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सुधा अरोड़ा, मधु काँकरिया, रामजी यादव और रवीन्द्र कात्यायन का कहानी पाठ

हिंदी विभाग, मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, मुंबई एवं विजया बैंक के संयुक्त तत्वावधान में  दि. 13 फ़रवरी 2013 को एक कहानी पाठ का आयोजन किया गया। इस कहानी पाठ में चार रचनाकारों ने अपनी-अपनी कहानी का पाठ किया। सबसे पहले सुप्रसिद्ध कथाकार सुधा अरोड़ा ने अपनी कहानी ‘अन्नपूर्णा मण्डल की आख़िरी चिट्ठी’ का पाठ किया। उसके बाद रवीन्द्र कात्यायन ने विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीशस द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित कहानी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का पाठ किया। तत्पश्चात सुप्रसिद्ध कथाकार मधु काँकरिया ने अपनी कहानी ‘कीड़े‘ श्रोताओं को सुनाई। और अंत में श्री रामजी यादव ने अपनी कहानी ‘अंबेडकर होटल’ पढ़ी। चारों कहानियों ने श्रोताओं का मन मोह लिया।

हिंदी विभाग, मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, मुंबई एवं विजया बैंक के संयुक्त तत्वावधान में  दि. 13 फ़रवरी 2013 को एक कहानी पाठ का आयोजन किया गया। इस कहानी पाठ में चार रचनाकारों ने अपनी-अपनी कहानी का पाठ किया। सबसे पहले सुप्रसिद्ध कथाकार सुधा अरोड़ा ने अपनी कहानी ‘अन्नपूर्णा मण्डल की आख़िरी चिट्ठी’ का पाठ किया। उसके बाद रवीन्द्र कात्यायन ने विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीशस द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित कहानी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का पाठ किया। तत्पश्चात सुप्रसिद्ध कथाकार मधु काँकरिया ने अपनी कहानी ‘कीड़े‘ श्रोताओं को सुनाई। और अंत में श्री रामजी यादव ने अपनी कहानी ‘अंबेडकर होटल’ पढ़ी। चारों कहानियों ने श्रोताओं का मन मोह लिया।

कहानी पाठ  के बाद चर्चा सत्र में  सबसे पहले हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री निलय उपाध्याय ने अपने विचार रखे। उन्होंने चारों कहानियों पर बोलते हुए कहा कि इन चारों कहानियों को सुनकर मेरे समक्ष हिंदी कहानी का पूरा इतिहास उपस्थित हो गया है। उन्होंने कहा कि- ‘सुधा अरोड़ा की कहानी दो स्तरों पर चलती है- लिखा जा रहा है एक स्त्री का जीवन, लेकिन कहा जा रहा है केचुओं के माध्यम से। आज स्त्री का जीवन केचुए की भांति है- यह मुद्दा इतनी सफाई से, इतनी ख़ूबसूरती के साथ और दूसरी तरह नहीं कहा जा सकता- यह पूरी कहानी एक पूरी कविता है। केचुए के रूपक का जिस तरह सुधा जी ने इस्तेमाल किया है, वह बिलकुल अलग है- मैं निश्चित रूप से उन्हें बधाई देता हूँ।

दूसरी कहानी  रवीन्द्र कात्यायन की है जो विट के स्तर पर चलती है, व्यंग्य  के स्तर पर चलती है- कहानी अपने मूल स्वभाव में नहीं चलती। वह भाषा जो कही जा रही है वह कहीं न कहीं व्यंग्य की भाषा है। यह मनुष्यता के मूल्य को लेकर एक बड़ी कहानी है। यह उस ह्यूमर को पकड़ती है कि कैसे एक छोटा सा पत्थर एक ईश्वर बनकर सामने आता है और पूरे समाज में खलबली पैदा कर देता है। इस मायने में यह भी एक बड़ी कहानी है।

निलय उपाध्याय ने आगे कहा कि मधु काँकरिया की कहानी हमारे समाज की लुप्त होती जा रही वाचिक  परंपरा का विस्तार है।  कैसे मरते हुए एक आदमी को उसके बच्चे अस्पताल में  मरने छोड़ आते हैं लेकिन  दवा का असर उल्टा हो जाता है और वो जी उठता है। मधु  जी की कहानी जादुई यथार्थवाद  के करीब खड़ी होती है। वो मरता हुआ मनुष्य जी जाता है और तब वो समझ पाता है कि मैंने अपने बच्चों को सफलता की शिक्षा दी लेकिन उन्हें मनुष्यता की शिक्षा नहीं दी। रामजी यादव की कहानी ‘अंबेडकर होटल’ में एक व्यक्ति कैसे विकसित होता है और अंबेडकर के विचारों से जुड़ता चला जाता है और उसके बाद जब अपने होटल का नाम अबेडकर होटल रख देता है तो यह जातिवादी संकीर्ण व्यवस्था किस तरह से उसके होटल का तिरस्कार करती है कि वह उपेक्षित हो जाता है- इस कहानी में बखूबी दिखाया गया है। इस कहानी में जो छोटी-छोटी चीज़ें उन्होंने रखी हैं- कोका कोला, बाज़ार का प्रवेश आदि मुद्दे इसे एक बड़ी कहानी बनाते हैं।

