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लखनऊ

अखिलेश सरकार का एक साल : कामयाबी पर भारी नाकामी

उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार की कामयाबी पर उसकी नाकामी भारी पड़ रही है। साफ शब्दों में कहा जाये तो 15 मार्च 13 को एक वर्ष की हो गई अखिलेश सरकार ने साल भर में खोया ज्यादा पाया कम। युवा सीएम पूरी तरह दबाव में रहे। बसपा को हटा कर सत्ता हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी ने दावे तो बड़े-बड़े किये थे लेकिन हकीकत में समाजवादी सरकार भी बसपा सरकार की कार्बन कापी ही नजर आईं।सपा के तमाम अघोषित ‘सुपर सीएम’ के सामने युवा मुख्यमंत्री की एक भी नहीं चली।

उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार की कामयाबी पर उसकी नाकामी भारी पड़ रही है। साफ शब्दों में कहा जाये तो 15 मार्च 13 को एक वर्ष की हो गई अखिलेश सरकार ने साल भर में खोया ज्यादा पाया कम। युवा सीएम पूरी तरह दबाव में रहे। बसपा को हटा कर सत्ता हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी ने दावे तो बड़े-बड़े किये थे लेकिन हकीकत में समाजवादी सरकार भी बसपा सरकार की कार्बन कापी ही नजर आईं।सपा के तमाम अघोषित ‘सुपर सीएम’ के सामने युवा मुख्यमंत्री की एक भी नहीं चली।

साल बीत गया लेकिन इस दौरान अखिलेश न सही फैसले ले पाये, न ही अपनी पसंद की टीम बनाने का उनका सपना साकार हुआ। चुनाव के समय उनके साथ कंधें से कंधा मिलाकर चलने वाली युवा टीम राजनीति के पर्दे से नदारत हो चुकी है। विकास करके जनता को लुभाने की बजाये खैरात बांटकर उनको लुभाने की कोशिश हो रही है। खैरात भी ऐसे ही नहीं बंट रही है, खैरात किस धर्म के लोगों को देने से फायदा हो सकता है इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है। खैरात बांटने का भी कोई मापदंड नहीं है, जिसकी किस्मत में जो आ जाये। बात वायदों की कि जाये तो एक वर्ष में सपा सरकार ने चुनावी घोषणा पत्र में किये गये अनेक वायदे पूरे जरूर किये लेकिन इसमें भी खुलकर दांवपेंच खेले गये, राजनीति की गई। जनता को बरगलाते हुए बसपा राज की कई योजनाओं का मात्र नाम बदल कर उसे समाजवादी नेताओं के नाम से लागू कर दिया गया। बसपा शासन में बनने वाली योजनाओं पर मान्यवर कांशीराम, डा अम्बेडकर, शाहू जी महाराज जैसे दलित चिंतकों के नामों की छाप रहती थी, तो सपा राज में यह स्थान डा. राममनोहर लोहिया, जनेश्वर मिश्र जैसे नेताओं ने ले लिया।

कांशीराम ग्रामीण विकास योजना अब डॉ0 राम मनोहर लोहिया समग्र ग्राम विकास योजना, कांशीराम आवास योजना अब लोहिया ग्रामीण आवास योजना के नाम से क्रियान्वित हो रही है। सरकार द्वारा कई विवाद भी बेवजह खड़े किये जा रहे है। लखनऊ में लोरेटो कॉन्वेंट चौराहे से लेकर तेलीबाग मार्ग पर रेल उपरिगामी सेतु का निर्माण कराये जाने की घोषणा भी एक ऐसा ही विवादित फैसला है। सेतु का निर्माण जिस सड़क पर करने की बात की जा रही है उस सड़क पर पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती का बंगाल है। बसपाइयों का कहना है कि इससे बहनजी के बंगले की सुरक्षा पर असर पड़ेगा, जबकि हकीकत में देखा जाये तो पुल का निर्माण तब तक संभव ही नहीं है जब तक की रेलवे इसकी इजाजत न देदे, दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि इसका कुछ हिस्सा सैनिक क्षेत्र (कैंट) में भी आता है। सेना ऐसे किसी सेतु का निर्माण शायद ही पसंद करे।

