Nadim S. Akhter : अगर आपको ये खबर चौंकाने वाली लगे कि दलाली के धंधे में पत्रकार बने स्टिंगर-रिपोर्टर-डेस्क इंचार्ज वगैरह-वगैरह का हफ्ता-महीना बंधा होता है तो आप वाकई में बहुत भोले हैं…और ये हफ्ता-महीना देते हैं सरकारी अफसर-तथाकथित नेता-माफिया और वो सभी, जिन्हें डर होता है कि मीडिया में अगर उनका भ्रष्टाचार उजागर हो गया, सिंगल कॉलम ही खबर छप गई, टीवी पर टिकर ही चल गया और असाइनमेंट की कृपा हो तो खबर ही चल गई, तो उनके धंधे-रेपुटेशन का बेड़ा गर्क हो जाएगा…सो भाई, चल तू भी अपना हिस्सा ले और मुंह बंद रख…चोर-चोर मौसेरे नहीं, जात भाई…. एक घटना बताता हूं…
एक वरिष्ठ को ये पता था कि फलां रिपोर्टर कितना घाघ है…क्या चाल-चलन हैं उसके…इसलिए जब चर्चा हुई तो कहा कि यार, जब गाय दुधारु होती है, तो दुलत्ती तो मारेगी ही…हां, मैं ये नहीं समझ पाया कि गाय के दुधारु होने से उनका क्या तात्पर्य था…वह गाय 'अच्छी खबरें' भेजकर दुधारु बनी थी या फिर उगाही की रकम का हिस्सा ऊपर बांटकर…कुछ ये तर्क देते हैं कि जब स्टिंगरों (वे रिपोर्टर, जो चैनल-अखबार के लिए काम तो करते हैं लेकिन कंपनी के पे-रोल पर नहीं होते…हां, फील्ड में खुद को संबंधित संस्थान का रिपोर्टर बताकर अच्छी-खासी धाक जमाए रखते हैं…इनको भुगतान अखबार में खबर छपने के हिसाब से मिलता है और टीवी में per story के हिसाब से) को इतना कम पारिश्रमिक (अखबार में इसे मानदेय कहते हैं) आप देंगे तो वे अपना और परिवार का पेट कैसे पालेंगे…लेकिन ये सारे खोखले तर्क हैं…मेरा सीधा मानना है कि अगर आपको कंपनी से परिवार चलाने लायक पैसा नहीं मिल रहा है तो किसने आमंत्रित किया है आपको स्टिंगर बनने के लिए…मत कीजिए पत्रकारिता…जाइए, कोई और काम-धंधा करिए…कम से कम आपकी हरकतों से चौथा खंभा बदनाम तो नहीं होगा….
वैसे अखबार में पहले स्टिंगर या अंशकालिक संवाददाता वे लोग बनते थे, जिनकी रोजी-रोटी का जरिया कोई दूसरा पूर्णकालिक पेशा होता था…मसलन वो इंजीनियर-डॉक्टर-वकील-बिजनेसमैन आदि होते थे और खबरों से जुड़ाव के कारण अखबार को खबर भेजते थे, बदले में उन्हें अखबार 'मानदेय' देता था…उनका घर चलना और चलाना इस मानदेय पर निर्भर नहीं था…लेकिन जमाना बदला और ऐसे लोग स्टिंगर-अंशकालिक संवाददाता बनने लगे, जो ये सोचकर इस पेशे में आते हैं कि संस्थान के मानदेय से क्या मतलब…असली कमाई तो अलग से होनी है…और यहीं से शुरुआत होती है….आज भी कई बड़े अखबारों के स्टिंगरों का मानदेय 500 रुपये से शुरु होकर 4-5 हजार रुपये तक जाता है…कुछ अखबारों में तो डेस्क पर भी स्टिंगर होते हैं…जिन्हें महीने का बंधा-बंधाया 5-6 हजार रुपया दिया जाता है लेकिन डेस्क वालों से काम वही लिया जाता है, जो एक पूर्णकालिक स्टाफ से लिया जाता है…
जब मैं एक अखबार में बतौर संपादक काम कर रहा था तो एक स्टिंगर जब भी मुझसे मिलने आता था, अपनी चार पहिया गाड़ी बदल-बदल कर आता था…मैंने पता करवाया कि क्या वो घर से या आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध है तो पता चला कि नहीं, मिडिल क्लास फैमिली है लेकिन जब से जनाब ने पत्रकारिता की शुरुआत की है, फैमिली के रहन-सहन का स्तर ऊंचा हो गया है…उस जनाब को हर महीने 1000 रुपये का मानदेय कंपनी की तरफ से दिया जाता था…खबरें वह ठीक भेजता था…लेकिन उसके पास इतना पैसा आया कहां से, ये पूछने पर सिटी के एक रिपोर्टर ने बताया कि पूरा खेल ये है…आप उसे हटा दीजिए लेकिन 1000 रुपये में जब आप दूसरा स्टिंगर उस इलाके में रखेंगे तो इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता कि वो राजा हरिश्चंद्र की तरह सत्यवादी और ईमानदार होगा….
