Gunjan Sinha : कहने में मुझे अच्छा नहीं लग रहा लेकिन सच है कि अगर देवानंद कुंवर की देह में कीड़े पड़ें, तो मुझे ख़ुशी होगी। कुंवर जैसे राज्यपाल जनता के पैसे पर ऐश करते हैं लेकिन जनता को न यह बताया जाता है कि उन्हें राज्यपाल क्यों बनाया गया और न यह कि उन्हें क्यों हटाया। दोनों काम चोरी चुपके। बिहार से हटा कर त्रिपुरा की गद्दी दे दी। अगर योग्य थे तो बड़े राज्य से हटा कर छोटे में क्यों भेजा? अयोग्य थे तो उन्हें कहीं भी क्यों बिठाया। कुंवर मनमोहन की मजबूरी क्यों हैं?
इस आदमी ने बिहार के विश्वविद्यालयों का बुरा हाल कर दिया। मैं और मेरा परिवार कुंवर देवानंद की मूर्खतापूर्ण निरंकुशता का शिकार हुए। मेरा सबसे छोटा भाई अविकसित ब्रेन का है – दो साल के बच्चे जितनी अक्ल उसे है। पक्षाघात ग्रस्त 83 वर्षीय पिता उसकी देखभाल में असमर्थ हैं। इसीलिए पांच वर्ष पहले विनोबा भावे विश्व विद्यालय, हजारीबाग से मेरे मझले भाई का डेप्युटेशन महाराजा कालेज आरा में हुआ लेकिन पांच वर्ष पूरे होने के बाद झारखण्ड गवर्नर की अनुशंसा के बावजूद देवानंद कुंवर ने आरा में रहने देने की अर्जी अकारण खारिज कर दी, जबकि इन पांच वर्षों में मेरे पिता और अशक्त हुए हैं। जिस आधार पर अर्जी सुनी गई वह स्थिति बढती उम्र के साथ और खराब ही हुई है। लेकिन ऐसे मानवीय आधार को सुन समझ पाने में जो गवर्नर नाकाम रहे उसके लिए और क्या कह सकते हैं सिवाय इसके कि उसकी देह में कीड़े पड़ें तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी।
वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा के फेसबुक वॉल से.