जहां तक बात औद्योगिक विकास की है तो अखिलेश के सीएम बनने के बाद उम्मीद जागी थी कि प्रदेश का औद्योगिक विकास तेजी से होगा, लेकिन यह काम भी रफ्तार नहीं पकड़ पाया। प्रदेश में आईटी हब बनाने की उनकी योजना अधर में है। जनवरी माह के अंत में आगरा में हुई ग्लोबल पार्टनरशिप समिट भी अपनी छाप नहीं छोड़ पाई। इस समिट में 1300 से अधिक निवेशकों, उद्यमियों, विदेशी राजदूतों एवं कॉपोरेट जगत के महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने भाग लिया था। उस समय तो बड़ा अच्छा लगा था, लेकिन आज स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री या फिर बड़े अधिकारी किसी उद्योगपति से सीधे मुलाकात ही नहीं करते, डरते हैं कि कही कलंक न लग जाये। एक घटनाक्रम से इसे समझा जा सकता है। हुआ यूं कि एक लैपटॉप कम्पनी (जिसके लैपटॉप इंटर पास बच्चों को बांटे जा रहे है) के चेयरमैन जो पूरे एशिया के प्रभारी है ने मुख्य सचिव से लखनऊ में मुलाकात का समय मांगा। समय तय भी हो गया लेकिन जब मुलाकात का समय आया तो मुख्य सचिव उनसे मिले ही नहीं। इससे उद्योग जगत में कोई बहुत अच्छा मैसेज नहीं गया। यह और बात है कि कई बड़े दलालों की पहुंच सत्ता के गलियारों तक मजबूत बनी हुई है जो रात के अंधेरों में अपना काम कराते हैं।

बात उपलब्धियों की कि जाये तो सभी सरकारी एवं अनुदानित निजी महाविद्यालयों में स्नातक स्तर तक छात्राओं को मुफ्त शिक्षा देने का उसका निर्णय सराहनीय रहा। इसी तरह से महिलाओं के साथ की जाने वाली बदसलूकी को रोकने के लिए ‘समाजवादी वीमेन पावर लाइन 1090 सेवा’ प्रारम्भ की गई जिसका भी अच्छा प्रभाव देखने को मिला। इमरजेंसी मेडिकल ट्रांसपोर्ट सेवा के अंतर्गत समाजावादी स्वास्थ्य सेवा की एम्बुलेंसों को संचालित करने की योजना 108 भी प्रारम्भ की गई, लेकिन अभी इसकी कामयाबी का ग्राफ काफी कम है। इस योजना के अंतर्गत 988 एंबुलेंस संचालित की जा रही है। अच्छा होता कि इन योजनाओं के साथ समाजवादी नाम न जोड़ा जाता। नाम जोड़ने का सबसे बड़ा नुकसान तो यही रहता है कि अगर पांच वर्षों के बाद दूसरी पार्टी की सरकार बनती है तो वह इस तरह की योजनाओं को सबसे पहले बंद करती है। वैसे भी किसी के बुरे वक्त में काम आने के लिये यह बताना जरूरी नहीं होता है कि हम कौन हैं, इससे उपकार की महत्ता कम ही होती है। बात यही तक सीमित नहीं है समाजवादी सरकार की अधिकांश योजनाओं पर राजनीति का रंग देखने को मिल रहा है। इंटर पास बच्चों को बांटे जाने वाले लैपटॉप पर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की भी फोटो लगा दी गई। इसके पीछे का तर्क यह दिया गया कि मायावती अनेकों अवसरों पर अपने साथ कांशीराम की फोटो लगवाती थीं।

समाजवादी सरकार के ऊपर राजनीति बुरी तरह हावी रहती है। कमजोर वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएं बनाई जाती है तो उसे एक वर्ग विशेष तक ही सीमित कर दिया जाता है। यही वजह है अल्पसंख्यक समुदाय की 10 वीं पास पुत्रियों को शिक्षा अथवा विवाह हेतु हमारी बेटी उसका कल योजना के अंतर्गत 350 करोड़ रूपये आवंटित कर दिये जाते हैं लेकिन अन्य बिरादरियों की गरीब बेटियां मुंह देखती रह जाती हैं, मानो उनका यह गुनाह हो कि वह एक वर्ग विशेष में क्यों नहीं पैदा हुईं। यहां तक कि अल्पसंख्यक समुदाय के अंन्त्येष्टि स्थलों एवं कब्रिस्तानों की सुरक्षा और चहार दीवारी निर्माण योजना हेतु 300 करोड़ की व्यवस्था बजट में कर दी जाती है जबकि यह कार्य समाजिक सरोकार से जुड़ा होता है। अल्पसंख्यक इलाकों में शैक्षणिक हब, मदरसों पर दिलेरी ऐसे कारनामें हैं जो सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं। अदालत को ठेंगा दिखा कर जेलों में बंद आतंकवादियों को बेकसूर बता कर छोड़ने का प्रयास भी इसी कड़ी का हिस्सा है। सरकार के कारनामों से मुसलमानों का भला कितना हो रहा है यह तो कोई नहीं जानता लेकिन सरकार की कार्यशैली से सामाजिक तानाबाना जरूर बिगड़ रहा है।

