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बचपन छीन रहे हैं ‘प्रदेश टुडे’ और ‘अग्निवाण’ जैसे अखबार!

कहते हैं पत्रकारिता समाज का पथप्रदर्शक होता है, क्योंकि लोग जो भी देखते हैं और सुनते है उससे वे काफी हद तक प्रभावित होते है। लेकिन समाचारपत्र अपने ही ख़बरों और लेखों से कितने प्रभावित है इस बात का अंदाजा इन तस्वीरों से लगाया जा सकता है। प्रदेश टुडे भोपाल से प्रकाशित होने वाला एक प्रतिष्ठित दैनिक सांध्य समाचारपत्र है। यह कुछ मासूम बच्चे, जिनकी उम्र अभी पढ़ने-लिखने की है, उन्हें एक हजार रूपये के मासिक पगार पर अपने समाचार पत्र बिकवाता है।

कहते हैं पत्रकारिता समाज का पथप्रदर्शक होता है, क्योंकि लोग जो भी देखते हैं और सुनते है उससे वे काफी हद तक प्रभावित होते है। लेकिन समाचारपत्र अपने ही ख़बरों और लेखों से कितने प्रभावित है इस बात का अंदाजा इन तस्वीरों से लगाया जा सकता है। प्रदेश टुडे भोपाल से प्रकाशित होने वाला एक प्रतिष्ठित दैनिक सांध्य समाचारपत्र है। यह कुछ मासूम बच्चे, जिनकी उम्र अभी पढ़ने-लिखने की है, उन्हें एक हजार रूपये के मासिक पगार पर अपने समाचार पत्र बिकवाता है।

दर्जनों की तादात में ये बच्चे "जिनकी उम्र महज 12 वर्ष से लेकर लगभग 16 वर्ष तक की है" हमेशा आपको शहर के व्यस्ततम चौराहों पर पेपर बेचते मिल जायेंगे। इन बच्चों के शरीर पर प्रदेश टुडे का एक टी-शर्ट होता है जो इनके कद-काठी के हिसाब से काफी बड़ा होता है, जिसके कारण ऐसा प्रतीत होता है जैसे बच्चे ने टी-शर्ट को नहीं बल्कि टी-शर्ट ने बच्चे को पहना है। बच्चों से बात करने पर हमे जो जानकारी मिली वो इस प्रकार है।

1. पगार के रूप में एक हजार रुपये हर महीने मिलता है।

2. इस महीने 20 मार्च को वेतन मिलेगा।

3. दोपहर 2 बजे से ये रात तक पेपर बेचते हैं।

4. इन बच्चों में से कुछ को अपना नाम तक नहीं लिखने आता।

5. कुछ बच्चे सवेरे भी पेपर बेचते हैं और दोपहर को भी जिससे स्कूल जाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता।

'अग्निवाण' यह भी भोपाल से प्रकाशित होने वाला दैनिक सांध्य समाचार पत्र है जिसके अंतर्गत लगभग 13 से 17 साल के बच्चे अस्सी रुपये दिहाड़ी के हिसाब से समाचारपत्र बेचने का काम करते हैं। जब बच्चों से पूछा गया कि वे पढ़ने की बजाय ये कम क्यों कर रहे हैं तो उनका जवाब था कि ऐसा वे पेट भरने के लिए कर रहे हैं। शिवराज मामा के सरकार में भांजाओं का ये हाल पत्रकारिता के साथ-साथ प्रदेश की शासन व्यवस्था का भी पोल खोलता है।

"बच्चे इस देश के भविष्य है" ऐसे तमाम किस्से छापने और सुनाने के बावजूद प्रदेश टुडे और अग्निबाण के अलावा ऐसे बहुत सारे समाचार पत्र हैं जो इन मासूम बच्चों की जिन्दगी का सौदा एक हजार रुपये से कर रहे हैं। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। लेकिन पत्रकारिता से जुड़े ऐसे संस्थान जो मासूम बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं उसे क्या कहेंगे? पत्रकारिता के इस स्वरूप को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ तो क्या लोकतंत्र का हिस्सा कहना भी बेमानी है।

समाचार पत्रों का यह घिनौना सच इस बात को दर्शाता है कि मीडिया की नजर ग्राहक और विज्ञापन तक ही सीमित है। आज हमारे देश में ऐसे बहुत सारे समाचार पत्र हैं जो इस प्रकार के हरकतों से पाठकों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। अब जरुरत है ऐसे समाचारपत्रों की पहचान किया जाए और जनमाध्यमों के इस जनकल्याण की सच्चाई को सामने लाई जाए।

किसलय गौरव की रिपोर्ट.

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