जरा सोचिए कि अगर नरेन्द्र मोदी गुजरात में तीसरी बार जीत हासिल नहीं करते तो क्या राष्ट्रीय स्तर पर उनकी इतनी चर्चा होती, क्या भाजपा उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रायोजित करती, क्या राजनाथ सिंह यह स्वीकार करते कि मोदी भाजपा में अभी के सर्वाधिक प्रिय नेता हैं, क्या राष्ट्रीय मीडिया में मोदी का इतना चरित्र-चित्रण किया जाता। शायद नहीं! दरअसल मुद्दा यह नहीं है कि 2014 के आम चुनाव में क्या होने जा रहा है या फिर आने वाले समय में क्या होगा? फिलवक्त तो विषय है कि चुनाव से पहले मोदी को लेकर जो चर्चाएं चल रही हैं उसके क्या मायने हैं। और इन सबको लेकर क्या निष्कर्ष हासिल होगा।
दरअसल 2002 में गुजरात में हुए दंगे ने नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक जीवन में ऐसा स्याह पक्ष जोड़ दिया है जो बार-बार उनके रास्ते में रुकावट डालता है। इस बात की चर्चा शायद फिजूल मानी जा सकती है कि मोदी उस दंगे में कहां तक संलिप्त हैं या फिर उनकी क्या भूमिका रही है? और ये मुद्दे तब उठे हैं जब मोदी को राष्ट्रीय भूमिका में देखा जा रहा है। नरेन्द्र मोदी को लेकर जो चर्चाएं चल रही हैं उसके परिप्रेक्ष्य में कई बातें सामने आ रही हैं, जिसमें अव्वल जो यही है कि मोदी को केन्द्र में रखकर जितनी भी चर्चाएं चल रही हैं वो दरअसल मोदी को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचा रही हैं। राष्ट्रीय मीडिया में हर जगह मोदी का चरित्र-चित्रण किया जा रहा है, यह स्वीकृति है कि मोदी वाकई राष्ट्रीय भूमिका में उभर रहे हैं और कहीं-न-कहीं चुनौती पेश कर रहे हैं। मोदी को गुजरात दंगे से जोड़कर चाहे जितना देखा जाए आज बारह साल बाद इस बात का कोई मतलब नहीं कि तब क्या हुआ था। आज लोग विकास की बात कर रहे हैं। गुजरात में भी ऐसा ही हो रहा है। गोधरा कांड के बाद से मीडिया में मोदी को जिस तरह उछाला गया और अल्पसंख्यकों का हत्यारा घोषित किया गया उसे इस बार के विधानसभा चुनाव ने धता बता दिया। आज जब वही अल्पसंख्यक मोदी को न सिर्फ स्वीकार कर रहा है बल्कि वह मोदी के विजन से विकास और तरक्की की एक नई परिभाषा गढ़ना चाहता है, तब गुजरात के बाहर के लोगों के माथे पर शिकन क्यों है?
दूसरी बात भाजपा के सहयोगी दलों की है, तो अभी तक यही देखा जा रहा है कि मोदी के नाम पर जनता दल (यू) के नेताओं की भृकुटी तन जा रही है। चाहे वो नीतीश कुमार हों, शरद यादव या फिर शिवानंद तिवारी, सब धर्मनिरपेक्ष बने फिर रहे हैं तो उन्हें इतना समझ लेना चाहिए कि जिस मुखालफत में नीतीश कुमार बिहार में सत्ता पर काबिज हैं उसकी नींव हिल चुकी है। इतना ही नहीं यशवंत सिन्हा ने जद (यू) को बातों-बातों में संदेश दे दिया है कि 2014 का विकल्प खुला है और फिर अरुण जेटली का बयान कैसे भुलाया जा सकता है कि जब उन्होंने कहा था कि ‘राजनीति में समीकरण बनते-बिगड़ते रहते हैं, 2014 का इंतजार कीजिए देखिए कितनी पार्टियां एनडीए की ओर भागती हैं।’ इससे तो साफ है कि भाजपा मोदी को लेकर किसी भी समझौते के मूड में नहीं है।
इसके अलावा जो अन्य बात है वह मोदी के व्यक्त्वि को लेकर है। इसमें कोई शक नहीं कि विपक्षी मोदी को लेकर सजग हैं। कांग्रेस हर हाल में मोदी को प्रायोजित नहीं होने देना चाहती। इसलिए वो बार-बार गोधरा के दंगे की बात कर रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या देश में गोधरा ही एकमात्र दंगा है जिसे याद किया जाए। दंगे हर उस व्यक्ति के लिए दुःस्वप्न की तरह होता है जिसमें वो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होता है, लेकिन बदलते समय में उसके जिन्न को बार-बार निकालना न तो राजनीति के लिए बेहतर है और न ही उस समाज के लिए जहां से दंगे की जड़ जुड़ी है। लेकिन विपक्षी और अल्पसंख्यकों के कथित रहनुमा इस बात से परे अलग दलील पेश करते रहे हैं। लेकिन क्या इसमें मोदी की जीत नहीं मानी जा सकती कि जिस बात को मुद्दा बनाकर कांग्रेस और अल्पसंख्यक मोदी को हराने चले थे उसी के आलोक में मोदी की जीत हुई।
अब सवाल यह है कि जब क्षेत्रीय मुद्दों ने क्षेत्रीय चुनाव की तस्वीर नहीं बदल पाई तो कैसे मान लिया जाए कि राष्ट्रीय स्तर पर उसकी भूमिका बढ़ जाएगी? 2014 के आम चुनाव में अभी लगभग एक साल का समय है तब तक काफी समीकरण बनेंगे-बिगड़ेंगे, लेकिन आज जिस मुद्दे पर बहस हो रही है इसका प्रतिफल मोदी के पक्ष को मजबूत करने के लिए काफी है। जिस अल्पसंख्यक समुदाय को केन्द्र में रखकर मोदी का आकलन किया जा रहा है वो विकास के सपने देख रहा है, वो चंद प्रतिनिधियों की बातों से इत्तेफाक नहीं रखता जिन्हें मोदी अल्पसंख्यकों के दुश्मन नजर आते हैं। उसे लम्बी-लम्बी बहस रास नहीं आती। वो समाज में अपनी जगह बनाना चाहता है लेकिन ‘अल्पसंख्यकों’ के रूप में नहीं।
लेखक अजय पांडेय अमर भारती से जुड़े हैं.