इसी तरह से अनेक मौकों पर बसपा के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर और भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने का वायदा करके सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने वाली समाजवादी नेताओं के दावे भी कदम-कदम पर छलावा साबित हुए। लोग तो यह भी कह रहे हैं कि सपा से अच्छी तो बसपा सुप्रीमो ही थीं जिन्होंने अपने मंत्रिमंडल के कई सहयोगियों को भ्रष्टाचार के चलते हवालात में भेज दिया था, जबकि सपा सरकार किसी भी बसपाई को छू तक नहीं पाई। अखिलेश राज में बसपा राज के दो भ्रष्ट मंत्री जेल गये तो लेकिन इसमें भी प्रदेश सरकार की कोई भूमिका नहीं थी, दोनों को सीबीआई अदालत ने जेल भेजा था। कुछ पर लोकायुक्त ने शिकंजा कसा। इसे भी इतिफाक नहीं कहा जा सकता है कि बसपा राज में जिस शराब माफिया पोंटी चड्ढा (अब दिवंगत) और जेपी ग्रुप का दबदबा दिखाई देता था और सपाई इन लोगों के खिलाफ जहर उगलते रहते थे, वो ही पोंटी चड्ढा महीने भर के भीतर अखिलेश का भी प्यारा हो गया था, यह और बात थी कि दोनों के बीच करीबी और बढ़ती इससे पहले ही उसकी मौत हो गई। जेपी ग्रुप को भी बसपा की ही तरह समाजवादी सरकार ने गले लगा रखा है। उसे बसपा राज के कारनामों पर से आंखे मूंद ली गई हैं।

बसपा जब सत्ता में थी तो उसके चीनी मिल बेचने के फैसले पर सपा नेताओं ने खूब होहल्ला मचाया था। सपा की सरकार बनने पर जांच की बात और दोषियों को जेल भेजने की बात कही जा रही थी लेकिन जब सपा की सरकार बनी तो वह बसपा का फैसला पलटने की बजाये चीनी मिल बेचने में आ रहे रोड़ों को ही हटाने में ही जुटी रही। किसानों के हितों की उसे भी रत्ती भर चिंता नहीं रही। किसानों की हालत जैसी थी वैसी ही है। उनके कर्ज माफी में भी खेल गया। जिस कारण अधिकांश किसानों को कर्ज माफी का फायदा ही नहीं मिला। किसानों को प्रदेश सरकार ने गेहूं के समर्थन मूल्य पर बोनस देने से इंकार कर दिया। बोनस न देने की वजह के बारे में सरकार का कहना था कि पिछली सरकार ने प्रदेश का जो हाल करके छोड़ा है, उससे वह बोनस देने की स्थिति में नहीं है। किसान मित्र योजना को भी सपा सरकार नहीं शुरू कर पाई है। यह योजना 2010 में बंद हो गई थी जिससे 50 हजार से ज्यादा किसान मित्र बेरोजगार हो गये थे, सपा ने इसे फिर से लागू करने की बात कही थी, अब सरकार का कहना है कि यह योजना उपयोगी नहीं है।   

अखिलेश सरकार के सत्तारूढ़ होते ही सपा मुखिया और सरकार की तरफ से सबसे पहले घोषणा पत्र के वायदों को पूरा करने का एलान हुआ। बेरोजगारी भत्ते के लिए सेवायोजन कार्यालयों में लाखों की युवाओं की इतनी भीड़ कि तिल धरने की जगह नहीं बची। महिलाओं का आलम यह था कि बगल में बच्चा दबाए वह भी पंजों के बल लाइन में लगी रहीं। यह सब सरकार की जीत की परिणति थी। युवा, किसान, बुनकर, फुटकर दुकानदार, असहाय महिलाएं सभी को यह आसरा हुआ कि अखिलेश सबको कुछ न कुछ देगी जरूर। सबसे पहले बेरोजगारी भत्ता देने का एलान सरकार ने कर दिया था। बाद में किसानों को बिजली पानी इत्यादि की व्यवस्था शुरू कर दी लेकिन कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर था। बेरोजगारी भत्ता के दावेदारों के सामने इतने सवाल और शर्ते लगाई गईं कि करोड़ बेरोजगारों में से कुछ हजार या लाख के हाथ ही बेरोजगारी भत्ते की रकम पहुंच पाई। बेरोजगारी भत्ता पाने वालों से ज्यादा संख्या न पाने वालों की रही, यह नाराजगी अभी भी बेरोजगारी भत्ता पाने की आस जगाये लोगों में खत्म नहीं हुई है।

