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क्या राजा मान चुके हैं कि वे खुद तो डूबेंगे, लेकिन सबको साथ लेकर?

अगर मीडिया को एक आहार कहा जाये तो साजिश या षड्यंत्र इस आहार का एक जरूरी निवाला है. यह खबरों के आहार में उस विटामिन की तरह है, जो पौष्टिकता से आगे जाकर उसको जरूरी ऊर्जा देता है. लोगों को असलियत में सूचनाएं अच्छी लगती हैं, क्योंकि यह गप्प मारने की खुराक देती है. एक बोझिल दोपहर को बचाने के लिए अटकलबाजी ज्यादा जरूरी है.

अगर मीडिया को एक आहार कहा जाये तो साजिश या षड्यंत्र इस आहार का एक जरूरी निवाला है. यह खबरों के आहार में उस विटामिन की तरह है, जो पौष्टिकता से आगे जाकर उसको जरूरी ऊर्जा देता है. लोगों को असलियत में सूचनाएं अच्छी लगती हैं, क्योंकि यह गप्प मारने की खुराक देती है. एक बोझिल दोपहर को बचाने के लिए अटकलबाजी ज्यादा जरूरी है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी के बीच बैठक कोई रोमांच पैदा नहीं कर पाती. कोई उनकी सांठ-गांठ की खबर पर यकीन नहीं करेगा. प्रकाश करात और प्रधानमंत्री की बैठक से भी कुछ हाथ नहीं लग सकता. फिर, भाजपा और कम्युनिस्ट नेता टेलीविजन के कैमरों से दूर संसद के गलियारों में मिलते हैं, तो बेहद दोस्ताना माहौल में. लेकिन दोनों के बीच कोई संवाद नहीं होता. लेकिन, किस तरह की खबर सामने आयेगी, यह इस पर टिका होता है कि मीडिया इसे किन अटकलबाजियों और अनुमानों के साथ पेश करता है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कितनी बार बाहें फैलाये कांग्रेस के पास भेजा जा चुका है, इसकी गिनती मुश्किल है. इससे अलग चेन्नई में एमडीएमके सुप्रीमो करुणानिधि के हर स्वर पर दिल्ली से बढ़ती-घटती दूरियों का गणित शुरू हो जायेगा. एक खेल के नाते यह दिलचस्प है. लेकिन, इसे असल राजनीति से जोड़ कर नहीं देखना चहिए. हर गठबंधन में हमेशा एक दबाव की राजनीति चलती रहती है. करुणानिधि अगर भ्रष्टाचार के आरोप में अपनी बेटी के जेल जाने का कड़वा घूंट पी सकते हैं तो मान लेना चहिए कि वे श्रीलंका में हुए मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर सरकार गिराने की कोशिश भी नहीं करेंगे. साफ है कि कांग्रेस हो या डीएमके, दोनों को अपने घर में ज्यादा बड़े हितों को साधना है.

राजनीति में कुछ भी निजी नहीं होता. नीतीश कुमार और भाजपा के संबंध भी चुनावी गणित से ही तय होंगे, न कि वैचारिक शुचिता या दिल्ली की सौगात से. यह समीकरण सिर्फ एक बार खतरे में पड़ा दिखा था, जब नीतीश को लगने लगा था कि वे अकेले भी चुनाव जीत सकते हैं. समझदारी से उन्होंने खुद को इस प्रलोभन से दूर कर लिया और वह क्षण अब पीछे छूट गया है. किसी भी गणितीय चूक को लेकर कोई गारंटी नहीं दी जा सकती. फिर नितीश कुमार आज अपने प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद यादव के खिलाफ अकेले नहीं लड़ सकते. विरोधी खेमा मजबूती ले रहा है. लालू की रैलियों में बढ़ती भीड़ से इसका अंदाज लगाया जा सकता है. भाजपा एक सीमा से आगे जाकर मोदी को प्रोजेक्ट करते हुए अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी को नाराज नहीं कर सकती. नितीश को आज मुसलिम वोट चाहिए, भाजपा को नीतीश की जरूरत है. यह अंकगणित है, बीजगणित नहीं.

दिलचस्प है कि कैसे अटकलबाजियों का भोंपू एक तर्कसंगत और सही कहानी को हाशिए पर डाल देता है. अगर डीएमके और कांग्रेस के संबंधों में कोई भी अस्थिरता आती है, तो उसकी वजह बनेंगे 2जी स्कैम के मुख्य आरोपी और राडिया टेप में अहम किरदार ए राजा, न कि विदेश नीति. राजा 2जी की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति के सामने पेश होने को उतावले हैं. कांग्रेस उन्हें रोकने के लिए बेचैन है. इस पर हैरानी कैसी! दूल्हा गैरकानूनी तरीके से हासिल भारी भरकम दहेज से जुड़ी विशेष जानकारियों को साझा करना चाहता है. राजनीतिक आका उसे इससे रोकना चाहते हैं. संयुक्त संसदीय समिति में मौजूद विपक्षी सांसद राजा को सुनना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस नहीं. क्या कांग्रेस चिंतित है कि राजा 2जी स्कैम में उनके नेताओं की भूमिका को उजागर कर देंगे? राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम कर रही सीबीआई ने चतुराई से राडिया टेप को पैनी निगाहों से दूर कर दिया है. उसके पास सैकड़ों की तादाद में मौजूद टेपों का प्रतिलेखन करने का वक्त नहीं है.

सवाल बहुत से हैं. आखिर राजा ने अचानक ही यह राग छेड़ने का फैसला क्यों किया? वे जानते हैं कि यह उन्हें भी लपेटे में ले लेगा? क्या वे यह मान चुके हैं कि वे खुद तो डूबेंगे, लेकिन सबको साथ लेकर? वे अपने नेता के करीबी कहे जाते हैं, तो क्या उन्होंने यह फैसला उनकी सहमति के बिना लिया है? क्या करुणानिधि अगले चुनाव के मद्देनजर नयी रणनीति बनाने में जुट गये हैं! एक मित्र ने एक साफ-सुथरा समाधान सुझाया है. सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दखल करते हुए राजा को अदालत में अपनी बात कहने का मौका दे, क्योंकि संयुक्त संसदीय समिति में कई लोग उन्हें रोकना चाहते हैं. अदालत ने जब भी इस तरह दखल दिया है, उसकी साख में इजाफा हुआ है. यहां जनहित से जुड़े मामले में साफ-साफ एक शख्स को अपनी बात कहने से रोका जा रहा है. शायद राजा अपनी बात को अदालत के सामने रखते हुए अदालत की ही मदद करेंगे. इससे कुछ घबराहट पैदा होनी चाहिए. फिर मीडिया तो आखिरी रास्ता है ही. एक बार फिर अटकलबाजियों का दौर शुरू होने दीजिए. दोपहर फिर बोझिल होने लगी है.

लेखक एमजे अकबर ‘द संडे गार्जियन’ के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लेख रविवार में प्रकाशित हो चुका है.

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