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टीवी में बच्चों के शोषण पर रोक

देश में मनोरंजन चैनलों पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों में बच्चों से हाड़तोड़ मेहनत करवाई जा रही है। रियलिटी शो के लिए काम करने वाले बच्चों को तो कई बार जज बने लोग इस तरह से शर्मसार करते हैं कि अबोध बच्चे शो में ही रो पड़ते हैं। धारावाहिकों में काम करने की वजह से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के साथ ही उनके मन-मस्तिष्क पर भी बुरा असर पड़ता है लेकिन धारावाहिक निर्माताओं को बच्चों के स्वास्थ्य से कोई मतलब नहीं है।

देश में मनोरंजन चैनलों पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों में बच्चों से हाड़तोड़ मेहनत करवाई जा रही है। रियलिटी शो के लिए काम करने वाले बच्चों को तो कई बार जज बने लोग इस तरह से शर्मसार करते हैं कि अबोध बच्चे शो में ही रो पड़ते हैं। धारावाहिकों में काम करने की वजह से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के साथ ही उनके मन-मस्तिष्क पर भी बुरा असर पड़ता है लेकिन धारावाहिक निर्माताओं को बच्चों के स्वास्थ्य से कोई मतलब नहीं है।

यहां तक कि किसी-किसी धारावाहिक में तो बच्चे ऐसे जोखिम भरे काम करते दिखाई देते हैं, जिसे करने में बड़ा आदमी भी डरता है। बच्चों के अभिनय से सजे धारावाहिकों की मनोरंजन चैनलों पर बाढ़ आई हुई है, जिसे देखते हुए सरकार ने अब तय किया है कि बच्चों से विपरीत परिस्थितियों में काम नहीं कराया जा सकता। राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग द्वारा कई शिकायतों के बाद बच्चों से अभिनय करवाने वाले निर्माताओं के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।

दरअसल केंद्र सरकार को लगातार इस बारे में शिकायतें मिल रही थीं कि विभिन्न धारावाहिकों में बच्चों से बहुत अधिक काम कराया जा रहा है और उन्हें काम के बदले केवल मामूली भुगतान किया जा रहा है। राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग द्वारा बच्चों के द्वारा अभिनीत किए जाने वाले सीरियलों के लिए जो दिशानिर्देश दिए गए, उनके अनुसार, बच्चों से कोई ऐसा संवाद नहीं बुलवाया जा सकता, जो उनकी उम्र के अनुसार न हो यानी किसी भी हाल में द्विअर्थी संवादों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। निर्माता, बच्चों से जब शूटिंग करवाएंगे तो उनके माता-पिता में कोई एक अभिभावक शूटिंग के दौरान मौजूद रहेगा।

अगर बच्चे रियलिटी शो में काम कर रहे हैं तो जज बच्चों को निरुत्साहित करने वाली टिप्पणी नहीं कर सकते हैं बल्कि जज बच्चों को उत्साहित करने वाली बातें ही करेंगे। बच्चों से लगातार शूटिंग नहीं करवाई जा सकती है बल्कि शूटिंग के दौरान उन्हें हर एक घंटे में ब्रेक दिया जाना अनिवार्य है। बच्चों के मेकअप में इस्तेमाल होने वाले सौंदर्य प्रसाधनों में खतरनाक रसायनों का समावश नहीं होना चाहिए। बच्चों के मेकअप में उसी सौंदर्य सामग्री का प्रयोग किया जाए, जिसे सरकारी स्वीकृति प्राप्त हो।

शूटिंग के दौरान बच्चों को तेज रोशनी से बचाया जाए। राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग द्वारा बच्चों के हक में बहुत उम्दा दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। इन दिशानिर्देशों का पालन उन निर्माताओं को करना है, जो बच्चों से काम करवा रहे हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग का कहना है कि अगर कोई निर्माता इन दिशानिर्देशों को नहीं मानता तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। बच्चों को लेकर मनोरंजन चैनलों पर ऐतिहासिक, धार्मिक, रियल्टी शो, हास्य और पारिवारिक-सामाजिक धारावाहिकों का प्रसारण चल रहा है। इन धारावाहिकों के निर्माण के बारे में बताया जाता है कि बच्चों को दिनभर मेकअप करके बैठा दिया जाता है, उन्हें मामूली पारिश्रमिक दिया जाता है।

कई बार तो ऐसा भी होता है कि बच्चों से निर्माता लगातार टेक पर टेक लेता रहता है। कई शो के दौरान जज बच्चों पर चीखने-चिल्लाने लगते हैं। बच्चों के माता-पिता अगर कहते हैं कि शूटिंग का वक्त पूरा हो गया तो उन्हें प्रोडक्शन मैनेजर यह कहकर धमकाता है कि उनके साथ कानूनी तौर पर करार हुआ है, लिहाजा ज्यादा न बोलो। बच्चों को कई बार भारी-भरकम वस्त्र पहनने के लिए दे दिए जाते हैं।

कई धारावाहिकों में बच्चों से ऐसे काम करवाए जाते हैं, जो उनकी उम्र के साथ न्याय नहीं करते। टेलीविजन पर इन दिनों जो धारावाहिक प्रमुखता से प्रसारित हो रहे हैं, उनमें बच्चों के किरदार भी बहुत हैं, जिनसे अभिनय करने वाले बच्चों की शिक्षा पर भी असर पड़ रहा है। राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग ने तय कर दिया है कि धारावाहिकों में काम करने वाले बच्चों की शिक्षा पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए। बच्चे देश के भविष्य हैं और उनकी बेहतरी के लिए सरकार ने यह वास्तव में अच्छा कदम उठाया है।

देश के खबरिया चैनल भी बच्चों पर केंद्रित कार्यक्रमों को दिखाते वक्त उनके शोषण की खबरें प्रमुखता से नहीं दिखाते बल्कि मनोरंजन चैनलों पर प्रकाशित होने वाले बच्चों के रियल्टी शो और दूसरे धारावाहिकों की खबरें चुटीले अंदाज में दिखाते रहते हैं। जबकि होना तो यह चाहिए कि खबरिया चैनलों को अपने कंटेंट में बच्चों के लिए भी कुछ ज्ञानवर्धक कार्यक्रम शामिल करने चाहिए, क्योंकि दूसरे लोगों की तरह बच्चे भी खबरिया चैनलों और मनोरंजन चैनलों पर प्रकाशित होने वाले कार्यक्रम देखते हैं।

'शुक्रवार' मैग्जीन से साभार

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