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क्‍या धर्म देखकर शहादत की कीमत तय करना ही समाजवाद है?

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का शासन और उत्तर प्रदेश में संघ और राज्य लोक सेवा आयोग से चयनित समाजवादी पार्टी का प्रशासन वर्तमान समय में पूरी तरह से किंकर्तव्यविमूढ़ है कि आखिर करे तो करे क्या, जिसने जो मशविरा दे दिया तुरंत मान लिया फिर देखा कि इस फैसले से क्षति हो रही है तो तुरत पलट भी दिया, किन्तु इस सबके बीच जो बड़ी तस्वीर जाने अनजाने उत्तर प्रदेश की जनता के सामने आ गई वो सच में कष्टदायक है। और कहीं न कहीं इसका खामियाजा सत्तारूढ़ और प्रमुख विपक्षी दल दोनों को आगामी लोकसभा चुनावों में भुगतना पड़ सकता है।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का शासन और उत्तर प्रदेश में संघ और राज्य लोक सेवा आयोग से चयनित समाजवादी पार्टी का प्रशासन वर्तमान समय में पूरी तरह से किंकर्तव्यविमूढ़ है कि आखिर करे तो करे क्या, जिसने जो मशविरा दे दिया तुरंत मान लिया फिर देखा कि इस फैसले से क्षति हो रही है तो तुरत पलट भी दिया, किन्तु इस सबके बीच जो बड़ी तस्वीर जाने अनजाने उत्तर प्रदेश की जनता के सामने आ गई वो सच में कष्टदायक है। और कहीं न कहीं इसका खामियाजा सत्तारूढ़ और प्रमुख विपक्षी दल दोनों को आगामी लोकसभा चुनावों में भुगतना पड़ सकता है।

साम्प्रद्दायिक तुष्टिकरण, वोट बैंक की राजनीति, संप्रदाय विशेष का पक्ष लेना इत्यादि-इत्यादि ऐसी बातें हैं, जो आम तौर पर चुनावी बसंत के कोकिल स्वर होते हैं और जिनको भिन्न-२ तरीकों से राजनैतिक पार्टियां चुनाव के बाद ५ साल तक मौका पड़ने पर ही गुनगुनाती हैं, किन्तु संप्रदाय की राजनीति को समाजवाद का मुलम्मा पहना कर पिछले एक साल से उत्तर प्रदेश के भीतर जिस प्रकार से प्रस्तुत किया गया है, उससे बार -२ ये चुनावी बातें उत्तर प्रदेश के हर जनपद में गुंजित हो रही हैं।

दरअसल जिस साम्प्रदायिक समाजवाद की बात हम यहाँ पर कर रहे हैं, जाने अनजाने उसकी नींव 26 जनवरी 1950 को उसी समय पड़ गई थी, जिस समय भारत के संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जुड़ गया था, तब से अब तक इस शब्द की व्याख्या तमाम सियासी दल अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से मौका और दस्तूर देख कर अपनी सियासी जमीन को सँवारने या २१वीं सदी की भाषा में कहे तो पालिटिकल मायलेज लेने के लिए करते चले आ रहे हैं। और संभवतः ये परिपाटी भविष्य में भी बदस्तूर जारी रहेगी।

सबसे बड़ी विडंबना यह कि सर्वधर्म समभाव का अनुशीलन करने वाले गांधीवादी समाजवादियों को भी इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों की अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है और जिनको ये साम्प्रदायिक कह दे वे अल्पसंख्यकों के बैरी और जिनको ये धर्मनिरपेक्ष कह दे वे सभी अल्पसंख्यकों के हितचिन्तक। और इनकी परिभाषा भी वक्त और जरूरत के साथ बदल जाती है, बस बदलता नही है तो इनके धर्मनिरपेक्ष चश्मे का नंबर। मसलन हिन्दुस्तान के भीतर अगर अल्पसंख्यकों या यूँ कहे की अल्पसंख्यकों में बहुसंख्यकों के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में किसी का नाम लिया जाता है तो वो हैं नरेन्द्र मोदी और किसी भी धर्मनिरपेक्ष पार्टी का वार्ड स्तर का कार्यकर्ता भी घनी अँधेरी रात के १ बजे भी नरेन्द्र मोदी के विषय में अखंड काव्य सुना सकता है।

