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लखनऊ

अब कितने दिन तक डीजीपी की कुर्सी पर रह पाएंगे एसी शर्मा?

उत्तर प्रदेश के काबिल डीजीपी ने एक रिकार्ड तो बना ही लिया कि वह पहले ऐसे डीजीपी बन गये हैं जिनको सार्वजनिक रूप से जनता ने दो-दो बार चूडिय़ां भेंट की हों। बदहाल कानून व्यवस्था और अफसरों की राजनीति ने डीजीपी अंबरीश चन्द्र शर्मा की विदाई की घडिय़ां करीब ला दी हैं। अगर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की चली तो कुछ ही दिनों में प्रदेश में नया डीजीपी तैनात होगा। अखिलेश यादव की सरकार बनने के समय सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि प्रदेश में कानून व्यवस्था कैसे कायम रह पाये।

उत्तर प्रदेश के काबिल डीजीपी ने एक रिकार्ड तो बना ही लिया कि वह पहले ऐसे डीजीपी बन गये हैं जिनको सार्वजनिक रूप से जनता ने दो-दो बार चूडिय़ां भेंट की हों। बदहाल कानून व्यवस्था और अफसरों की राजनीति ने डीजीपी अंबरीश चन्द्र शर्मा की विदाई की घडिय़ां करीब ला दी हैं। अगर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की चली तो कुछ ही दिनों में प्रदेश में नया डीजीपी तैनात होगा। अखिलेश यादव की सरकार बनने के समय सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि प्रदेश में कानून व्यवस्था कैसे कायम रह पाये।

सरकार बनने के बाद डीजीपी और तत्कालीन एडीजी जगमोहन यादव के बीच शीतयुद्घ शुरू हो गया था। दोनों अपने को सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति सबसे वफादार होने का दावा करते थे। मगर बाद में जब कानून व्यवस्था बेकाबू हो गयी तो मुख्यमंत्री के गुस्से का पहला शिकार जगमोहन यादव हुए। फैजाबाद में हुए सांप्रदायिक झगड़ों के बाद मुख्यमंत्री नें उन्हें हटा दिया। मुख्यमंत्री ने अरुण कुमार को अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था बनाने के साथ डीजीपी को साफ शब्दों में कहा कि उन्हें हर हालत में प्रदेश में बेहतर कानून व्यवस्था चाहिए। मगर प्रदेश भर में अराजकता का माहौल बढ़ता जा रहा है, मुख्यमंत्री को खुद जगह-जगह जाकर पीडि़तों से मुलाकात करनी पड़ रही है और उन्हें राहत राशि के चेक देने पड़ रहे हैं। प्रदेश में कानून व्यवस्था का इतना बुरा हाल है कि विधानसभा में भी इस मुद्दे पर सरकार की सबसे ज्यादा घेराबंदी होती है। खुद सरकार ने माना कि एक साल के भीतर सत्ताइस जगहों पर सांप्रदायिक बलबे हुए।

स्वाभाविक है यह सरकार के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति थी। सबसे खराब बात यह है कि पुलिस महकमे के शीर्ष पद पर भी खींचतान जारी है। डीजीपी की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की छवि बेहद मायने रखती है। अगर डीजीपी कमजोर होता है तो प्रदेश पुलिस के अफसर खुद ब खुद कमजोर हो जाते हैं। अफसोस कि यूपी में ऐसा ही होता नजर आ रहा है। बीते पखवाड़े ही जब डीजीपी ने लखनऊ में मुथूट बैंक की डकैती का पर्दाफाश करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस बुलाई तो उससे तीन घंटे पहले ही लखनऊ के डीआईजी नवनीत सिकेरा ने प्रेस कांफ्रेंस करके पूरे मामले को पत्रकारों के सामने बता दिया। मजे की बात यह है कि डीजीपी के प्रेस कांफ्रेंस शुरू होते ही पत्रकारों ने जब उनसे कहा कि इस मामले में तो प्रेस कांफ्रेंस हो चुकी तो उनका मुंह देखने लायक था।

यहीं नहीं इससे पहले भी नवनीत सिकेरा मुख्यमंत्री के निवास पर ही उनकी भारी किरकिरी उस समय कर चुके हैं जब वूमेन पावर लाइन का उद्घाटन था और डीजीपी समेत सभी अफसर यूनीफार्म में थे मगर सिकेरा कोट पैंट में थे। और सिकेरा के बोलने से पहले डीजीपी ने अपना भाषण दिया और फिर खुद सिकेरा को बोलने के लिए आमंत्रित किया। यही नहीं जब उनसे पूछा गया कि मुख्यमंत्री के भाई के निर्वाचन क्षेत्र बदायूं में एक दिन में अलग-अलग घटनाओं में बारह अपहरण हो गये। इसमें क्या हुआ। तो डीजीपी ने अनभिज्ञता जताते हुए कहा कि उन्हें जानकारी नहीं है। पत्रकारों ने इस पर यह तक कह दिया कि अगर इतनी बड़ी घटना की डीजीपी को जानकारी नहीं तो वह इस कुर्सी लायक नहीं हैं। बाद में जब पत्रकारों ने बताया कि यह अपहरण जिला पंचायत सदस्यों के हुए हैं तो डीजीपी ने कहा कि अरे वह तो टेक्निकल एफआईआर है। उनका अपहरण नहीं हुआ उन्हें तो चुनाव के चलते उठा लिया गया।

पत्रकारों ने कहा कि उन्हें आज ही पता चला कि अपहरण और टेक्निकल अपहरण अलग-अलग होते हैं। उधर कुंडा में हुए हत्याकांड और उसके बाद अम्बेडकरनगर में हुए बवाल और वहां लगे कर्फ्यू ने सरकार की साख पर सवाल खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस बात से बेहद नाराज हैं। बीते दिनों उन्होंने डीजीपी को बदलने की वकालत की मगर मुख्यमंत्री की सचिव अनीता सिंह की बदौलत डीजीपी की कुर्सी बच गयी। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री ने अपने पिता और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह को साफ शब्दों में कह दिया है कि इन डीजीपी के रहते प्रदेश में कानून व्यवस्था नहीं संभलने वाली है। अगर आने वाले दिनों में प्रदेश की कानून व्यवस्था का यही हाल रहा तो डीजीपी की कुर्सी को बचाने की बात करना बेमानी हो जायेगी।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

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