उत्तर प्रदेश और खासकर उत्तर भारत के गांवों में रहने वाले किसानों में से अधिकांश लोगों के जेहन में कवि घाघ की कोई न कोई रचना उमड़ती घुमड़ती रहती हैं। घाघ ऐसे महाकवि और दृष्टा थे जिन्होंने उस काल में मौसम के बारे में पूर्वानुमान लगाया जब विज्ञान का विकास ही नहीं हुआ था। तब लोगों के पास मौसम को आंकने के लिए कोई उपकरण भी नहीं थे। घाघ की पूर्वानुमान की क्षमता इतनी प्रखर थी कि लोग उनका लोहा मानने लगे। उनकी दृष्टि अनुभवों से ही विकसित हुई थी।
पहले तो लोगों ने उन्हें हल्के में लिया लेकिन जब उनकी भविष्यवाणियां सत्य साबित होने लगीं तो उनके समकालीन लोगों ने उस पर अमल शुरू कर दिया। सदियों पहले मौसम के रुख के बारे में लगाए गए पूर्वानुमान को वर्तमान के मौसम वैज्ञानिक भी काफी सटीक मानते हैं। उन्होंने अपनी भविष्यवाणियां दोहों के रूप में ही कीं। आज भी अधिकांश ग्रामीणों का यही मानना है कि भले ही मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान फेल हो जाएं लेकिन जो बातें घाघ ने दोहों में कह दी हैं वे आज भी सटीक बैठती हैं।
घाघ की कहावतें एक-एक मुख से होती हुईं दूसरों के जबान पर चढ़ती गई। पीढ़ी दर पीढ़ी ये ग्रामीणों में विस्तारित और प्रसारित होती रहीं। कुल मिलाकर उनकी रचनाएं पीढ़ी परंपरा से ही आगे बढ़ीं। महाकवि घाघ के बारे में तो आम लोगों को भले ही बहुत ज्यादा जानकारी नहीं हो लेकिन उनकी रचनाओं को बहुतों को उच्चारित करते सुना जा सकता है। कुछ लोगों का मानना है कि महाकवि घाघ का जन्म संवत 1753 में उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में हुआ था। कुछ लोगों का यह मानना भी है कि वे कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। वहीं कुछ लोग ऐसी विचारधारा को खारिज करते हैं। इनके जीवन चरित के बारे में बहुत ठोस जानकारी आम लोगों को नहीं है। उनसे ज्यादा उनकी रचनाएं लोकप्रिय हो गई। घाघ की रचनाओं में घाघ और भंडरी शब्दों का इस्तेमाल जमकर हुआ है। इस संबंध में कुछ लोगों का मानना है कि भंडरी घाघ की पत्नी थीं। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि ये दोनों नाम भिन्न-भिन्न लोगों के थे।
एक लेखक गंगाप्रसाद शर्मा ने घाघ और भंडरी की कहावतें नामक पुस्तक में बताया है कि घाघ अहीर थे। अपनी मातृभूमि के लोगों ने जब उनका उपहास उड़ाया तो वे धारा नगरी चले गए। वहीं उनकी भेंट भंडरी नाम की गड़रिया जाति की युवती से हुई। मौसम संबंधी उसकी जानकारी से वे बहुत प्रभावित हुए। उसी से विवाह कर लिया। बाद में स्वयं मौसम का गहन अध्ययन किया। साथ ही साथ ज्योतिष विद्या का भी गहन अध्ययन किया। उन्होंने ज्योतिष संबंधी जानकारी भी विस्तार से लोगों को भी दी। बकौल शर्मा कुछ शोधकर्ताओं के अध्ययन से यह पता चलता है कि घाघ का कार्यकाल अकबर और जहांगीर के मध्य का ही रहा। उन्हें ज्योतिष में खासा महारत हासिल थी। उन्होंने अपनी मौत के बारे में पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि जल में डूबने से ही उनही मौत होगी। तालाब में डूबने से ही उनकी मृत्यु हो गई।
उनकी कुछ प्रमुख रचनाओं का यहां जिक्र करना मुनासिब होगा जो उनकी उपादेयता को रेखांकित करते हैं। उत्तम खेती मध्यम बान निषिध चाकरी भीख निदान। जो हल जोते खेती वाकी और नहीं तो जाकी ताकी। एक और रचना यह है… उत्तम खेती जो हलगहा मध्यम खेती जो संग रहा बीज बूडिगे तिनके तहां जो पूछिसि हरवहवा कहां। इसका आशय यह है कि खेती उसकी उत्तम होगी जो स्वयं हल चलाएगा। जो हरवाहे के साथ-साथ रहेगा उसकी खेती मध्यम होगी। लेकिन जो हरवाहे पर ही सारा भार डाल देगा उसका बीज भर उत्पादन भी वापस नहीं आएगा।
