भाजपा के साथ ये दिक्कत है कि वो अगर एक कदम आगे लेती है तो दो कदम पीछे लेती है। ये प्रवृत्ति कई मौकों पर दिख चुकी है जिसका खामियाजा भी भाजपा ने उठाया है और इस प्रवृत्ति में उतरोत्तर बढ़ोतरी हो रही है। हर मौके पर पार्टी में दो राय सामने आती है। पार्टी नेतृत्व इसे भले ही आंतरिक लोकतंत्र और आजादी बताकर प्रचारित करता हो लेकिन ये आदत पार्टी को नुकसान ही पहुंचाती है। भाजपा खुद को पार्टी विद डिफरेंस के तौर पर प्रचारित और स्व विभूषित भी करती है लेकिन पार्टी संगठन से लेकर रीति-नीति तक उसके दर्शन नहीं होते। वो राष्ट्रवाद, राम मंदिर, धारा 370, कशमीर के विशेष दर्ज को खत्म करने की बात भी करती है लेकिन इन मसलों पर कोई अंतिम निर्णय लेने में उसकी कमजोरी सामने आ जाती है।
अपनी इसी अनिर्णय की आदत के कारण वो किसी की भी सगी नहीं बन पा रही है। उसका वोट बैंक भी उसके इस व्यवहार से अंदर ही अंदर नाराज है और बुझे मन से से उसका साथ देता है। उसके मन में भाजपा के प्रति भी वही गुस्सा और नाराजगी भरी है जैसी उसके मन में तमाम दूसरे राजनैतिक दलों के लिए है। असल में भाजपा खुद को विकल्प के तौर पर प्रचारित तो कर रही है लेकिन पिछले नौ सालों में वो एक बार भी देश की जनता को अपने इस रूप के दर्शन नहीं करा पाई।
आदर्श हाउसिंग घोटालों से लेकर किसानों की ऋण माफी योजना में घोटाले तक दर्जन भर ऐसे बड़े भ्रष्टाचार के मामले थे जिसमें वो यूपीए को बुरी तरह घेर सकती थी। यूपीए-1 के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार और जन विरोधी निर्णयों का अगर भाजपा ढंगे से प्रचार करती तो यूपीए को दूसरा कार्यकाल मिलता ही नहीं। लेकिन भाजपा में अनिर्णय का कुहास इस कदर गहरा है कि वो चाहकर भी उससे बाहर निकल नहीं पा रही है। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे गडकरी को अध्यक्ष पद से हटाकर राजनाथ को आम चुनाव से पूर्व पार्टी की कमान सौंपना पार्टी का काफी दिनों बाद लिया अगर अच्छा निर्णय कहा जा सकता है। लेकिन मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर घोषणा करने और न करने के मुद्दे पर पार्टी एक बार फिर अनिर्णय की गंभीर स्थिति में दिखाई दे रही है। भाजपा की अनिर्णय और निर्णय लेने में संकोच और अति चिंतन का परिणाम हमेशा मंहगा साबित हुआ है बावजूद इसके पार्टी नेतृत्व अपनी आदत से बाज नहीं आ रहा है। भाजपा पार्टी में भले ही आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन की बात करती हो लेकिन उसका चरित्र भी दूसरी राजनीतिक दलों के समान है। वंशवाद की बेल से वोट बैंक की राजनीति और सत्ता प्राप्ति के लिए सारे प्रपंच भाजपा भी करती है यह खुला सच है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में केंद्रीय नेतृत्व जब एक कदम चलता था तो प्रदेश इकाई के मठाधीश टाइप नेता केंद्रीय नेतृत्व को दो कदम पीछे खींचने के लिए विवश कर देते थे। उमा भारती को मुख्यमंत्री बनाने का सपना दिखाकर यूपी के चुनाव मैदान में उतारा गया था लेकिन आंतरिक राजनीति और गुटबाजी ने उन्हें चरखारी तक ही समेट दिया। ये स्थिति केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी दिखती है। वो भले ही राजस्थान, मध्य प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष के चयन का मामला हो या फिर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के मनोनयन का मामला भाजपा हर निर्णय में अनिर्णय की स्थिति में होती है और परिस्थितिजन्य वातावरण के अनुसार आसन्न संकट टालने के लिए अदूरदर्शी और शार्ट टर्म के निर्णय लेती है जिसका उसे भारी भरकम खामियाजा उठाना पड़ता है। वैसे भी भाजपा कूटनीति के मामले में कांग्रेस के सामने दूर-दूर तक टिकती नहीं है। अगर उसमें रती भर भी दूरदर्शिता होती तो वो पिछले नौ साल के यूपीए सरकार के कार्यकाल की कमियों और भ्रष्टाचार का खाका इस तरह से खींचती कि देश की जनता उसे उखाडने की लिए स्वतरू तत्पर हो जाती। लेकिन वो जैसे ही यूपीए को किसी मामले में घेरती है तो यूपीए तुरंत पलटवार करती है जिसका जवाब भाजपा के पास नहीं होता है। भाजपा एक भी निर्णय पूरी ताकत से पार्टी के सुधार, उत्थान से लेकर विरोधियों को घेरने के लिए नहीं पाती और उसकी यही कमजोरी उसके लिए घातक बन गयी है।
