अगर कुछ समय पहले प्रतापगढ़ में दर्जनों मुस्लिमों के घर जलाने वाले आरोपियों को कड़ी सजा दे दी गई होती तो अखिलेश सरकार को इस फजीहत का सामना नहीं करना पड़ता और ना ही एक होनहार, ईमानदार पुलिस अफसर को अपनी जान से यूं हाथ धोना पड़ता। सरकार के एक साल पूरा होने से पहले हुए इस तिहरे हत्याकांड ने सरकार का जातीय संतुलन गड़बड़ा दिया है। रोज बदल रहे घटनाक्रम में संघ और बीजेपी को एक नए बाहुबली नेता के नजदीक जाने की संभावना दिख रही है तो समाजवादी पार्टी को यह सूझ ही नहीं रहा कि वह मुस्लिमों की लगातार बढ़ रही नाराजगी को कैसे दूर करे?
एक साल के भीतर सत्ताइस जगह पर हुई सांप्रदायिक झड़पों और दंगों ने प्रदेश के सामाजिक तानेबाने को तितर-बितर कर दिया है। पुलिस अफसरों के नाकारापन ने पूरे प्रदेश में मानो गुंडाराज ला दिया है। आगामी लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद का सपना देख रहे मुलायम सिंह को इससे निपटने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। प्रदेश में जिस तरह मुस्लिम इस घटना के विरोध में सड़क पर आ रहे हैं उससे सरकार पसीने पसीने हो गई है। अब राजा भैया की गिराफ्तारी पर भी विचार शुरू हो गया है। जिस दिन अखिलेश यादव ने राजा भैया के साथ शपथ ली थी उसी दिन सरकार का भविष्य तय हो गया था। सभी को हैरत हुई थी कि डीपी यादव को अपराधी होने की बात कह कर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने वाले अखिलेश यादव के सामने आखिर ऐसी क्या मज़बूरी आ गई थी कि उन्हें अपराधी छवि के राजा भैया जैसे निर्दलीय विधायक को मंत्री बनाने का फैसला लेना पड़ा। सरकार बनने के एक घंटे के भीतर सभी चैनल पर सरकार के खिलाफ जो पहली खबर चली वह यही थी। सभी मान रहे थे कि अखिलेश यादव नहीं चाहते थे कि उनके मंत्रिमंडल में कोई अपराधी हो मगर अपने पिता मुलायम सिंह की जिद के आगे वह खामोश हो गए। बाद में समाचार प्लस चैनल पर बोलते हुए समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहन सिंह ने माना था कि अखिलेश यादव राज भैया को मंत्री नहीं बनाना चाहते थे।
दरअसल मुलायम सिंह जाति की राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। वह प्रदेश में मुस्लिम, यादव और राजपूतों का गठजोड़ तैयार करना चाहते थे। राजा भैया इस गठजोड़ के मुख्य पात्र हो सकते थे लिहाजा उन पर लगे हत्या, अपहरण और डकैती जैसे आरोप छोटे पड़ गए और राजा भैया का क्षत्रिय होना सब पर भारी पड़ गया। अखिलेश सरकार की उस समय और किरकिरी हुई जब राजा भैया को जेल विभाग दे दिया गया। इसके बाद प्रतापगढ़ में एक बार फिर आतंक की नयी गाथायें शुरू हो गई। जेलों में उनके कारनामे सुर्खियां बटोरने लगे तो कुछ दिन पहले उनसे जेल का काम काज वापस ले लिया गया। इसी बीच प्रतापगढ़ में एक दलित किशोरी के साथ बलात्कार की घटना हो गई। घटना में एक मुस्लिम युवक के शामिल होने की बात सामने आई। नाराज लोगों ने लगभग अस्सी मुस्लिमों के परिवारों के घर जला दिए गए। महिलाओं के साथ बदसलूकी की गई। मगर किसी भी शख्स के खिलाफ कुछ नहीं हो सका क्योंकि मुलजिम राजा भैया के करीबी माने जाते थे। मगर इस घटना के बाद से राजा के समर्थक और ज्यादा सबक सिखाने के मूड में आ गए।
इसी बीच कुण्डा में जियाउलहक़ की सीओ पद पर तैनाती हो गई। सूत्रों का कहना है कि प्रतापगढ़ में आगजनी की घटना के अभियुक्तों के बारे में भी जियाउल हक़ पूछताछ करने लगे थे। राजा के कारिंदों को इस बात से भी बहुत नाराजगी थी कि जियाउलहक़ राजा के दरबार में हाजिरी नहीं लगा रहे हैं। और इसके बाद उन्हें सबक सिखाने की कोशिशें शुरू हुईं जो जियाउलहक़ की मौत पर जाकर ख़त्म हुईं। घटना के बाद प्रतापगढ़ से लेकर लखनऊ तक के अफसर असहाय बने नजर आये। उन्हें लापरवाह कर्मियों को ही निलंबित करने में लम्बा समय लग गया। जब सरकार को खुफिय़ा तंत्र ने बताया कि इस घटना के बाद पूरे प्रदेश के मुस्लिमों में भारी नाराजगी है साथ ही इमाम बुखारी भी जियाउलहक के परिवार से मिलने जा रहे हैं तो सरकार चला रहे लोगों को समझ आ गया कि अब राजा के इस्तीफे के अलावा कोई और चारा नहीं बचा। लिहाजा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने घर बुलाकर राजा भैया का इस्तीफा ले लिया।
