पर रेप करने का आरोप लगाया। झटपट धरपकड़ हुई, मेडिकल टेस्ट हुए और पुलिस ने चार्टशीट दाखिल की। केस इतना मजबूत बना कि युवक को सात साल की जेल की सजा सुनाई गई। युवक जेल में सलाखों के पीछे। इस बलात्कार के नौ महीने बाद पीडि़ता ने एक बच्चे को जन्म दिया। पीडि़ता ने मढ़ दिया कि यह बच्चा इस रेप की देन है। जीवन के सपनों की खूब आस लगाए युवक के मां बाप और परिवार वालों ने भी उससे सारे संबंध तोड़ लिए। वे उससे कभी जेल भी मिलने नहीं गए। वह युवक बेबस रहा और उससे पुलिस वालों और उसके वकील ने पूछा तो भी वह यही कहता रहा कि उसने कोई बलात्कार नहीं किया है। लेकिन कोई चारा ही नहीं थी उसके पास।
इस दौरान जेल में उस युवक का एक बचपन का मित्र यदा कदा मिलने आता था, उसने उससे कहा कि मित्र आज कोई मुझ पर यकीन नहीं कर रहा लेकिन मेरा भरोसा करों मैंने कोई बलात्कार नहीं किया है। साथ ही बलात्कार का आरोप लगाने वाली लड़की जिस बच्चे को मेरा बच्चा बता रही है, वह मेरा नहीं है। तुम मेरी मदद करो और मुंबई हाईकोर्ट में मेरी याचिका लगाओं कि मैं मेरा और बच्चे का डीएनए टेस्ट करवाना चाहता हूं क्योंकि जिस बलात्कार और उससे उपजे बच्चे की बात की जा रही है वह मेरा नहीं है। डीएनए टेस्ट के लिए आने वाले खर्च को भी उसने उठाने की तैयारी बताई। आरोपी ने अपने दोस्त से यह खर्चा उठाने की हामी करा ली थी और वचन दिया था कि जेल से छूटने के बाद वह यह पैसे लौटा देगा। उसने अपने मित्र से कहा था कि एक बार मेरा भरोसा कर लो, मैं बेदाग हूं। इस खासे आश्वासन के बाद मित्र ने डीएनए टेस्ट के पैसे भरे।
अब अदालत ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया। लड़की, आरोपी और कथित बलात्कार से उपजे बच्चे के डीएनए के लिए नमूने भेजे गए और जब रिपोर्ट आई तो सब के सब दंग रह गए। वह बच्चा उस बलात्कारी का था ही नहीं। माननीय अदालत ने पुलिस को आदेश दिया की लड़की को हिरासत में लेकर उल्टी जांच की जाए। तब यह समाने आया कि एक दिन सरकारी नल पर पानी भरने को लेकर हुए झगड़े की वजह से वह लड़की उस लड़के से बदला लेना चाहती थी और अपने प्रेमी से गर्भवती थी। इसलिए निर्दोष लड़के को फंसा दिया। साथ ही घरवालों को शादी पूर्व प्रेमी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे में पता न चले, इसलिए यह खेल खेल दिया। आप सभी सुधी पाठक यह बताएं कि यदि लड़के को मीडिया ट्रायल से फांसी हो जाती, पुलिस की पुख्ता रिपोर्ट से सात साल जेल में रह जाता, अदालत जाते समय भीड़ के गुस्से का शिकार हो जाता तो
जिम्मेदार कौन होता। कानून बनाइए एकदम कड़े, सख्त जांच कीजिए लेकिन यह भी सोचिए कि जिसे आरोपी बताया जा रहा है वह निर्दोष भी हो सकता है एवं असली खेल कुछ और ही हो।
लेखक कमल शर्मा, लेखक पिछले 22 वर्ष से पत्रकारिता में हैं. इन दिनों मुंबई में एक मीडिया कंपनी में पदस्थ हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.





