वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव की किताब के लोकार्पण के मौके पर प्रेस क्लब में नियंत्रित/निर्बाध अभिव्यक्ति विषय पर आयोजित एक चर्चा में बोलने गया था। एक मौके पर मैंने कहा कि पत्रकार सरकारी मकानों/बंगलों में किस हक से रहते हैं? क्या सरकार हर पत्रकार को रहने को मकान देती है, और प्रदेश के हर शहर-कस्बे में? वरना, सिर्फ राजधानी में क्यों? जिन्हें नहीं देती, उन्हें वंचित रखने का कारण क्या है? जिन्हें देती है, क्या वे कभी उस सरकार को ललकार सकते हैं जिसने उन्हें अपना मानकर, या दूसरों से महत्त्वपूर्ण मानकर, सरकारी आसरा दिया?
एक पत्रकार मित्र ने कहा कि मेरे पास सरकार का दिया मकान है, पर मैं सरकार के बारे में जो चाहे लिख सकता हूँ। जयपुर में मैं निजी तौर पर एक-दो ऐसे पत्रकारों को जानता हूँ जो मुख्यमंत्री के खिलाफ लिखते हैं, सरकार से मिले आवास का लिहाज किए बगैर। मगर क्या सरकारी मेहमान बने सब पत्रकार इतने कर्त्तव्यनिष्ठ हो पाते होंगे? अनवरत? मुझे संदेह है।
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के एफबी वॉल से साभार.