खैर, ये तो रही जिले-कस्बाई इलाके में काम कर रहे पत्रकारों की बात…लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में ही कई ऐसे बड़े और नामी पत्रकार हैं, जिनकी पोल-पट्टी हाल ही में नीरा राडिया केस में खुली है….बाकायदा आडियो टेप सामने आए हैं….उनके बारे में आप क्या कहेंगे क्योंकि उनके साथ तो कोई आर्थिक 'मजबूरी' भी नहीं थी…लाखों की मोटी तनख्वाह पा रहे थे…फिर दामन पर ये दाग कैसे लगा????!!!!!
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Yashwant Singh : डायरी का ये फटा पन्ना कोई कागज का एक टुकड़ा नहीं, मेरे पेशे और मेरे देश के सिस्टम का भयावह वर्तमान है.. ये पन्ना फाड़ कर चुरा लाने के लिए शाबास Manish Soni
Pandit Pramod Shukla : ये पत्रकारों को बदनाम करने की साजिश भी हो सकती है, कोई भी व्यक्ति अपनी डायरी में कुछ भी लिखने को स्वतंत्र है, इसे प्रमाण कैसे माना जा सकता है…..
Vk Sharma : Pandit Pramod Shukla bhai ji aap sachhai se muh nahi mod saktey , ye bhi sachha hai ek hamari media ka hissa hai
Yashwant Singh : जिसे आपत्ति हो वो कोर्ट में जाए, क्योंकि जिसने डायरी का पन्ना फाड़ा है, वो खुद कह रहा है कि सब असली है तो बाकी क्या दिक्कत. हैंड राइटिंग की पहचान करने का तरीका है, जो कोर्ट के आदेश के जरिए होगा…
Neeraj Singla : Sach samne lane k Liye aabhar.
S.s. P Saifai : ऐसे पत्रकार को जूते को माला पहनाकर गधे पर घुमाना चाहिए भाई
Ajendra Kumar : police walo ka kya keroga jo resvat lata ha
Parmod Gupta : patrakarita bik gai h bhai logo
Nadeem Khan : Ye patarkaar nahi dalal hai jo saari media ko badnaam kr te hai
Pradeep Tiwari : shandar Yashwant Singh ji
Chandan Srivastava : क्या विडम्बना है… दिल्ली मे 100-200 करोड़ और जिलो मे 500- 1000… बहुत नाइंसाफी है.
Navin Patel : इन पत्रकारों की आत्मा मर चुकी है। सच ये भी है कि इन अखबारों के मालिकानों और ऊपर बैठे हुक्मरानों की भी नीयत गंदी है। वो सिर्फ पत्रकार नाम का तमगा बांटकर लुटेरे ही बनाना चाहते हैं। सैलरी नहीं देना चाहते। न्यूनतम मजदूरी तक नहीं।
Pandit Pramod Shukla : नवीन पटेलजी की बातों में भी कुछ हद तक सच्चाई है। मीडिया के लोग दूध के धुले कतई नहीं कहे जा सकते परंतु ये ध्यान रहे कि चार भ्रष्ट लोगों की आंड में यदि दो ईमानदार लोगों पर भी कीचड़ उछालने की साजिश सफल हो गयी तो मीडिया तो मीडिया की विश्वसनीयता और ज्यादा कमजोर हो जाएगी…… इसस सावधान रहने की जरूरत है। इस तरह के मामले आम तौर पर अदालतों में बहुत लंबे समय तक लटके रहते हैं, फैसले तक पहुंचने की नौबत ही नहीं आती। ऐसे मामलों में मीडिया में छपी खबरें जनता की अदालत में फैसला करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
Syed Mazhar Husain : ye Dalali hai sharm aani chahiye in patrkaro ko
Mohd Apeel Bablu isme aap ka no. nahi hai chandan bhai
Chandan Srivastava hota apeel bhai agar ye list lko ya fzd ki hoti
Mohd Apeel Bablu : afssooooooooooooooooooooooooos
Himanshu Bicky : u should must Fight 4 ur Right..
Saurav Bhagat : respect for our government officials.. i bow down for you..!
Man Upadhyay : KYA SAHI H????…. KYA GALAT H????…. YE KAH PANA BADA HI MUSKIL H…KYOKI AAJ-KAL LOGO JAMEER KHO GAYA H!!!!!!