मगर विपक्ष इतने से खामोश नहीं बैठने वाला था। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक इस हत्याकांड की भयंकर गूंज सुनाई दी। यूपी विधानसभा में भी पूरे विपक्ष ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाये। राजा भैया ने उसी दिन प्रेस कांफ्रेंस करके अप्रत्यक्ष रूप से मुख्यमंत्री को भी इसमें लपेटते हुए कहा कि जिस समय यह घटना हुई उस समय वह अपने गनर और ड्राइवर के साथ इसकी सूचना देने गये थे और खुद मुख्यमंत्री ने उनके गनर से पूछा था कि क्या हाल है। मगर दिन बीतते बीतते जब मरहूम सीओ की पत्नी परवीन आजाद ने कहा कि मुख्यमंत्री के आने तक वह अपने शौहर को नहीं दफनायेंगी और अगर मुख्यमंत्री नहीं आये तो वो आत्महत्या कर लेंगी। इस बात ने सरकार की बेचैनी और बढ़ा दी। मौके पर प्रदेश के डीजीपी को भेजा गया मगर लोग इतने नाराज थे कि लोगों ने उन्हें बंधक बना लिया और उन पर चप्पलों की माला तक फेंक दी गयी और उन्हें चूडिय़ा भेंट करने की कोशिश की गयी। अब सरकार के पास इस बात के अलावा कोई चारा नहीं बचा था कि मुख्यमंत्री स्वयं वहां पर जाते। लिहाजा मुख्यमंत्री ने आजम खां के साथ वहां जाने का फैसला किया।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इससे पहले सभी महत्वपूर्ण जगहों पर मुख्यमंत्री के साथ अहमद हसन नजर आते थे जो आजम खां के विरोधी माने जाते हैं। मगर अखिलेश को समझ में आ गया कि जब बुखारी वहां मौजूद हों तो आजम खां के साथ के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। सीओ की पत्नी तक पहुंचने के लिए खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। लोग बेहद नाराज थे और उनके खिलाफ नारे लगा रहे थे। सीओ की पत्नी परवीन आजाद से मिलकर खुद मुख्यमंत्री की आंखों में भी आंसू आ गये। मुख्यमंत्री को उन्होंने बताया कि प्रतापगढ़ में सिर्फ एक राजा है और बाकी सब प्रजा। उन्होंने कहा कि उन्हें हर हालत में न्याय चाहिए। अब सरकार के पास एक ही चारा बचा था कि इस घटना की सीबीआई जांच की घोषणा कराकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाये। उधर बसपा सुप्रीमो मायावती ने मामले को जबरदस्त तरीके से संसद में उठाकर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की मांग कर डाली।
इस बीच पूरे प्रदेश में अल्पसंख्यकों में इस घटना को लेकर नाराजगी बढ़ती चली गयी। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों ने लखनऊ कूच करने का एलान कर दिया। इन छात्रों का कहना है कि एक वर्ष के भीतर प्रदेश में दो दर्जन स्थानों पर हुए सांप्रदायिक बलवों में अधिकांश जगह अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ही मारे गये हैं या फिर उन्हीं के घरों और दुकानों में आगजनी हुई है। इनका कहना है कि राजा भैया के पिता के बारे में सभी जानते है कि वह संघ के कितने बड़े समर्थक हैं और पूर्व में उन्होंने मुस्लिमों के गांवों में किस तरह आगजनी करवाई है।
इस बीच भाजपा और संघ से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण लोंगों ने राजा भैया के करीबी लोगों से मुलाकात की है। राजनाथ सिंह से राजा भैया के तार लंबे समय से जुड़े रहे हैं। और अब जब प्रदेश भर के मुसलमान राजा भैया को खलनायक के रूप में देख रहें हैं तो ऐसे में राजा भैय्या को भी समझ में आ रहा है कि मुस्लिमों के वोट बैंक वाली समाजवादी पार्टी अब उन्हें और सहारा नहीं देने वाली। भाजपा के लोग भी उन्हें यह समझा रहे हैं कि उनकी गिरफ्तारी हो इससे पहले उन्हें भाजपा का दामन थाम लेना चाहिए। इससे पहले वह कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के मंत्रिमण्डल में रह भी चुके हैं। अखिलेश
सरकार के सामने बहुत संकट का दौर खड़ा हो गया है। मुस्लिमों के बढ़ते हुए गुस्से को देखकर अब अखिलेश के पास इस बात के अलावा कोई और चारा भी नहीं बचता दिख रहा कि वह राजा की गिरफ्तारी करवाएं, मगर ऐसा होते ही बड़ी संख्या में क्षत्रिय वोट समाजवादी पार्टी से किनारा कर लेगा। इन सबके बीच अखिलेश सरकार के उस सपने पर पानी फिर गया है जिसमें पन्द्रह मार्च को सरकार के एक साल पूरा होने पर भव्य कार्यक्रम करने का मन बनाया गया था।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.





