सेल, इंडियन एयर लाइंस, भारतीय रेल और भूतल परिवहन मंत्रालय यह ऐसे विभाग हैं, जिनके विज्ञापन पायल श्रीवास्तव की मैग्जीन में हमेशा दिखाई देते हैं। पायल श्रीवास्तव की मैग्जीन कितनी छपती है और कहां-कहां प्रसारित होती है, यह एक अलग शोध का विषय है, लेकिन पायल श्रीवास्तव जिस धड़ल्ले से पत्रकारिता करती हैं, उससे दिल्ली की कई महिला पत्रकारों को जलन होती है। जलन होना स्वाभाविक भी है। पायल जी ने बहुत कम वक्त में सब कछ हासिल कर लिया, जिसे पाने के लिए दूसरों को बीस वर्षों से ज्यादा का वक्त लगता है।
पायल जी कानपुर की रहने वाली थीं। 1980 में विवाह के बाद अपने पति के साथ दिल्ली आईं। पति एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर थे। घर-गृहस्थी की गाड़ी ठीक चल रही थी। पायल जी के पति जिस कंपनी में काम करते थे, वह एक्सपोर्ट के धंधे में थी। एक बार कंपनी किसी विवाद में पड़ गई। अखबारों में खबरें छपना शुरू हुईं। कंपनी प्रबंधन ने पायल जी के पति को मीडिया को साधने के लिए लगाया। उन्होंने कुछ बड़े अखबार वालों को बुलाया और अपना पक्ष बताकर मदद की गुहार लगाई। इस प्रक्रिया में कंपनी का अच्छा-खासा पैसा खर्च हुआ। कुछ अखबारों ने विज्ञापन के तौर पर मदद ली तो कुछ के पत्रकारों ने सीधे अपनी जेब गरम की। पायल जी के पति को लगा कि मीडिया तो वास्तव में बहुत बड़ी चीज है। किसी को भी बना-बिगाड़ सकता है। उन्होंने घर पर पत्नी से बात की और कहा कि तुम घर में अकेली ही तो रहती हो, क्यों न कोई छोटा-सा अखबार शुरू कर दो। पत्नी ने पहले मना किया लेकिन श्रीवास्तव जी को लग रहा था माल काफी है इस धंधे में। लिहाजा उन्होंने एक दिन उस अंग्रेजी अखबार के पत्रकार से बात की जिसने उनकी कंपनी के मामले में उनकी मदद की थी। पत्रकार एक दिन उनके घर आया और उन्हें सलाह दी कि भाभी जी को मैं एक पत्रिका शुरू करवा देता हूं।
श्रीवास्तव जी को पत्रकार मित्र का यह ऑफर अच्छा लगा और उन्होंने नई पत्रिका के बारे में काम करने को कहा। पत्रकार मित्र पहुंची हुई चीज थे, उन्होंने एक हफ्ते में ही एक पत्रिका का नाम लेकर श्रीवास्तव जी के हवाले किया और उनसे 25 हजार रुपयों की पहली किस्त लेकर पत्रिका शुरू करवा दी। पत्रिका का पांच अंकों तक तो सब ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन उसके बाद श्रीवास्तव जी को आभास हो गया कि पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने के बाद उनकी पत्नी का रुख कुछ बदल गया है। उनकी पत्नी ने सफदरजंग एंक्लेव में पत्रिका का दफ्तर खोल दिया। श्रीवास्तव जी को यह बात तब पता चली, जब उनके घर से सामान नए दफ्तर में शिफ्ट हो रहा था। उन्होंने पत्नी से पूछा कि घर पर क्या परेशानी थी। पत्नी ने दिल्ली के एक बड़े कांग्रेसी नेता का नाम लेते हुए बताया कि उन्होंने दफ्तर दिलवाया है। मार्केट के हिसाब से करोड़ों रुपयों की प्रॉपर्टी है, क्या हर्ज है, मीडिया का दफ्तर होगा, डर कैसा। श्रीवास्तव जी कुछ बोले नहीं, लेकिन जल्दी उन्हें आभास हो गया कि उन्होंने जीवन में बहुत बड़ी गलती कर दी।
अब तक पायल श्रीवास्तव पर मीडिया का रंग पूरी तरह से चढ़ चुका था। वह देर रात तक वापस लौटती और पति से कहती खाना बाहर से मंगवा लो। यह सिलसिला कई महीनों तक चला। एक दिन श्रीवास्तव साहब ने कहा- ''बहुत हो गया मीडिया-वीडिया, बंद करो सारा धंधा, मुझे नहीं निकालनी मैग्जीन।'' उनके इतना सुनते ही पायल श्रीवास्तव तैश में आ गईं और बोलीं- ''आपसे क्या मतलब, मैं निकाल रही हूं और तुम्हारी तनख्वाह से ज्यादा पैसा कमा रही हूं, इसी मैग्जीन के जरिए।'' श्रीवास्तव साहब ने बहुत सख्ती से कहा कि मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता।
