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आ गया महिला दिवस, अखबार-चैनल जुटे चर्चित महिला खोजने में

प्रति वर्ष की तरह इस बार भी महिला दिवस आ गया है और साथ ही शुरू हो गयी है खोज, उन महिलाओं की जिन्हें आगे करके इसे मनाया जा सके। अखबार हो या टीवी चनैल, या फिर सामाजिक संगठन, सब बेतहाशा जुटे हैं। इन सबकी खोज में एक बड़ी समानता यह है कि लगभग सभी पहले से ही चर्चित महिलाओं को चुनते हैं। वह महिलायें जो पुरुषों से जूझ रही हैं, वे महिलाएं जिन्होंने व्यावसायिक क्षेत्र में परचम लहराया है और वे महिलायें जो सामाजिक या राजनैतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं।

प्रति वर्ष की तरह इस बार भी महिला दिवस आ गया है और साथ ही शुरू हो गयी है खोज, उन महिलाओं की जिन्हें आगे करके इसे मनाया जा सके। अखबार हो या टीवी चनैल, या फिर सामाजिक संगठन, सब बेतहाशा जुटे हैं। इन सबकी खोज में एक बड़ी समानता यह है कि लगभग सभी पहले से ही चर्चित महिलाओं को चुनते हैं। वह महिलायें जो पुरुषों से जूझ रही हैं, वे महिलाएं जिन्होंने व्यावसायिक क्षेत्र में परचम लहराया है और वे महिलायें जो सामाजिक या राजनैतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं।

इस कवायद को देखकर मैं सोचती हूँ, कि क्या पुरुषों के क्षेत्र में दखल देना ही एक महिला की सफलता का मापदंड है। इस खोज में वे महिलायें क्यों खो जाती हैं जिन्होंने अपना जीवन होम करके अपने परिवार को आगे बढ़ाया है? महिला दिवस क्या उन अस्सी प्रतिशत महिलाओं का दिन नहीं है जो परिवार की धुरी बनकर नित्य एक नयी यातना से गुज़रती हैं? मैं ऐसी बहुत सी महिलाओं को जानती हूँ जो हर दृष्टि से अपने पति से अधिक काबिल हैं, पर परिवार के लिए अपने कैरियर की बलि दे चुकी हैं। एक महिला के बिना क्या दुनिया के किसी भी परिवार की कल्पना की जा सकती है? परिवार में कितने ही सदस्य क्यों न हो एक महिला के बिना वे सभी सदस्य अनाथ ही होते हैं। न कोई उन्हें पानी देने वाला होता है और न ही खाना पूछने वाला।

इतने महत्त्व के स्थान पर होने के बावजूद महिलाओं की स्थिति दयनीय है। अधिकाँश महिलायें आज भी शोषण सहने को मजबूर हैं और यह शोषण करने वाले और कोई नहीं उनके अपने हैं। वे अपने जिनके जीवन की वह धुरी हैं, वे अपने जिनके लिए उसका जीवन समर्पित है। उसकी इच्छा का घर के फैसलों में कोई महत्त्व नहीं। वह आगे बढ़कर अपनी इच्छा ज़ाहिर कर भी दे तो उसकी कोई गिनती नहीं। बेहद व्यक्तिगत ज़रूरतों के लिए आज भी उसे पति का मुंह निहारना पड़ता है, भीख की तरह पैसे मांगने पड़ते हैं और उनका समुचित हिसाब भी देना पड़ता है। यह हाल केवल घरेलू महिलाओं का ही नहीं है। कामकाजी महिलाओं की भी कमोबेश यही स्थिति है। अपनी मेहनत की कमाई से भी अपनी पसंद की छोटी से छोटी चीज़ लेने से पहले उसे पति की आज्ञा लेनी पड़ती है और आज्ञा न मिलने पर अपना इरादा बदलना पड़ता है। पति उसकी कमाई और उसकी चीज़ों का पूरा हिसाब रखता है पर घर सँभालने वाली का घर की किसी चीज़ पर हक नहीं होता। उसके साथ मार-पीट और गाली-गलौज तो रोज़मर्रा की बात है।

पढ़े-लिखे वर्ग के बहुत से लोग मेरी इन बातों से सहमत नहीं होंगे। नौकरीपेशा पत्नी का घर के कामों में हाथ बंटाने वाले इसे मेरी कल्पना कहेंगे, पर समाज के बड़े हिस्से का सच आज भी यही है। जब तक हम इसे मानेंगे नहीं, तब तक इस दिशा में सुधार भी संभव नहीं है। इस बात को मानने के बाद ही महिला दिवस सार्थक होगा, क्योंकि आज भी महिलाओं के एक बड़े वर्ग की स्तिथि पराश्रित की है। इंदिरा नुई, शहनाज़, मायावती और सोनिया गाँधी जैसी महिलाओं के लिए महिला दिवस मनाने का कोई अर्थ नहीं है। महिला दिवस है उन महिलाओं के लिए, जो धरती की सहनशीलता के साथ अपने परिवारों में दोयम दर्जा रखते हुए जी रही हैं। जो नदी की तरह चुपचाप बहते हुए हर गन्दगी को अपने में समेटकर खेतों को सींचती जा रही हैं। जो एक-एक रूपया गुल्लक में डालकर अपने घर की छत बनाती हैं। जो जड़ों की भांति अनाम जी ज़मीन के नीचे रहकर ऊपर चमकने वाले पेड़ों को फलदार बनाती हैं। धरास्वरूपा ऐसी सभी देवियों को मेरा प्रणाम और इस महिला दिवस पर कामना कि अर्द्धनारीश्वर की कल्पना साकार हो और इन्हें इनका स्थान मिले। ऐसा हो तभी महिला दिवस की सार्थकता है।

साध्वी चिदर्पिता गौतम का यह लिखा उनके ब्लाग मेरी ज़मीं मेरा आसमां से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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