पंच दिवाकर माह में होवे भलै न चीन काल हलाहल देखिए दुनिया तेरह तीन। इसका अभिप्राय यह है कि फाल्गुन मास में पांच रविवार पड़े तो सभी प्रकार के अनाज महंगे होंगे। जनता महंगाई से परेशान रहेगी।
उनकी करिया बादर जी डरवावै भूअर बादर पानी लावै कहावत भी काफी लोकप्रिय है। वे दिशाशूल के बारे मे लिखते हैं कि सोम सनिचर पूरब न चाल मंगल बुध उत्तर दिसि काल जो बीफै को दक्खिन जाए बिना गुनाहे जूता खाय बुध कहै मैं बड़ा सयाना मोरे दिन जिन कियो पयाना कौड़ी से नहीं भेंट कराउं कुशलक्षेम से घर पहुचाउं। कहीं-कहीं यह लाइन भी मिलती है कि पहर छाड़ि मोहि कियो प्याना।
एक और रचना लोकप्रिय है कि शुक्रवार की बादरी रही शनिचर छाय तो यों भाखै भंडरी बिन बरसे ना जाए। इसका आशय यही है कि शुक्रवार को यदि बादल छाएं और यह क्रम शनिवार को भी जारी रहे तो बरसात अवश्य होगी।
उनकी एक और रचना है. आद्रा में जो बोवै साठी. दुखै मारि निकारै लाठी। यह रचना यह बताती है कि जो किसान आद्रा नक्षत्र में साठी धान की बोआई करता है समझो वह लाठी मारकर अपने दुखों को दूर भगा दंता है अर्थात वह अच्छी उपज पाता है जो संपन्नता का कारण बनता है।
उनकी एक और रचना बहुत से लोगों के मुंह से सुनी जा सकती है। पुरुआ रोपे पूर किसान आधा खखड़ी आधा धान। इसका मतलब यह है कि यदि कोई किसान पूर्वा नक्षत्र में धान की रोपाई कर देता है तो उसकी फसल की अच्छी पैदावार नहीं होगी। आधा फसल पैया यानी दानारहित हो जाएगी। सही मायने में उसे आधा उत्पादन ही मिल पाएगा।
उनकी एक और रचना है कि सावन मास बहै पुरवइया बछवा बेच लेहु धेनु गइया। इसका अर्थ यह है कि यदि सावन के महीने में पुरवा हवा बह रही है तो यह समझ लो कि सूखा पड़ने वाला है। वे किसानों को सुझाव देते हैं कि सूखे से निपटने के लिए अच्छा यही होगा कि बछड़े को बेंचकर गाय खरीद लें ताकि सूखा पड़ने की स्थिति में उसके दूध से ही सही ढंग से जीविकोपार्जन कर सकेंगे।
एक अन्य रचना में वे कहते हैं कि उत्तरा उत्तर दे गई हस्त गयो मुख मोरि भली विचारी चि़त्तरा प्रजा लेइ बहोरि। इसका आशय यही है कि यदि उत्तरा नक्षत्र में पानी न बरसे और हस्त यानी हथिया नक्षत्र में भी पानी न बरसे और इसके बाद भी यदि चित्रा नक्षत्र में पानी बरस जाए तो भी इतना भरपूर उत्पादन हो जाता है कि जनता का पेट भर जाए।
रोहिनी बरसै मृग तपै कुछ-कुछ अद्रा जाए कहैं घाघ सुन घाघिनी स्वान भात नहीं खाय। इसका आशय यह है कि यदि रोहिनी नक्षत्र में अच्छी बारिश हो और मृगसिरा नक्षत्र में खूब गरमी हो इसके बाद यदि आद्रा नक्षत्र में साधारण सी भी बारिश हो जाए तो धान का इतना भरपूर उत्पादन होगा कि कुत्ते भी भात खाना पसंद अहीं करेंगे। कुत्ते भात से उब जाएंगे। मौसम पर उनकी एक रचना यह भी है कि फागुन मास बहै पुरुवाई तब गेहूं में गेरुई धाई। यानी यदि फाल्गुन माह में पुरवा हवा चलती है तो गेहूं में गेरुई रोग लग जाएगा।
उनकी एक रचना यूं है. कलशै पानी गरम हो चिड़िया नहावै धूर चींटी लै अंडा चढ़ै तो बरखा भरपूर। उन्होंने सगुन फल के बारे में भी बहुत कुछ लिखा है। एक रचना है कि लोमड़ी फिर-फिर दरश दिखावै बाएं से दहिने मृग जावै भडडर कवि यह सगुन बतावैं सगरे काज सिद्ध हो जावैं। उनकी एक और मजेदार रचना है कि नारि सुहागिन जो घर आवै दधि मछली जो सन्मुख आवै सन्मुख धेनु पियावै बच्छा रहै सगुन ई सबसे अच्छा।
घाघ की रचनाओं को वर्तमान के कृषि वैज्ञानिक भी बहुत परिपक्व मानते हैं। उनका मानना है महाकवि घाघ ने आंतरिक चेतना और अनुभवों के आधार पर ही पूर्वानुमान लगाए जो काफी सटीक बैठते हैं। आज भी लोग उनके अनुभवों का लाभ उठा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि घाघ कितने दिन जीवित रहे इसका उल्लेख नहीं मिलता है।
लेखक उमेश शुक्ल जनसंचार और पत्रकारिता संस्थान झांसी से जुड़े हुए हैं.





