इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर के इस तर्क से सहमत दिखती है कि राष्ट्रपति के सचिव द्वारा जारी की गयी सम्मान की वरीयता सारिणी एक प्राधिकारी के शासकीय, सामाजिक और लोक हैसियत को बताती है और इस रूप में इसका अपना महत्व और अहमियत है. भारत सरकार अब तक यह कहती आई है कि यह वरीयता सारिणी (टेबल ऑफ प्रेसीडेंस) मात्र राजकीय और अलंकरण समारोहों के लिए होती है और इसका रोजमर्रा के शासकीय क्रियाकलापों में कोई भूमिका नहीं होती.
इस सहमति के आधार पर जस्टिस उमा नाथ सिंह और जस्टिस वीके दीक्षित की बेंच ने किसी प्रत्यावेदन के अभाव में ठाकुर की रिट याचिका खारिज करते हुए आदेश दिया है कि वे रिट याचिका की प्रतिलिपि हाई कोर्ट के आदेश के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार को प्रत्यावेदन के रूप में भेजे जिस पर सरकार द्वारा आदेश पारित किये जाएँ, जिसे ठाकुर द्वारा राष्ट्रपति के सचिव को भेजा गया है.
यह रिट याचिका वर्तमान वरीयता सारिणी संख्या 33-प्रेस/79 दिनांक 26th जुलाई 1979 के संविधान के प्रावधानों और मूल भावना के विपरीत होने के कारण की गयी थी. याचिका में कहा गया था कि उपराष्ट्रपति मूलतः राज्यसभा के सभापति है और इस रूप में उन्हें अन्य शासन की अन्य तीन स्तंभों के मुखिया के रूप रखा जाना सही नहीं दिखता. इसके विपरीत प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा सभापति और भारत के मुख्य न्यायाधीश को समकक्ष रखा जाना चाहिए. इसी प्रकार से तमाम ऐसे पद जैसे भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, योजना आयोग के अध्यक्ष और सदस्य, उपप्रधानमंत्री जिनका भारतीय संविधान में उल्लेख तक नहीं है, को भी विभिन्न संवैधानिक पदों से ऊपर दर्जा दिया गया है.