Manish Soni : आप सभी लोगो अगर ये कहें की वाकई में जिन लोगो के नाम हैं अगर ये कोर्ट जाएँ तो मेरे ख़याल से वो दिन कभी नही आएगा… क्योंकि कोर्ट में जाने के लिए पहले पत्रकार होना जरूरी है, न कि वसूली बाज. फिलहाल राईटिंग एक्सपर्ट इस मामले में काम आ सकता है.
Imranraza Immu : aaj patrkarita aor patrkaro ko apne pair ki juti samaj chuke ye safedpoos adhikari bhale hi kisi jile ke patrkaro ko 500 aor 1000. mai kharid kar laal aor pile mai kaed kar le rahe hai par sarokarita ki aawaaj ban kar patrkarita karne wale manis ji jaise long agar us jile mai hai to un adhikariyo ko jaan lena cahiye ki garibo ka khun chus kar raajnetao ke taluve chat kar bhale vo adhikari kahlate hai par o ye nahi samaj pate ki kisi baner se jud kar kaam karne wala patrkar aakhir kyu unse 500 aor 1000 rs. le rha hai isme jitni ijjat hanari khrab hoti hai utni hi un chaneal ke maliko ki jo apne karmchariyo ko aaj gurbat ki is kagar tak phunca chuke hai…..
Prashant Mishra : बिना प्रमाण के पत्रकारों का नाम बदनाम करना उचित नही है । पन्ने पर 31 दिसबंर 2011 है और हाथ से 2012 लिखा गया है । नववर्ष का विज्ञापन शुल्क भी तो हो सकता है जिसे पत्रकारों को बदनाम करने के लिये महिना पाने वाले कहा जा रहा हो । सामने लिखी तारिखों में अनियमितता है चिरमिरी ठाकुर के सामने 26.11.12 की तारिख है वहीं तरूण के आगे 5.2.13 स्पष्ट दिख रहा है और बस्तर बंधु के सामने 13.2.13 है । कमाल है ना
Narayan Pargain : bahut sunder dehradun me bhi hai ak list mail kar du kya
Govind Goyal : ab unako bhee bolana chahiye jinake naam hain..
Yashwant Singh : mail kar dijjiye bhayi
Subodh Yadav : जय हिंद । चारो STAMBH BHRASHT है ।
Jagdish Joshi : YE TALAB KI GANDI MACHHLIYO K NAAM H……………….
Pooja Subba : Not only 4 B'coz no body survive without bharstachar . Not only dehradun all over India . I m surprised to look nd observe
Aamir Pasha : apna zamir jinhone becha uska pakka chittha hai kya sir ye.?
CR Banzarey : मनीष भाई, बहुत ही दुस्साहसी कार्य। आपके इस दुस्साहस की प्रशंसा करता हूँ। छत्तीसगढ़ में ऐसे "खऱ पतवारों" की कमी नहीं है। शिकारों का भयादोहन करना उनका काम होता है। सुरापान करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। अपनी पत्नी, बहन और पारिवारिक महिलाओं को देवी और अन्य महिलाओं को भोग्या मानने-समझने वाले "खर पतवारों" की भी कमी नहीं है। कोरबा का एक बूढ़ा "खर पतवार" सभ्य पेशे से जुडी एक नवयुवती से मिलन करने हर हफ़्ते रायपुर दौड़ता है। वह ख़ुद को कोलकाता और नई दिल्ली के दो बड़े अलग-अलग अख़बार समूहों से जुड़े होने का दावा करता है।
Manoj Kumar Mishra : सर कोरिया जिले में महंगाई दर माइनस में है क्या !!!!….
Manish Soni : मनोज जी ये तो वाकई गंभीर सवाल है?शायद हर जगह यही हाल है .
Imranraza Immu : aaj patrkarita aor patrkaro ko apne pair ki juti samaj chuke ye safedpoos adhikari bhale hi kisi jile ke patrkaro ko 500 aor 1000. mai kharid kar laal aor pile mai kaed kar le rahe hai par sarokarita ki aawaaj ban kar patrkarita karne wale manis ji jaise long agar us jile mai hai to un adhikariyo ko jaan lena cahiye ki garibo ka khun chus kar raajnetao ke taluve chat kar bhale vo adhikari kahlate hai par o ye nahi samaj pate ki kisi baner se jud kar kaam karne wala patrkar aakhir kyu unse 500 aor 1000 rs. le rha hai isme jitni ijjat hanari khrab hoti hai utni hi un chaneal ke maliko ki jo apne karmchariyo ko aaj gurbat ki is kagar tak phunca chuke hai…..






