पिछले दिनों आकाशवाणी दिल्ली यानी ऑल इंडिया रेडियो के एफएम गोल्ड में एक महिला आरजे के साथ छेड़खानी किए जाने का मामला काफी चर्चा में था. महिला आरजे ने जब इस बात की शिकायत अपने अधिकारी से की तो अधिकारी इस मामले में कोई कार्रवाई करने की बजाय इसे आगे बढ़ने का राह बता डाला. जब यह खबर तमाम जगहों पर प्रकाशित हुई तो अधिकारी सक्रिय हुआ और अपने कर्मचारी से लिखवा लिया कि ऐसी कोई घटना नहीं हुई है.
इसके बाद कई महिला आरजे ने सेक्सुअल हरासमेंट की शिकायत दर्ज कराई. जिसके बाद तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई गई है. जिसमें संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में दो वरिष्ठ महिला अधिकारियों को शामिल किया गया है. हालांकि संभावना कम ही है कि असली चीजें बाहर आ पाएंगी. क्योंकि जांच कमेटी का गठन खुद उस अधिकारी द्वारा किया गया है, जो खुद इस मामले में रडार पर है. सूत्रों का कहना है कि इस अधिकारी ने अपने तमाम सहकर्मियों पर दबाव डालते हुए यह लिखवा लिया है कि एआईआर में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इसी मामले को लेकर डा. अरविंद पथिक ने भड़ास ब्लॉग पर एक समीक्षा लिखी है, जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है. – एडिटर
अधिकाशं मूर्ख और घमंडी अधिकारी खुद को खुदा से कम नहीं समझते
मित्रों पिछले कुछ दिनों से महिलायें और उसमें भी विशेष रुप से दिल्ली की महिलाओं ने शोषण उत्पीड़न का जो दौर देखा है उसके समापन की कोई संभावना दूर-दूर तक दिखायी नहीं पड रही। १६ दिसंबर की शर्मनाक घटना के बाद जिस तरह से नारी उत्पीड़न की घटनायें सामने आयीं उसमें नया प्रकरण आकाशवाणी दिल्ली का है। आकाशवाणी एफ एम चैनल के एक प्रस्तोता के साथ पिछले दिनों उसके एक सहकर्मी ने दुर्व्यवहार किया और जब उस महिला ने अपने 'बास' से एस घटना की शिकायत की तो उन्होंने कहा–"इसमें बुरा मानने जैसी क्या बात है? आगे बढ़ने के लिये तो ये सब करना ही पडता है। मेरी पत्नी तो कहती है कि 'हग' करने तक तो कुछ भी आपत्तिजनक नहीं होता।"
पीडिता ने इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों से भी कर दी है और एक उच्चस्तरीय कमेटी इस घटना की जांच के लिये गठित की जा चुकी है, पर ये श्रीमान जी इस सबसे बेपरवाह कल भी आफिस टाइम में 'इंडिया इंटरनेशनल' में एक कार्यक्रम में विराजमान थे। उनके आश्वस्त और बेपरवाह होने का कारण भी है क्योंकि उनके फेवरिट १२ साहित्यकारों का वरद हस्त जो उन पर है। भ्रष्टाचार, कदाचार और अनाचार का गढ बन चुके आकाशवाणी और दूरदर्शन भले ही जनता के गाढे़ पैसे से चलते हों पर इनमें बैठै इनके अधिकांश मूर्ख और घमंडी अधिकारी स्वयं को आज भी किसी खुदा से कम नहीं समझते हैं। कुर्सी पर बैठने के बाद कुर्सी का निजी हितों के लिये उपयोग करते हुये ना तो इन्हें पहले कभी शर्म आयी थी और कभी आयेगी इसकी संभावना हाल-फिलहाल तो दिखायी नहीं पड़ती।





