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सुख-दुख...

एक खुला पत्र दरभंगा के महासचिव भइया और कोषाध्यक्ष साथी के नाम

आदरणीय महासचिव भइया. प्रणाम. सबसे पहले आपको मैं बधाई दे दूं कि आपकी टीम सभी मुक़ाबलों में विजेता रही. आगे भी आपके लिये मेरी बहुत शुभ कामनायें. आप ये मत समझियेगा कि छोटा भाई इस पत्र के माध्यम से आप पर कोई व्यंग्य कर रहा है या आपको नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है. मेरा कभी ऐसा कोई इरादा न तो रहा है और न ही होगा. महासचिव भइया, इन दिनों जो भी घटनायें-दुर्घटनायें घट रही हैं, उसकी सारी जिम्मेवारी-जवाबदेही आप मुझ छोटे भाई पर डालकर मुझे गाली दे रहे हैं. ये ग़लत है भइया.

आदरणीय महासचिव भइया. प्रणाम. सबसे पहले आपको मैं बधाई दे दूं कि आपकी टीम सभी मुक़ाबलों में विजेता रही. आगे भी आपके लिये मेरी बहुत शुभ कामनायें. आप ये मत समझियेगा कि छोटा भाई इस पत्र के माध्यम से आप पर कोई व्यंग्य कर रहा है या आपको नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है. मेरा कभी ऐसा कोई इरादा न तो रहा है और न ही होगा. महासचिव भइया, इन दिनों जो भी घटनायें-दुर्घटनायें घट रही हैं, उसकी सारी जिम्मेवारी-जवाबदेही आप मुझ छोटे भाई पर डालकर मुझे गाली दे रहे हैं. ये ग़लत है भइया.

किसी प्रतियोगिता से मेरी मां-बहन का कभी कोई लेना-देना नहीं रहा, तो उनको गाली क्यों दे रहे हैं. छोटे भाई की मां-बहन क्या बड़े भाई की मां-बहन नहीं हुईं. और भइया मैं तो ये मानता हूं कि मेरी मां-बहन दरभंगा के सभी भाइयों, पत्रकारों की मां-बहन हैं. उसी तरह सभी भाइयों की मां-बहन मेरी मां-बहन हैं. इसलिये भइया इस गाली का मतलब तो बहुत बड़ा हुआ न. तो आगे से आप ध्यान रखेंगे, ऐसी मुझे उम्मीद है. नहीं भी ध्यान रखेंगे तो कुछ फर्क़ नहीं पड़ेगा.

महासचिव भइया, आप भले ही ऊपर से मुझे कोसें, लेकिन आपकी आत्मा जानती है कि पिछले छह साल से जिस व्यक्ति ने आपका इस आयोजन के मामले में सबसे ज्यादा मज़बूती से साथ दिया है वो मैं ही हूं. आपको पिछले साल की मेरी भयंकर बीमारी और गलते जा रहे शरीर की भी याद होगी, जिसके बावजूद ये छोटा भाई आपके साथ चंदा मांगने जाता था. आप ही तो कहते थे कि मेरा आपके साथ रहना बहुत शुभ होता है. साल दर साल शुभ रहने वाले व्यक्ति के लिये आप इतनी जल्दी गाली-गलौज पर उतर आये. महासचिव भइया, मैं मज़ाक में हमेशा एक शब्द का इस्तेमाल करता था कि हम सब लोग उगाही-वसूली करने जा रहे हैं. मेरी आत्मा जानती है कि मैं ये शब्द मज़ाक में इस्तेमाल करता रहा हूं और हमारे ग्रुप का कोई भी व्यक्ति इससे कभी ख़फा नहीं होता था. मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी भी उगाही-वसूली नहीं की है भइया. लेकिन अचानक एक मित्र ने जब इस शब्द के लिये मुझे चेतावनी ज़ारी करते हुए गुस्से का इज़हार किया तो मैं स्तब्ध रह गया. मैंने तत्काल अपने शब्द के लिये सबसे माफी भी मांग ली. आज आप लोगों ने उसको भी मुद्दा बना रखा है. क्या माफी के बाद भी कोई मुद्दा बचता है. खैर, जैसी आप लोगों की मर्ज़ी.