देश को सर्वाधिक 80 सांसद देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी की हालत नाजुक है। विधानसभा चुनाव में आईसीयू में पहुंची पार्टी को निकाय चुनावों से मिली जीत ने आईसीयू से बाहर तो पहुंचाया है लेकिन पार्टी की लोकप्रियता का ग्राफ बढने की बजाय कम हो रहा है। हाल में देवरिया के भाटपार रानी उप चुनाव में पार्टी प्रत्याशी पांचवें स्थान पर रहे और मात्र पांच हजार वोट ही बटोर पाए। दिल्ली की गद्दी का रास्ता वाया लखनऊ जाता है इसकी फिक्र किसी भी भाजपा नेता को नहीं है। प्रदेश में पार्टी लगातार अपना जनाधार खो रही है। पिछले डेढ़ दशक में पार्टी के सांसदों की संख्या 57 से घटकर 10 व विधायकों की संख्या 187 से घटकर 47 पर पहुंच गई है। इसके बावजूद पार्टी कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। कमोबेश यही स्थितियां हरियाणा, पंजाब, उत्तराखण्ड और राजस्थान में भी है। असल में पार्टी में प्रथम पंक्ति के नेताओं की महत्वकांक्षाएं उम्र के साथ घटने की बजाए बढ़ती जा रही हैं। लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की अधूरी चाहत बार बार उबाल खाती है और वो पार्टी में अपना वर्चस्व और लोहा मनवाने के लिए राजनीति करने से चूकते नहीं है। नितिन गडकरी दूसरी बार राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से रोकने में उनकी भूमिका किसी से छिपी नहीं है। फ्रंट लाइन के नेता दूसरी लाइन के नेताओं को आगे बढने का मौका ही नहीं दे रहे है और इसी छटपटाहट में पार्टी को आगे बढ़ाने की बजाय सबका ध्यान खुद को स्थापित करने, अपना वर्चस्व दिखाने और दूसरों को परास्त करने में लगा रहता है। बीजेपी की इसी कमजोरी का लाभ यूपीए उठाता है। एनडीए के घटक दलों में चुनाव पूर्व फूट डालने की नीयत से ही पर्दे के पीछे से कांग्रेस मोदी राग का गाना ऊंची आवाज में बजवा रही है जिससे एनडीए का कुनबा बिखर जाए और बीजेपी में भी सिर फुटौव्वल की स्थिति उपजे। कांग्रेस की इसी चाल और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के विरोध और आलोचना से घबराकर भाजपा राम मंदिर जैसे अपने सबसे सुपर हिट फॉर्मूले को बस्ते में डाल देती है और मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित करने की बजाय चिंतन, मंथन और विमर्श का रास्ता चुनती है।
असल में भाजपा का यही रवैया उसको उसके वोट बैंक से दिन ब दिन दूर कर रहा है। राम मंदिर, हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के नारे के बलबूते ही उसे सत्ता का सुख मिला। लेकिन सत्ता प्राप्ति के बाद वो सारे चुनावी वादे भूलकर एक विशुद्ध राजनीतिक दल की भांति व्यवहार करने लगी, उसके इस चरित्र ने देशवासियों की भावनाओं को ठेस तो पहुंचाई ही वहीं उसका पार्टी विद डिफरेंस का तगमा भी उससे छीन गया। भाजपा एक राजनीतिक दल है और उसे भली भांति मालूम है कि जिस देश में वो राजनीति करती है वो एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला राष्ट्र है। जिसमें विभिन्न धर्मों, मतो और संप्रदायों को मानने और अलग बोली-भाषा और संस्कृति वाले लोग रहते हैं वो ऐसे मद्दों का चुनाव क्यों नहीं करती जिसमें राष्ट्र विकास, जन कल्याण और सर्वांगीण विकास की भावना जुड़ी हो और अगर उसने यह सोच ही लिया है कि उसे सत्ता पानी है तो वो अपने वादे पूरे करने से हिचकती क्यों है। चुनाव में सिंह गर्जना और कुर्सी पर बैठते ही मिमयाने और सरकार चलाने की जुगाड़बाजी ही अगर उसे करनी है तो वो देश की जनता से झूठे वादे करना भी बंद करे। और अगर वो केवल सत्ता प्राप्ति के लिए अयोध्या, मथुरा, कश्मीर से जुड़े वादे वोटरों से करती है तो उन्हें पूरा करने का साहस भी अपने भीतर पैदा करे। लेकिन अफसोस इस बात है कि वो अपने वादों पर अमल नहीं करती। एक बात साफ है कि जब तक भाजपा स्वयं को अनिर्णय के भाव से उबारेगी नहीं और खुद को यूपीए के मजबूत विकल्प के तौर पर पेश नहीं करेगी तब तक उसके इरादे पूरे होने वाले नहीं हैं।
लेखक डा. आशीष वशिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं.





