जाने-माने पत्रकार आलोक तोमर इसी मार्च महीने में दो साल पहले बीस तारीख को हम सभी को अलविदा कह गए. बेबाक, साहसी और लीक से हटकर चलने वाले आलोक तोमर के जाने की कमी हर किसी को अभी तक महसूस हो रही है क्योंकि इस बीच बहुत कुछ ऐसा प्रकरण, मुद्दा, घटनाक्रम हुआ जिसमें आलोक तोमर की बेबाक लेखनी की कमी सबको महसूस हुई.
पत्रकारिता के पीआर में तब्दील हो जाने के इस दौर में आलोक तोमर की कमी हर ईमानदार पत्रकार और स्वाभिमानी नागरिक महसूस करता है. जनसत्ता अखबार के जरिए पूरे देश में प्रतिष्ठित व चर्चित होने वाले आलोक तोमर ने बाद में न्यू मीडिया यानि वेब-ब्लाग को अपना माध्यम बनाया और मीडिया से लेकर राजनीति तक की अनसुलझी-अबूझ पहेलियों को बेहद आसानी से सुलझाया और पूरा खेल पाठकों तक रख दिया.
जिस सरल, सहज, संवेदनशील, स्वाभिमानी और दबंग भाषा का अविष्कार आलोक तोमर ने किया, उसे पूरे देश के पत्रकारों ने आदर्श माना. यही कारण है कि उनके तेवर और उनकी भाषा के साथ आज कई पत्रकार देश के अलग अलग कोनों में सक्रिय हैं. उन्हीं आलोक तोमर की दूसरी पुण्यतिथि के मौके पर आप सभी निमंत्रित हैं, आमंत्रित हैं, बीस मार्च के दिन, गांधी शांति प्रतिष्ठान में. समय है शाम पांच बजे.
आलोक तोमर की पत्नी सुप्रिया रॉय, जो खुद पत्रकार हैं, ने आलोक तोमर के सभी चाहने वालों से अनुरोध किया है कि वे बीस मार्च के दिन शाम को पांच बजे आलोक को याद करने के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंचें. यहां उपर प्रकाशित निमंत्रण को ही न्योता मानें और इसे स्वीकारें. 'यादों में आलोक' सीरिज के तहत 'मीडिया की भाषा' पर विमर्श-व्याख्यान होगा, जिसमें देश के कई जाने-माने पत्रकार-साहित्यकार हिस्सा लेंगे.