महासचिव भइया, एक ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल पर किसी ने ये लिख दिया है कि फंड का बंदरबांट होता है, मैं इस लिखे हुए से सहमत नहीं हूं. मैं उसकी आलोचना करता हूं. और मैं आपको स्पष्ट कर दूं कि मेरा इस लिखे हुए से कोई संबंध नहीं है. इसका मैं खंडन करता हूं. मैंने इस्तीफा इस वजह से नहीं दिया. महासचिव भइया, मैंने व्यक्तिगत कारणों से इस्तीफा दिया है. दूसरी बात जो मैं लिखने जा रहा हूं, उस पर ध्यान दीजिये. प्रतियोगिता पत्रकारों के लिये है, इसमें ज़बर्दस्ती ग़ैर पत्रकारों और प्रोफेशनल खिलाड़ियों को खेलाकर आप किस तरह का मैसेज समाज को देना चाहते हैं. जिस कप्तान और उसके कुछ खिलाड़ियों को पिछले साल दोषी पाया गया था, आप उन्हीं सब को इस साल भी क्यों खेला रहे हैं. क्या पत्रकारों का उस ज़िले में अकाल पड़ गया है. मैं आपकी मज़बूरी भी समझता हूं. वेरीफिकेशन का समय कमेटी के पास नहीं था. सबकुछ जल्दी-जल्दी में हुआ. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि जल्दीबाज़ी में कुछ दोषी लोगों को फिर मौका दे दिया जाये. अब इस बात का जो कोई भी विरोध करता है, आप उसको अपना विरोधी और दुश्मन नं. वन मान लेते हैं. ये ईगो सही है क्या, ज़रा सोचिये. मैं सरेआम स्वीकार करता हूं कि आप जितनी मेहनत करते हैं उतनी मेहनत करके कोई ये आयोजन नहीं करवा सकता. तो भइया, अपनी इतनी मेहनत को कुछ ग़लत निर्णयों की वजह से सवालों के घेरे में आप खुद क्यों डाल देते हैं.

महासचिव भइया, आप माने या ना माने, इस आयोजन से अच्छे पत्रकार दूर भाग रहे हैं. मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं जिन लोगों ने ईगो की वजह से साथ छोड़ा था. उनको दूर भागने दीजिये. लेकिन आपने अच्छे लोगों को भी खोया है भइया. मैं भी उनमें से एक हूं जो आपके व्यवहार की वजह से आपसे दूर चला गया हूं. इसी शहर में रहते हुए आपके नज़दीक अब नहीं रहा मैं. मैं बहुत व्यथित हूं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं आपको गाली दूं. मैंने कभी ऐसा नहीं किया. ये मेरे परिवार के संस्कार में नहीं रहा है. मुझे मेरे स्व. पिता ने सिखाया है कि बड़ा भाई पिता तुल्य होता है. और मैं आपको हमेशा से बड़ा भाई मानता आया हूं. अब आप ही बताइये कि आपका-मेरा रिश्ता कैसा है. मैं इमोशनल आदमी हूं. प्यार का भूखा हूं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप मुझे गाली दें और मैं आपके साथ बना रहूं. मैं अब आपके साथ नहीं हूं भइया. मैं चुपचाप बिना किसी शोर-शराबे के आपसे दूर निकल चुका हूं…बहुत दूर. मैंने अध्यक्ष जी को अपना इस्तीफा सौंपते हुए कहा था कि इसको मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिये. लेकिन आप लोगों ने मुद्दा बना रखा है. आप जितना चाहे बड़ा मुद्दा बना लें, लेकिन मैं अपने सिद्धांतों के साथ समझौता करने वाला नहीं हूं.