अब इसी तस्वीर से जुड़ा एक दूसरा पहलू भी देखिये, श्रीमती जया बच्चन समाजवादी पार्टी से सांसद हैं तो जाहिर तौर पर समाजवादी पार्टी से सिर्फ जुड़ भर जाने से वे धर्म निरपेक्ष हो गईं, लेकिन उन्हीं के पति परमेश्वर सदी के महानायक पद्म सम्मान से विभूषित श्री अमिताभ बच्चन नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व वाले गुजरात के ब्रांड अम्बेसडर हैं और ब्रांड मोदी को चमकाने में जुटे हैं। अलबत्ता बीजगणित के साधरण समीकरण के अनुसार उनको कथित नाजीवादियों एवं फासीवादियों का स्टार प्रचारक माना जाना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि उनको समाजवादी पार्टी का प्रमाण पत्र मिला हुआ है और वे देश के भीतर और बाहर सभी जगहों पर उस करेक्टर सर्टिफिकेट को दिखा कर धर्मनिरपेक्ष छवि का आनंद ले सकते हैं।

साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की इसी पाइथागोरस प्रमेय को समाजवादी पार्टी ने २०१२ के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में लागू किया और बदले में २००७ के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की उसी जनता, जिसने मायावती के आह्वाहन पर गुंडों की छाती पर चढ़ हाथी की सवारी की थी, ने वर्ष २०१२ के पूर्वार्द्ध में उम्मीद की साइकिल को इतनी जोर से धक्का दिया कि गति के सारे समीकरण फ़ेल हो गये। और बिना किसी बाहरी बल का प्रयोग किये हुए अखिलेश यादव पंचम तल (उत्तर प्रदेश सचिवालय का वह तल जहां मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश का कार्यालय स्थित है) पर पहुंच गये।

चूँकि साइकिल कोई आम साइकिल नहीं थी, उम्मीद की थी, इसलिए उत्तर प्रदेश की जनता को अखिलेश से उम्मीदें भी बहुत थी, लेकिन महज ११ महीने २३ दिन में जो तलपट उत्तर प्रदेश सरकार का बना वो प्रॉफिट एंड लास अकाउंट में कुछ ऐसा परिलक्षित हो रहा है, जिसमें कि मुख्यमंत्री अखिलेश रोज सुबह जितनी तन्मयता से साइकिल के टायर और ट्यूब दुरुस्त कर रोकड़ बही में एंट्री करते हैं, उनकी चाचा मण्डली (उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल) उतनी ही तन्मयता से पूरे दिन भर के लिए रास्ते में बबूल के इतने कांटे और नुकीली कीलें बिछा देते हैं जिससे शाम होते-२ ट्यूब में इतने क्षेद हो जाते हैं कि समीक्षा रूपी वाटर टब में डाले जाने पर पंचर छीद्रों से निकलने वाले बुलबुले महासमुद्र का रूप ले लेते हैं।

