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बंशीलाल ने सीएम कोटे से पत्रकारों को प्‍लाट बांटना बंद कर दिया था

जो चर्चा छेड़ी है, उसमें अपनी वाहवाही करने-कराने की जरा मंशा नहीं है। कृपया उठाए गए मुद्दे पर ही अपने विचार रखें तो अच्छा संवाद बना रहेगा। एक दिलचस्प प्रसंग इस सिलसिले में याद आया। चंडीगढ़ दस वर्ष (89-99) रहा। हरियाणा ने इस वक्फे में छह मुख्यमंत्री देखे। बंसीलाल चौथी बार मुख्यमंत्री बने। मेरी राय में वे और लालों से बेहतर मुख्यमंत्री थे।

जो चर्चा छेड़ी है, उसमें अपनी वाहवाही करने-कराने की जरा मंशा नहीं है। कृपया उठाए गए मुद्दे पर ही अपने विचार रखें तो अच्छा संवाद बना रहेगा। एक दिलचस्प प्रसंग इस सिलसिले में याद आया। चंडीगढ़ दस वर्ष (89-99) रहा। हरियाणा ने इस वक्फे में छह मुख्यमंत्री देखे। बंसीलाल चौथी बार मुख्यमंत्री बने। मेरी राय में वे और लालों से बेहतर मुख्यमंत्री थे।

1996 में शपथ लेकर वे मेरे घर आए। वजह मुख्तसर यह थी कि उन्हें लगा था चुनाव से पहले मैंने और हमारे प्रमुख संवाददाता बलवंत तक्षक ने पूरे हरियाणा का दौर कर जो अंतिम विश्लेषण लिखा, जो जनसत्ता के पहले पृष्ठ पर सबसे ऊपर छपा, उसने उनके पक्ष में लोग बढ़ा दिए! हालांकि हमने जो देखा वही लिखा था, कि सरकार बंसीलाल बनाने जा रहे है, मगर उन्हें बैसाखी (किसी पार्टी के सहयोग) की जरूरत पड़ेगी।

घर पहुंचकर बंसीलाल हंसते हुए (कभी हँसते भी थे!) बोले कि आपने अगर यह लिखा होता कि हरियाणा विकास पार्टी अपने बूते पर सरकार बना लेगी तो हमें बैसाखी की नौबत ही क्यों आती? मैंने कहा, हमारे लिखे से सरकार बनती-बिगड़ती है इसका मुगालता मुझे नहीं। फिर हमने आपको जितवाने के लिए तो लिखा नहीं था। बहरहाल, यह उनकी भलमनसाहत थी कि बोले – सरकार के लिए कोई सलाह दीजिए। मैंने दो बातें कहीं: पत्रकारों के साथ बदसलूकी उचित नहीं (जो वे 'विरोधी खेमे के' पत्रकार के साथ सरेआम करते थे); दूसरे, पत्रकारों को मुख्यमंत्री कोटे से प्लाट बांटना बंद कर दीजिए। उनकी बदसलूकी वाली आदत तो खैर क्या छूटती, मेरी दूसरी राय उन्होंने फौरन मान ली। कोटे के प्लाट बंद हो गए।

यकीन मानिए, वह लम्बी बंदरबांट होती थी। जनसत्ता अकेला अखबार था जो कोटे से प्लाट पाने वाले भाग्यशाली पत्रकारों की सूची भी प्रकाशित करता था, हालांकि लेने वालों पर इस मुहिम का शायद ही कोई असर पड़ा, जब तक कि बंसीलाल ने रोक न लगा दी। सुनता हूँ अब तक हरियाणा में वह रोक कायम है। चौटाला चौथी बार मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने भी कम से कम वह गोरखधंधा फिर से खोला नहीं जिस पर बंसीलाल ताला लगा गए थे। कुछ पत्रकारों का मानना रहा कि इससे मैंने अंततः पत्रकारों का ही नुकसान किया। … पता नहीं, कितनों का नुकसान किया कितनों का फायदा!

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

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