बातों ही बातों में बात ज्यादा बढ़ गई और श्रीवास्तव साहब ने पत्नी पर हाथ उठा दिया। पायल श्रीवास्तव ने फौरन अपनी मैग्जीन के दो लोगों को फोन कर बुला लिया और पुलिस को भी खबर कर दी। अब तो श्रीवास्तव साहब आपे से बाहर हो गए। पुलिस के आने पर उन्होंने और चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया। मोहल्ले वालों ने उनका यह रूप पहली बार देखा था। पायल श्रीवास्तव अब तक पूरी मैच्योर पत्रकार हो चुकी थी। उन्होंने पुलिस वालों से कहा कि मेरी कंपलेंट लिखो। मैं अब एक पल भी इस आदमी के साथ नहीं रह सकती। पुलिस श्रीवास्तव साहब को थाने ले आई। उन्होंने अपने दोस्तों को फोन करके बुलाया तो किसी तरह वह थाने से बाहर आए। लेकिन अब पायल और उनके बीच एक लंबी रेखा खिंच चुकी थी।
उसी दिन उन्होंने फैसला कर लिया कि अब पायल के साथ नहीं रहना। पायल को भी पति और बच्चों की कोई फिक्र नहीं थी। उन्होंने पति का घर छोड़ दिया और साकेत में एक फ्लैट ले लिया। पायल की पत्रिका को अब डेढ़ साल हो चुका था। ढेड़ साल में उन्हें पत्रकारिता के सारे गुण आ गए थे। उन्होंने पत्रिका को डीएवीपी में पंजीकृत कराया और केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों के भारी-भरकम विज्ञापन छापने लगीं। जल्दी ही कई केंद्रीय मंत्रियों के साथ उन्होंने प्रगाढ़ संबंध बना लिए। वह हिंदी-अंग्रेजी अच्छी बोलती थीं और सुंदर भी थीं। पत्रिका के जरिए पायल ने दिल्ली में एक मकान खरीदा और पांडव नगर में एक और मकान लेकर उसमें अपनी प्रेस भी लगा ली। कार-वार जैसी विलासता की सभी चीजें उनके पास थी। दिल्ली की महिला पत्रकारों के बीच उनकी अच्छी पहचान थी। पीआईपी के अलावा उनका प्रेस-क्लब और महिला प्रेस-क्लब में भी दखल था।
यह बात उन दिनों की है, जब उत्तर प्रदेश अलग होकर उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ। उत्तराखंड के बनने के बाद पायल श्रीवास्तव ने देहरादून के कई ताबड़तोड़ दौरे किए और अपनी पत्रिका के विस्तार के लिए उन्होंने कोई जुगत भिड़ाकर वहां की सरकार से कम दामों पर जमीन हासिल कर ली। उत्तराखंड में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो पायल श्रीवास्तव की लाटरी निकल आई। उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री के बड़े-बड़े इंटरव्यू अपनी पत्रिका में प्रकाशित किए और बड़े विज्ञापनों को हासिल किया।
पायल श्रीवास्तव अब इतनी ताकतवर हो गई थीं कि एक अखबार निकालने की सोच रही थीं। मेरी उन्हीं दिनों उनसे मुलाकात हुई। मेरे एक नजदीकी मित्र ने उनसे मेरा परिचय करवाया और कहा कि मैडम चाहती हैं कि देहरादून से प्रकाशित होने वाले उनके समाचार-पत्र का काम-काज मैं देखूं। मैं उन दिनों एक पत्रिका में नौकरी करता था, लेकिन उन्होंने मुझे पहली ही मुलाकात में जो वेतन ऑफर किया, वह मेरे लिए बहुत था। मैंने कहा- एक-दो दिन में आपको बताऊंगा। वह बोली- बताना क्या है, कल मेरे साथ देहरादून चलो। मैं तुम्हें दफ्तर, प्रेस सब दिखा दूंगी, बाकी जो तुम्हें करना है, बाद में करते रहना।
अगले दिन मैं पायल श्रीवास्तव के साथ देहरादून के लिए रवाना हो गया। देहरादून पहुंचकर हम लोग सीधे मुख्यमंत्री निवास पर पहुंचे। वहां कोई जरूरी मीटिंग चल रही थी, मुख्यमंत्री के बंगले के बाहर बहुत-सी गाड़ियों को देखकर मुझे अहसास हो गया था। लेकिन पायल श्रीवास्तव के पहुंचते ही मुख्यमंत्री ने बैठक की कार्रवाई को निपटाया और हमें ड्राइंगरूम में बैठा दिया। पायल श्रीवास्तव मुख्यमंत्री के साथ अंदर चली गईं। मैं नाश्ता-पानी के बाद उनका इंतजार करने लगा।
करीब घंटा भर बाद वह आईं और मुझसे बोलीं कि चलो तुम्हें साइट दिखा लाऊं। एक सरकारी गाड़ी में बैठकर हम हरिद्वार रोड पर विकसित होने वाली एक नई कॉलोनी में पहुंचे। वहां एक बड़ी कोठी में पायल श्रीवास्तव ने अखबार का दफ्तर बनाया था। वह बोलीं- यह कोठी अपनी ही है और जहां प्रेस होगी, वह भी साइट अपनी ही है। इस कोठी के नीचे अखबार का दफ्तर रहेगा और उपर तुम अपने रहने का बंदोबस्त कर लेना। मैं उनकी हां में हां मिलाता रहा। प्रेस वाली साइट भी अच्छी-खासी थी।
