: प्रेस छायाकार राज बहादुर की पिटाई का मामला : सुलतानपुर। उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले की पुलिस कलमकारों की गुण्डई का शिकार हो गयी है। प्रेस छायाकार राजबहादुर की पिटाई मामले में एसपी द्वारा की कार्रवाई के बावजूद कुछ पत्रकारों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए आन्दोलन में हवा भर दी है। पत्रकार एकजुटता की बात करने वाले यही पत्रकार सच में पत्रकार उत्पीड़न के गम्भीर से गम्भीर मामलों में कार्रवाई की मांग करने के बावजूद उल्टे पत्रकारों को ही दोषी ठहराने से नहीं बाज आये हैं।
25 फरवरी को पुलिस अधीक्षक कार्यालय में नगर कोतवाली के घरहांखुर्द गांव में हुई एहसन हत्याकाण्ड मामले में ग्रामीण आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए ज्ञापन देने पहुंचे थे। पुलिस अधीक्षक से मुलाकात कर जब ग्रामीण लौट रहे थे तो वहीं आम आदमी पार्टी का मीडिया प्रभारी अखिलेश हजारे पहुंच गया था। जहां पर उसने अपत्तिजनक नारेबाजी करते हुये पुलिस अधीक्षक किरण एस व इसौली विधायक अबरार अहमद को बेहूदा गाली दे डाली, जिससे वर्दीधारी आवेश में आ गये, हटाने के लिए पुलिस के सिपाही जब आगे बढ़े तो अखिलेश हजारे व उनके साथी उनसे ही भिड़ गये। नतीजन पुलिस को धक्का देकर प्रदर्शनकारियों को बाहर धकेलना पड़ा। पुलिस अगर ऐसा न करती तो ऐसे ही प्रदर्शनकारी इसी तरह पुलिस अधीक्षक कार्यालय में घुसकर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते।
पुलिस के गुस्से का शिकार प्रेस छायाकार राजबहादुर भी हो गये। इसका एहसास होने पर एसपी ने एक दरोगा व एक सिपाही को लाइन हाजिर कर दिया। इतना ही नहीं पुलिस प्रशासन ने माफी तलाफी भी करनी चाही, लेकिन कुछ पत्रकारों ने मामले को तूल पकड़ा दिया। वजह यह थी कि उनके गलत कामों में सीओ व कोतवाल ने कोई सहयोग नहीं दिया था। लगातार प्रदर्शन के बावजूद भी शासन की ओर से कोई कार्रवाई न होने के बाद पत्रकार प्रतिनिधि मण्डल ने रविवार की बैठक में सत्ता पक्ष के विधायक सन्तोष पाण्डेय व सदर विधायक अनूप सण्डा को भी बुला लिया। बैठक में जयसिंहपुर विधायक अरूण वर्मा, कादीपुर विधायक रामचन्दर चौधरी व इसौली विधायक अबरार अहमद नहीं पहुंचे। शायद वजह यह थी कि घटना वाले दिन प्रदर्शनकारियों ने अबरार को भी बेइज्जत कर दिया था।
बहरहाल बैठक में पत्रकारों व विधायकों ने एसपी, सीओ व नगर कोतवाल को हटाने के लिए मुख्यमंत्री से मुलाकात करने की बात कही। लेकिन बैठक में यह बात छिपा ली गयी कि पूरे घटनाक्रम में प्रदर्शनकारी जिम्मेदार थे पुलिस अगर कदम न उठाती तो हर रोज वर्दीधारी बेइज्जत होते रहते, मामूली बात पर बवाल खड़ा करने वाले यही पत्रकार अपनों के साथ हुये जुल्मसितम पर चुप्पी साध लेते हैं। तीन महीने पहले लखनऊ से प्रकाशित एक हिन्दी दैनिक समाचार पत्रकार के ब्यूरोचीफ को शाहगंज चौकी प्रभारी अरविन्द तिवारी घसीटते हुये कोतवाली लाकर लाकअप में बन्द कर दिया था। यहां पर पत्रकारों ने यह कहते हुये सुलह समझौता कर लिया था कि शायद दरोगा की गलती नहीं है। यह आरोपी दरोगा कुछ कलमकारों को मुर्गा व शराब मुहैया कराता है। इतनी बडी गलती करने के बावजूद भी आरोपी दरोगा अब भी शाहगंज चौकी पर बरकरार है।
वर्ष 2009 में सेक्स रैकेट चलाने वालों की खबर छापने के बाद जिले के कुछ पत्रकारों ने राष्ट्रीय सहारा के क्राइम रिपोर्टर के खिलाफ षडयंत्र रच दिया था। गैंगेस्टर लगने तक साथी पत्रकार सहारा के पत्रकार के पीछे पड़े रहे तमाम ऐसी गम्भीर घटनाओं में अपनों के ही पीछे षडयंत्र रचने वाले पत्रकारों की जब दलाली नहीं चली तो वह प्रेस छायाकार राजबहादुर की पिटाई मामले को तूल दे रहे हैं। हालांकि एसपी किरण एस का कहना है कि जिन मातहतों ने अभद्रता की थी उनके विरूद्ध कार्रवाई की जा चुकी है बेवजह की मांग कलमकारों को शोभा नहीं देता है।