महासचिव भइया, आपने मेरे चैनल का नाम लेकर कहा था कि उसके रिपोर्टर को हिंदी लिखने नहीं आता. आपकी जानकारी बिल्कुल ग़लत है भइया. मैं जय प्रकाश विश्वविद्यालय छपरा में हिंदी प्रतिष्ठा में वर्ष 2001 का टॉपर रहा हूं. आप चाहें तो इसकी जानकारी छपरा जाकर ले सकते हैं. महासचिव भइया, मैं अपने अध्ययन काल में हर परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण रहा हूं. दरभंगा के मेरे मित्रों, पटना के मेरे मित्रों और प्रभात खबर, पटना के साथियों से आप मेरी हिंदी के बारे में पूछ सकते हैं. महासचिव भइया, प्रभात खबर की मेरी रिपोर्ट को श्रीश्री रविशंकर जैसे व्यक्ति ने अतिथि संपादक रहते हुए सर्वश्रेष्ठ रिपोर्ट लिखा था. ये सब मेरे पास आज भी सुरक्षित है. फिर भी आपको यकीन नहीं होता तो हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या. आप इसी पत्र की भाषा को पढ़कर देख लें कि मेरी हिंदी कैसी है. मैं किसी की आलोचना नहीं करता हूं भइया. मैं भाव को देखता हूं, भाषा को नहीं. और अगर कुछ गलती हो ही जाये, तो आपके जैसा बड़ा भाई तो है न जो मेरी हिंदी सुधार सके. मुझे अपनी हिंदी की चिंता आपके रहते हुए कभी नहीं रही. अब मैं कोषाध्यक्ष साथी को संबोधित करूंगा.

प्रिय कोषाध्यक्ष साथी, मैं जब दरभंगा में आया था तो मेरे पूर्ववर्ती ने सबसे पहले आपसे ही मेरा परिचय करवाया था. उन्होंने आपके बारे में कहा था कि ये अच्छे आदमी हैं. मैं आज भी अपने पूर्ववर्ती की बातों से सहमत हूं. बाद में कई कारणों से आपसे मेरा मतभेद हो गया. लेकिन, यकीन कीजिये कभी मनभेद नहीं रहा आपसे. आप तो गंभीर और संवेदनशील इनसान हैं. आपको ये शोभा नहीं देता कि आप सुनी-सुनाई बातों को लेकर मुझे गाली दें. आखिर मैंने क्या गुनाह किया है. मैंने तो आपको विधि सम्मत तरीके से ये सूचित किया कि पिछले साल के दोषी खिलाड़ी फिर खेल रहे हैं. इसमें मेरी क्या ग़लती है भाई. आयोजन के बिगड़ने के डर से ग़लत का को बढ़ावा देना कहां की मजबूरी है. खैर, जाने दीजिये, आपके शहर में सच कहने की हिम्मत करने वालों को गाली सुनाया जाता है तो मैं ऐसी हज़ार गालियां सुनने के लिये तैयार हूं. लेकिन सच कहना नहीं छोड़ूंगा. साथी, आप ज़रा अकेले में अपनी आत्मा से पूछ कर देखियेगा कि आप का कृत्य कितना सही है.

अंत में मैं महासचिव भइया, कोषाध्यक्ष साथी, अध्यक्ष जी समेत उन तमाम लोगों से माफ़ी मांगता हूं जिनकी भावनायें मेरी वजह से आहत हुई हैं. घबराइये नहीं, मैं आप सब से माफी मांगने को नहीं कहूंगा, हालांकि मेरी भावनायें बहुत आहत हुई हैं. मैं माफी मांगने से छोटा नहीं हो जाउंगा. माफ़ी मांगने के बावजूद मेरे सवाल जस के तस हैं. इनका उत्तर सार्वजनिक रूप से मत दीजिये, बस अपनी अंतरात्मा को दे दीजियेगा, यही आप सबसे मेरी विनती है. अब मैं आप सबके साथ नहीं हूं. इसका मुझे बहुत दुख है, लेकिन मैं शर्मिंदा नहीं हूं.

रोशन कुमार झा

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