मित्रों अब हमारे सामने चार कहानियाँ हैं जो एक पूरी की पूरी दुनिया है। एक कहानी में हमने एक औरत के जीवन को देखा कि किस पीड़ा से गुज़र रही है।  दूसरी कहानी में हमने समाज की राजनीति को देखा जो धर्म के नाम पर चल रही है।  तीसरी कहानी में एक परिवार है जो टूटन का शिकार है और चौथी कहानी में हमने जाति-पाति के मुद्दे को उभरत हुए देखा। इन चारों कहानियों में कुल मिला करके जो पूरा एक दृश्य बनता है जो पूरी चेतना बनती है, जो हमारे सामने पूरा समय खड़ा होता है, वो इस देश का है, वो हमारा समय है और ये चारों कहानियाँ ज़ोरदार ढंग से इसमें हस्तक्षेप करती हैं।

चिंतन दिशा के संपादक और साहित्यकार हृदयेश मयंक ने अपनी बात रखते हुए  कहा कि आज की समकालीन कहानी  बहुत आगे बढ़ी हुई कहानी  है। सुधा जी की कहानी बहुत व्यापक सरोकार लिए हुए  है और इस पर अलग से बहस भी होनी चाहिए। रवीन्द्र कात्यायन ने अपनी कहानी में सामाजिक व्यवस्था के षड़यंत्र को बुनने की कोशिश की है कि किस तरह से एक पत्थर को भगवान बना दिया जाता है। लोग पागल को मारते हैं और वाकई उस पत्थर को भगवान समझने लगते हैं और दूसरे नेताओं का षड़यंत्र शुरू होता है- यहाँ आकर कहानी बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है। मधु जी की कहानी में जो कथा कथन की शैली है वो बड़ी महत्वपूर्ण है और वाचिक परंपरा को आगे बढ़ाती है। पूंजीवादी व्यवस्था में एक मनुषय घर का पालक था। लेकिन ज्यों ही वह एक बुज़ुर्ग बन जाता है, घर में उसकी जगह कम होती जाती है। यह सामाजिक व्यवस्था की बात है जिसे मधुजी ने कहने की कोशिश की। यह कहानी एक बड़ा सवाल छोड़ती है।

कथाकार  धीरेन्द्र अस्थाना ने कहा  कि मधु जी की कहानी को सुनते  हुए ब्रजेश्वर मदान की याद आ गई। वे भी मधु  जी की तरह अपनी कहानी सुनाते थे, पढ़ते नहीं थे। कभी-कभी  कहानी लिखते समय कुछ  और हो जाती है और सुनाते समय  कुछ और। कुछ कहानियाँ अपने लिखे जाने के कारण, अपनी शैली के कारण, अपनी बुनावट के कारण महान बनती हैं। मधु जी से आग्रह है कि वे ये बताएँ कि उनकी कहानी लिखी भी इसी तरह जाती है जैसी कि उन्होंने सुनाई है या यह केवल कथासार है। एक अच्छी, हृदयस्पर्शी, संवेदनशील कहानी के लिए उन्हें बधाई। युवा कथाकार दुर्गेश सिंह ने अपने विचार रखते हुए सुनी गई कहानियों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि ये कहानियाँ बड़ी महत्वपूर्ण हैं और अपने समय से जुड़कर हमारे सामने उपस्थित होती हैं।    

प्रसिद्ध  संस्कृतिकर्मी और साहित्यकार रमेश राजहंस ने इस आयोजन के लिए रवीन्द्र कात्यायन और मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय  की प्राचार्या डॉ. हर्षदा राठोड़  को बधाई देते हुए कहा कि इस तरह के आयोजनों से विद्यार्थियों  के व्यक्तित्व का वांक्षित विकास होता है।  उन्होंने पढ़ी गई कहानियों पर चर्चा  करते हुए कहा कि सुधा जी कहानी एक स्त्री के जीवन के माध्यम से स्त्री-विमर्श का पाठ करती चलती है। स्त्री-विमर्श और पुरुष-विमर्श हमारे समाज में हमेशा से रहा है। इसे आज के संदर्भों में पहचानने की आवश्यकता है। मधु जी की कहानी में भारतीय और पश्चिमी, दोनों परंपराओं का निर्वाह किया गया है। भारतीय परंपरा यह है कि कथा कहने की शैली में फालतू विस्तार नहीं है। पूरी कहानी को आत्मालोचन से जोड़ा गया है कि नायक कह रहा है कि मैंने अपने बच्चों को सफलता पानी सिखा दी लेकिन उन्हें अच्छा इंसान नहीं बना पाया। यह कहानी आज सबसे अधिक प्रासंगिक है। रवीन्द्र कात्यायन की कहानी में सिनेमाई भाषा का प्रयोग किया गया है जिसमें सबसे बड़ी बात कही गई है कि मीडिया कैसे विलेन होता है। जो मीडिया हमारे समाज का सबसे महत्वपूर्ण कार्य करता था, वो आज सबसे बड़ा विलेन हो गया है। रामजी यादव की कहानी बहुत महत्वपूर्ण मुद्दों पर लिखी गई है जो अनावश्यक विस्तार से बच सकती थी।

अनुष्का के संपादक और कवि रासबिहारी  पाण्डेय ने कहा कि सुधाजी की कहानी आज के समय में  और भी प्रासंगिक हो चुकी है क्योंकि आज समाज के समीकरण और भी जटिल हो चुके हैं। इस कार्यक्रम में साहित्यकार शील निगम और विजया बैंक की राजभाषा अधिकारी श्रीमती रीता गोविंदन ने भी अपने विचार रखे। विजया बैंक के मुख्य सतर्कता अधिकारी श्री पर्सी ने कार्यक्रम की सफलता के लिए सबको धन्यवाद दिया। सभागार में नानावटी कॉलेज की करीब सत्तर छात्राओं ने श्रोताओं के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज़ की।     

रिपोर्टः  रवीन्द्र कात्यायन

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