देहरादून से वापस लौटते वक्त उन्होंने मुझसे कहा- जल्दी ही पैसों का बंदोबस्त भी हो जाएगा। उसके बाद तुम अखबार के काम में लग जाना। ध्यान रखना, प्रो कांग्रेस एंगल रखना है। मैं तो महीने में एक-दो बार ही आऊंगी, बाकी तुम्हें पहले ही दिन से विज्ञापन और दूसरे संसाधनों की कोई कमी नहीं होगी, सब इंतजाम हो चुका है। मैं उनकी हां में हां मिलाता रहा और किसी तरह दिल्ली वापस आने का इंतजार करने लगा।
हम लोग रात करीब ग्यारह बजे दिल्ली पहुंचे। मेरे गाड़ी से उतरते ही पायल जी ने मेरे हाथ में पांच हजार रुपए की गड्डी थमा दी और बोलीं- दो दिन तुमने अपने दफ्तर से छुट्टी की है, यह उसका मेहनताना है। मैंने पैसे रख लिए, मुझे लगा कि यह मेरी यात्रा और मेरे काम के जायज पैसे हैं। मैंने दो दिन उनके साथ बर्बाद किए थे।
इस वाकए के कुछ दिनों बाद एक रात मेरे पास पायल श्रीवास्तव का फोन आया, वह बोलीं- देहरादून के अखबार का प्लान अभी कुछ दिनों के लिए टल गया है, अगर तुम्हें मेरी मैग्जीन में काम करना है तो बताओ। मैंने कहा- मैडम, मैं अच्छी जगह पर हूं, यदि कभी आपकी जरूरत हुई तो मैं जरूर बताऊंगा। इस बातचीत के बाद मेरी उनसे बात लगभग बंद हो गई।
मुझे जिस मित्र ने उनसे मिलाया था, एक दिन मैंने अपनी देहरादून यात्रा और उसके पीछे के सारे किस्से उन्हें सुनाया, तो मित्र बोले- यार छोड़ो, अच्छा हुआ तुम उसके साथ नहीं जुड़े, वह दूसरे तरह की पत्रकार है, फिलहाल एक नेता के साथ मलेशिया गई हुई है छुट्टियां बिताने। उन्होंने दिल्ली के एक नेता का नाम लेते हुए कहा कि अब तो वह स्थाई तौर पर उनके यहां ही दिखाई देती है। और उसके राजनीतिक करिअर पर लगे दाग को धोने का काम कर रही है।
मेरी एक महिला मित्र ने भी एक दिन मुझे पायल श्रीवास्तव के किस्से के बारे में बताया और उनसे अलग रह रहे पति और दो बेटियों के बारे में भी काफी बातें मुझे बताई। पायल श्रीवास्तव आज भी अपनी पत्रिका निकाल रही हैं और उस पत्रिका के हर अंक में केंद्र सरकार के विज्ञापनों की भरमार रहती है। वह सुबह गाड़ी लेकर निकल जाती हैं और शाम को घर लौटती हैं, उनका कारोबार अब काफी फैल चुका है। दिल्ली के आसपास बसे नोएडा और गुड़गांव इलाके में भी उन्होंने काफी प्रॉपर्टी एकत्र कर ली है। कारोबार संभालने के लिए उन्होंने अपने छोटे भाई को दिल्ली बुला रखा है।
पायल श्रीवास्तव की गाड़ी अक्सर किसी मंत्रालय या पीएसयू के बाहर खड़ी मिलती है। वह वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों और बड़ी कंपनियों के निदेशकों के साथ अक्सर फाइवस्टार होटलों की डिनर पार्टियों में भी मिलती हैं। बसंत कुंज के एक फाइव स्टार होटल की लॉबी में एक शाम उनकी मेरे से मुलाकात हुई। मैं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस कवर करके बाहर आ रहा था, उन्हें देखते ही मैंने अभिवादन किया। पास आकर वह बोलीं- क्या यूपी की सीएम की प्रेस कांफ्रेंस अटेंड करने आए थे? मैंने कहा- यस मैडम! वह बोलीं- अगर घर चलना है तो मैं छोड़ दूंगी। मुझे गाजियाबाद की तरफ निकलना है। मैंने कहा- थैंक्यू मैडम। यूपी इंफोर्मेशन वालों ने पिक एंड ड्रॉप की सुविधा दी है। पायल श्रीवास्तव की गाड़ी होटल के पोर्टिको में आ चुकी थी। उन्होंने हाथ हिलाकर मुझे बॉय कहा और गाड़ी में बैठकर निकल गईं, मैं यूपी इंफोर्मेशन वालों की गाड़ी का इंतजार करता रहा।
वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र कुमार वर्मा के कहानी संग्रह 'पत्रकारिता के नटवरलाल' से यह कहानी ली गई है.

भड़ास पर प्रकाशित पिछली कहानी पढ़ने के लिए क्लिक करें- सुमेश दोषी