यह प्रदेश के लिये दुखद है कि कांटों का ताज पहने अखिलेश मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ तो गए लेकिन उनके पास मुलायम जैसी काकदृष्टि और राजनीतिक अनुभव की विधा नहीं थी। अखिलेश अनुभवहीन थे तो उनके आसपास बैठने वाले वजीर ऐसे-ऐसे थे जो कुशल राजनीतिज्ञ, पटु और विपक्ष के व्यंग्य वाणों को काट सकते थे। अखिलेश इनके पीछे दब कर रह गये। सवाल मुख्यमंत्री से किये जाते जवाब उनके मंत्री देते हैं। पूरे साल लोग यही पूछते रहे कि सरकार कौन चला रहा है। सत्ता के पांच-पांच केन्द्र हो गये। विधान सभा में आजम के पीछे मुख्यमंत्री खड़े दिखते तो शासन-प्रशासन में शिवपाल यादव की चलती है, तय तोड़ करने की जिम्मेदारी राम गोपाल यादव ने संभाल रखी थी। सपा मुखिया भी अपनी अहमियत बनाये रखते हैं। कुंडा कांड हुआ तो उन्होंने अखिलेश की तुरंत पीठ थपथपाई और कहा कि उसने बहुत जल्दी-जल्दी फैसले लेकर डैमेज कंट्रोल कर लिया। मुख्यमंत्री भी सपा प्रमुख के प्रति अपना फर्ज पूरा करते रहते है। यही वजह थी उन्होंने इंटर पास करने वाले बच्चों को बांटे जाने वाले लैपटॉप में नेताजी का चित्र लगा दिया। कुछ कहते कि चचाओं के बीच फंसा भतीजा तो कोई कहता पर्दे के पीछे से चल रहा है ‘नेताजी’ का खेल चल रहा है।

ब्यूरोक्रेटस पर पकड़ के लिए सरकार ने साल भर में कई बार उनकी नकेल कसी। डांटा-फटकारा, निलंबित किया लेकिन सभी उपाय बेमानी साबित हुए। हुकुम उदूली और मनमानी करने वाले अफसरों को ताश के पत्तों की फेंटा गया तो एक ही दिन में दर्जनों नौकरशाहों को इधर से उधर फेंका गया। नतीजा फिर भी शून्य निकला। तबादलों के कारण आईपीएस, आईएएस अफसर लेकिन सुधरे नहीं, नौकरशाहों के एक जगह लम्बे समय तक ठहर नहीं पाने का प्रभाव विकास कार्यो पर पड़ा। एक वर्ष के बाद भी नौकरशाह जैसे बसपा सरकार में थे, ठीक उसी तरह सपा सरकार में भी काम करते देखे गये। माया राज में जो नौकरशाह किसी भी वजह से किनारे था उसे माया से प्रताड़ित मानकर मलाईदार पदों पर बैठा दिया गया। जिन अधिकारियों का सरनेम यादव है, उनकी दो दसों उंगलिया घी में हैं। योग्यता को दनकिनार करके उन्हें प्राइम पोंस्टिंग दे दी गई। कुछ ब्यूरोक्रेट्स तो नाम न छापने की शर्त पर यहां तक कहते हैं कि उत्तर प्रदेश विकास और कानून व्यवस्था के मामले में रसातल में जा रहा है तो इसके पीछे की वजह वह लोग जो प्रदेश येन-केन-प्रकारेण अपने हित साधना चाहता है। मजबूत और तेजतर्रार शासन-प्रशासन यह लोग पसंद नहीं करते है। अगर ऐसा हो गया तो इनके अपने हित कैसे पूरे होंगे। योग्यता पर अयोग्यता भारी पड़ रही है।

समाजवादी सरकार द्वारा एक वर्ष में किये गये विकास कार्यों को देखा जाए तो सरकार ने विकास के विभिन्न पहलुओं को तो छुआ है। मगर घोषणाओं के मुताबिक उसे साकार करने में सरकार उतनी चुस्ती फुर्ती नहीं दिखा पा रही है। विपक्ष कहता है कि सरकार ने पिछला बजट ही नहीं खर्च किया तो विकास कैसे होता। पिछला बजट खर्च किये बिना ही उसने अगला बजट पेश कर दिया। उसके पास आधा बजट अभी भी अधूरा पड़ा हुआ है, जिससे विकास के कार्यों की यूं ही समीक्षा की जा सकती है। सपा सरकार विकास की जगह राजनीति करने में लगी है। उसकी कथनी और करनी में फर्क है। उसका विकास का मुद्दा नौ दिन चले अढ़ाई कोस जैसा लगता है। उसकी कामयाबी पर नाकामी भारी पड़ रही है। 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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