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क्‍या गलत है सुल्‍तानपुर के पत्रकारों का आंदोलन?

यशवंत जी नमस्कार। आपके पोर्टल पर "सुल्‍तानपुर में अपना-अपना हित साधने के लिए पत्रकार चला रहे हैं आंदोलन" शीर्षक से खबर पढ़ी। पढ़कर बड़ी तकलीफ व निराशा हुई। यशवंत जी सच तो यह है कि यह लड़ाई अपने निजी स्वार्थों और हितों के लिए नहीं लड़ी जा रही है बल्कि पत्रकारिता जैसे मिशन को मिटाने में लगे पुलिस वालों के खिलाफ लड़ी जा रही है। खबर छपवाने वाले ने शायद आपको पूरे तथ्यों से अवगत नहीं कराया वरना हो सकता है आप उस खबर को अपने इस पोर्टल पर स्थान ना देते। 

यशवंत जी नमस्कार। आपके पोर्टल पर "सुल्‍तानपुर में अपना-अपना हित साधने के लिए पत्रकार चला रहे हैं आंदोलन" शीर्षक से खबर पढ़ी। पढ़कर बड़ी तकलीफ व निराशा हुई। यशवंत जी सच तो यह है कि यह लड़ाई अपने निजी स्वार्थों और हितों के लिए नहीं लड़ी जा रही है बल्कि पत्रकारिता जैसे मिशन को मिटाने में लगे पुलिस वालों के खिलाफ लड़ी जा रही है। खबर छपवाने वाले ने शायद आपको पूरे तथ्यों से अवगत नहीं कराया वरना हो सकता है आप उस खबर को अपने इस पोर्टल पर स्थान ना देते। 

एक बात और यशवंत जी आपकी खुद की जो लड़ाई सिस्टम से चल रही है, कम से कम हम उसे निजी स्वार्थों की नहीं मान रहे हैं। अगर आपकी लड़ाई निजी स्वार्थों की है तो इस लड़ाई को भी आप उसी श्रेणी में मान सकते हैं। आइये हम आपको इस लड़ाई के पूरे तथ्यों से अवगत कराते हैं..

मामला कुछ यू हैं। नगर के डिहवा इलाके में सरेशाम हुई एक हत्या के आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर बीते 25 फ़रवरी को नगर के कुछ लोग पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचते हैं। हत्या के कई दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस द्वारा कोई सार्थक कार्रवाई न किये जाने से ये लोग नाराज थे, लिहाजा इन लोगों ने वहां नारेबाजी शुरू कर दी। ज्ञापन देने पहुंचे गुस्साए लोगों ने वहा मौजूद इसौली विधायक अबरार को देखा तो उनसे अपनी बात कही और जब उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया तो और तेज नारेबाजी करने लगे। फिर क्या था पुलिस ने न्याय मांगने आये इन लोगों पर पुलिसिया रंग दिखाया और इन लोगों की पिटाई शुरू कर दी। पुलिस जब इन लोगों को पीट रही थी, उसी समय वहां पर मौजूद मीडियाकर्मियों ने कवरेज शुरू कर दिया। पुलिस को लगा कि उनका ये बर्बर रूप कहीं मीडिया की सुर्खियां न बन जाये लिहाजा पुलिस ने हिन्दुस्तान के छायाकार राज बहादुर यादव को पकड़ लिया और उसे भी पीटने लगे। इतना ही नहीं फोटो डिलीट करने के लिए कैमरा भी छीनने का प्रयास किया।   

जब इस घटना की खबर जिले के तमाम मीडियाकर्मियों को लगी तो वहां जमावड़ा लग गया। पत्रकार राज बहादुर यादव के साथ हुई इस बर्बरता की शिकायत करने पत्रकारों का समूह जब पुलिस अधीक्षक के पास पहुंचा तो एक बार फिर मीडियाकर्मियों को पुलिस अधीक्षक के दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ा। ऐसे में अगर जिले के पत्रकार दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग कर रहे हैं तो भला इसमें कौन सा अपना हित साधना हुआ। यशवंत जी एक बात और कहनी है जिसे आपको सुनकर आश्चर्य होगा। इस आन्दोलन में जिले का कोई नामवर अखबार और नामवर चैनल ऐसा नहीं है, जो बढ़ चढ़ कर हिस्सा न ले रहा हो। यहाँ तक की पत्रकारों की लड़ाई लड़ने वाले जिले के सभी संगठन भी एक राय होकर इस आन्दोलन में शामिल हैं।

सुल्तानपुर से निकलने वाला अखबार हो या बनारस से, जौनपुर से निकलने वाला हो या इलाहाबाद से, राजधानी लखनऊ की बात तो छोडिये, वहां से निकलने वाले सारे अखबारों के पत्रकार तो इस आन्दोलन में हैं ही। दिल्ली से छपने वाले अखबारों के भी जिला संवाददाता इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। एक बात और अगर ये किसी एक व्यक्ति की लड़ाई होती या किसी एकाध पत्रकारों का हित सधता होता तो शायद सारे पत्रकार एक प्लेटफ़ार्म पर नजर ना आते, जो कि इस वक्त हैं। कम से कम मेरा तो यही मानना है कि अगर यह निजी स्वार्थो की लड़ाई होती तो शायद विधानसभा और विधान परिषद् में इसकी गूँज न उठती। ऐसा नहीं है कि इस मामले की खबर पुलिस के उच्चाधिकरियो को नहीं है। छायाकार राजबहादुर यादव के साथ हुए पुलिसिया दुर्व्यवहार की खबर के बाद डीजीपी साहब को सूबे के सभी जिलो में पत्रकारों के साथ शालीन व्यवहार का सर्कुलर तक जारी करना पड़ा। 

ये मान ले कि ज्ञापन देने पहुंचे लोगों ने वहा नारेबाजी करके गलत किया, लेकिन क्या पुलिसिया दुर्व्यवहार और पिटाई की कवरेज करना गलत है। अगर ये गलत है तो फिर आम समाज में सच्चाई कैसे उजागर होगी। अब आप बताइए कि सुल्तानपुर के पत्रकार गलत हैं या सही? क्या उन्हें इस आन्दोलन को छोड़ देना चाहिए या फिर इतना सब सहते हुए भी पुलिसिया हां-हुजूरी करनी चाहिए। दोनों सवालों में आप के जवाब और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। आपका जवाब जो भी हम उसमे आपका पूरा साथ भी चाहेंगे।

राजुल निगम

रिपोर्टर न्‍यूज24
सुल्‍तानपुर
मोबाइल – 9415156182

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