सहारनपुर से सोनभद्र और मथुरा से गोरखपुर तक कोई ऐसा जनपद नहीं जहां रोज वलीपुर काण्ड न होता हो, अंतर सिर्फ इतना है कि मामला अगर नटवर गोयल, पंडित सिंह, केसी पाण्डेय, नरेन्द्र सिंह, विजमा यादव, प्रमोद गुप्ता, मदन सिंह गौतम, अजीमुल हक पहलवान (सभी समाजवादी पार्टी के मंत्री अथवा विधायक) से जुड़ा होता है तो जल्दी ठंडे बस्ते  में चला जाता है, और अगर राजा  भैया से जुड़ा होता है तो आग थोड़ा अधिक जलती है। चर्चा के इस दौर में एक तथ्य अत्यंत ही महत्वपूर्ण है जिसका उल्लेख करना नितांत आवश्यक है। वह यह कि रघुराज प्रताप सिंह विधायक कुंडा जनपद प्रतापगढ़ को मायावती ने इसलिए जेल भिजवाया की उनका कोई आपराधिक इतिहास था, ऐसा समझाना सिर्फ मायावती का चुनावी एजेंडा था, जिसके माध्यम से वे उत्तर प्रदेश की जनता को यह सन्देश देना चाहती थी वे अपराधियों और गुंडा गर्दी के खिलाफ हैं और किसी भी प्रकार से वे दबंगई और गुंडा गर्दी को बर्दाश्त नही करेंगी।

रघुराज प्रताप को जेल भिजवाने के पीछे की पटकथा तो मायावती के ख़ास सिपहसालारों के निर्देशन में उसी दिन लिख दी गई थी जिस दिन रघुराज प्रताप सिंह ने बहुजन समाज पार्टी में सेंधमारी कर भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री बनवाने के लिए लखनऊ के क्लार्क्स अवध होटल में गोपनीय बैठक की थी। और उसी सेंधमारी के पुरस्कार स्वरुप रघुराज प्रताप को पहली बार मंत्री भी बनाया गया था। रघुराज प्रताप को जिस समय पोटा कानून के तहत जेल भेज गया, उस समय उत्तर प्रदेश के भाजपाई जय भीम का नारा लगा कर मायावती के साथ सत्ता सुख भोग रहे थे। और भावी कारागार मंत्री को कारागार की सलाखों के पीछे भेजने का विरोध करने का सीधा अर्थ सत्ता के गलियारों से संघर्ष के चौराहे पर आना होता, जिसके लिए सत्ता का सुख भोगने वाला कोई मंत्री या विधायक तैयार नही था। उस समय मुलायम सिंह ने मौके की नजाकत को समझा और फतेहगढ़ केंद्रीय कारागार में जाकर रघुराज प्रताप के संघर्ष में साथ होने की बात कह कर उनसे दोस्ती का हाथ बढ़ाया जिसका लाभ भी उनको मिला।

सुरसा के मुंह जैसी अंतहीन केंद्रीय कारागार फतेहगढ़ में दीपावली से ठीक पहले एक राष्ट्रीय समाचार पत्र के प्रशिक्षु पत्रकार के तौर केंद्रीय कारागार अधीक्षक और कारागार के अन्तर्वासी कैदियों के रूप में खुफिया विभाग के अधिकारियों की सख्त निगरानी में रघुराज प्रताप ने मुझको दिए साक्षात्कार में मायावती के लिए कोई सन्देश कि उन्होंने आपकी दीवाली जेल में मनवाई के प्रश्न का उत्तर देते हुए रघुराज ने जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन में लगाये जाने वाले नारे "एक पाँव रेल में एक पाँव जेल में" का उल्लेख  करते हुए कहा था कि "मैं मायावती जी का आभार व्यक्त करूँगा जिन्होंने इतने बड़े परिसर में इतने लोगों के बीच मुझे और धनंजय (वर्तमान बसपा सांसद जौनपुर) को दिवाली मनाने का मौका दिया अन्यथा हम केवल अपने परिवारीजनो के साथ उत्सव मनाते"।

