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राम सिंह की खुदकुशी : क्‍या होश में आएगी पुलिस?

सोमवार सुबह तिहाड़ जेल में बंद 16 दिसंबर गैंग रेप के मुख्य आरोपी राम सिंह ने खुदकशी कर ली। इससे एक बार फिर हमारी पुलिस की अपनी जिम्मेदारी के प्रति उदासीनता जाहिर होती है। ये पहला मामला नहीं है जिसमें किसी कैदी ने जेल में खुदकशी की हो बल्कि इससे पहले भी जेल में कैदी खुदकशी करते रहे हैं। भारतीय जेलों में औसतन 40 कैदी हर साल आत्महत्या करते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक आत्महत्या करने वाले ज्यादातर कैदी 25 से 35 की उम्र के होते हैं, उनका या तो परिवार नहीं होता या परिवार ने उन्हें बेदखल कर दिया होता है। 

सोमवार सुबह तिहाड़ जेल में बंद 16 दिसंबर गैंग रेप के मुख्य आरोपी राम सिंह ने खुदकशी कर ली। इससे एक बार फिर हमारी पुलिस की अपनी जिम्मेदारी के प्रति उदासीनता जाहिर होती है। ये पहला मामला नहीं है जिसमें किसी कैदी ने जेल में खुदकशी की हो बल्कि इससे पहले भी जेल में कैदी खुदकशी करते रहे हैं। भारतीय जेलों में औसतन 40 कैदी हर साल आत्महत्या करते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक आत्महत्या करने वाले ज्यादातर कैदी 25 से 35 की उम्र के होते हैं, उनका या तो परिवार नहीं होता या परिवार ने उन्हें बेदखल कर दिया होता है। 

राम सिंह का मामला भी ऐसा ही था। उसे भी अपने जेल से बाहर निकलने की कोई उम्मीद नहीं थी और जेल से बाहर समाज में उसकी छवि बिल्कुल निचले स्तर की हो गई थी। हो सकता है इसीलिये उसने खुदकशी का रास्ता अपनाया हो। खैर रामसिंह की मौत से ज्यादातर लोग खुश हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि जिस काम लिये रोज धरने और प्रदर्शन किये गये थे, उसकी पहली सीढ़ी का सफर तो खत्म हो गया है।

लेकिन असल सवाल मुद्दा ये नहीं कि उसने खुदकशी कर ली तो हमारी भावनाऐं शांत हो गई है। सवाल ये भी नहीं है कि उसके आत्म हत्या करने से अब बलात्कार की घटनाओं पर विराम लग जायेगा। सवाल ये है कि जेल में आत्महत्या हो क्यों जाती है? जबकि वहां पर भारी संख्या में पुलिस मौजूद रहती है। अधिकतर हाई प्रोफाईल केस में एसा ही क्यों होता है कि आरोपी जेल में खुदकशी कर लेता है। क्या वह वास्तव में खुदकशी करता है या उसके ऊपर जेल प्रशासन की ओर से या किसी दूसरी ओर से दबाव बनाया जाता है? जबकि जेल में तो सुरक्षा के कड़े इंतजाम होते हैं, उसके बावजूद भी कोई कैदी और वह भी किसी चर्चित मामले का अभियुक्त खुदकशी कर लेता है कैसे? और पुलिस की नाक के नीचे ये सब कुछ हो जाता है औऱ उसे भनक तक नहीं लगती, बड़ा ही अटपटा सा लगता है।

अगर ये सही है कि पुलिस को वास्तव में ही इसकी भनक तक नहीं लगी तो फिर ये पुलिस समाज की रक्षा कैसे करेगी। जेल में, जहां अगर दूसरे चश्मे से देखा जाये तो वह सबसे सुरक्षित जगह है, वहां अपराधी पुलिस की निगरानी में रहते हैं। जहां पुलिस की मर्जी के बगैर परिंदा भी पर नहीं मार सकता, इस सबके बावजूद वहां पर खुदकशी हो जाती है, जिससे साफ हो जाता है कि हमारी पुलिस अपने फर्ज के प्रति कितनी ईमानदार है? ये केवल दिल्ली पुलिस का ही हाल नहीं है बल्कि पूरे भारत की पुलिस लगभग इसी तर्ज पर काम कर रही है। अपने फर्ज में इस हद तक लापरवाही बरतने वाली पुलिस से क्या हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि ये समाज की सुरक्षा करेगी? बल्कि देखा जाये तो कभी कभी तो एसा लगता है कि जैसे खुद पुलिस को ही सुरक्षा की जरूरत है। अभी पिछले दिनों हैदराबाद में बम विस्फोट के बाद सारे देश में अलर्ट जारी किया गया था, उसके बाद भी कई स्थानों पर पुलिस चौकियों में कुत्ते सोते हुऐ पाये जाते हैं, जिनसे अंदाजा हो जाता है कि पुलिसकर्मी यहां से नदारद हैं।

लेखक वसीम अकरम पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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