एक तरफ साधारण गैर संज्ञेय अपराधों की सूचना तक को पंजीकृत न करने वाली उत्तर प्रदेश सरकार की पुलिस ने वर्तमान समय में तीन दर्जन गंभीर प्रवत्ति के मुकदमों में आरोपी रघुराज प्रताप पर हत्या का षड्यंत्र रचने का आपराधिक अभियोग पंजीकृत किया और उसी आलोक में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने रघुराज प्रताप पर हत्या की प्राथिमिकी दर्ज की है। स्वर्गीय क्षेत्राधिकारी कुंडा श्री जिया उल हक की पत्नी परवीन आजाद लगातार उनकी हत्या के लिए रघुराज प्रताप को दोषी ठहरा रही हैं और मुख्यमंत्री समेत सभी धर्मनिरपेक्ष समाजवादी स्वर्गीय जिया उल हक़ को शहीद बता रहे हैं। तो क्या अपरोक्ष रूप से अखिलेश सरकार ये मान रही है कि क्षेत्राधिकारी कुंडा श्री जिया उल हक उस समय वीर गति को प्राप्त हो गये जब वे अपने कर्तव्यों के सम्यक निर्वहन के समय वलीपुर गाँव में रघुराज प्रताप सिंह तथा उनके अन्य अपराधी साथियों के साथ मुठभेड़ कर रहे थे?

स्वर्गीय क्षेत्राधिकारी कुंडा श्री जिया उल हक के नमाजे जनाजा में उनकी पत्नी परवीन आजाद (जो खुद को डिप्युटी एसपी और अपने मायके के अन्य ६ लोगों को राजपत्रित सरकारी नौकरी देने की मांग कर रही हैं) की एक आवाज पर चाचा आज़म खान, जो केंद्रीय मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यकों की नुमाइंदगी के नाम पर गुलाम नवी आजाद को हिन्दुस्तान का नहीं कश्मीर का मंत्री बताते हों, भूल सुधार करने के लिए कहे जाने पर भी कश्मीर को पकिस्तान का हिस्सा मानते हैं, उन के साथ उड़न खटोले से देवरिया के ज्योसर पहुंचने वाले ये वही मुख्यमंत्री अखिलेश हैं, जिन्होंने सीमा पर शहादत देने वाले मथुरा के सिपाही शहीद हेमराज, जिसके दूसरे साथी का पाकिस्तानी सेना ने पाशविक तरीके से सर धड़ से अलग कर दिया था, उस शहीद के गाँव जा कर सहानुभूति जताना भी तब तक मुनासिब नहीं समझा था, जब तक उनको पूरे प्रकरण के राष्ट्रीय पटल पर राजनैतिक मुद्दा बनने का आभास नहीं हो गया था।

अब सबसे बड़े सवाल यहाँ पर यह कि क्या राजनैतिक मूल्य इतने अधोगामी हो गये हैं कि शहादत का सम्मान भी इस धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रद्दायिक करेक्टर सर्टिफिकेट का मोहताज हो गया है? क्या सीमा पर प्राण न्योछावर करने वाला वीर सिर्फ इसलिए सम्मान का हक़दार नहीं कि उसके देश या प्रदेश के राजनीतिज्ञ उसके पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार से उठने वाली आग पर वोट की रोटियां नहीं सेंक सकते? क्या इस प्रकार का भेदभाव व्यवस्था से जुड़े लोगों के मन में स्वयं के लिए विभेद उत्पन्न नहीं करेगा और अंतिम यह कि क्या आईपीएस एसोसिएशन तब भी चुप रहती अगर क्षेत्राधिकारी  कुंडा के स्थान पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रतापगढ़ इसी प्रकार हादसे का शिकार होते? तथा क्या पीपीएस एसोसिएशन के कर्तव्य सिर्फ वेतन वृद्धि, पदोन्नति और कैडर पुनरीक्षण तक ही सीमित है? राजनीतिज्ञों को सिर्फ इतनी सलाह कि –

"हम कौन थे -क्या हो गये और क्या होंगे अभी,
आओ मिल बैठ कर विचारें ये समस्याएं सभी।"

लेखक क्रान्ति किशोर मिश्र सदुर्शन न्‍यूज में यूपी में ब्‍यूरो प्रमुख हैं.

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