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मरने वालों की सूची जारी करने पर चिदंबरम ने मुझे भी धमकाया था

जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी चाहते थे कि 22 मई 1987 को मेरठ के हाशिमपुरा नरसंहार में उस समय के आंतरिक सुरक्षा राज्यमंत्री पी चिदंबरम की भूमिका की जांच होनी चाहिए। उनकी दलील थी कि पीएसी बल ने उन्हीं के इशारे पर हाशिमपुरा नरसंहार अंजाम दिया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी की याचिका ठुकरा दी है। लेकिन इसमें शक नहीं कि मेरठ के 1987 के दंगों में ऐसा कुछ था, जिससे संदेह होता है कि उसमें उत्तर प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक कि भूमिका थी। हाशिमपुरा नरसंहार के बाद 23 मई 1987 को मलियाना में पीएसी ने मुसलमानों का कत्लेआम किया था।

जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी चाहते थे कि 22 मई 1987 को मेरठ के हाशिमपुरा नरसंहार में उस समय के आंतरिक सुरक्षा राज्यमंत्री पी चिदंबरम की भूमिका की जांच होनी चाहिए। उनकी दलील थी कि पीएसी बल ने उन्हीं के इशारे पर हाशिमपुरा नरसंहार अंजाम दिया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी की याचिका ठुकरा दी है। लेकिन इसमें शक नहीं कि मेरठ के 1987 के दंगों में ऐसा कुछ था, जिससे संदेह होता है कि उसमें उत्तर प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक कि भूमिका थी। हाशिमपुरा नरसंहार के बाद 23 मई 1987 को मलियाना में पीएसी ने मुसलमानों का कत्लेआम किया था।

मलियाना निवासी होने की वजह से मैं उसका चश्मदीद हूं। उस समय मैं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के संपर्क में था और मलियाना की अधिकांश खबरें मेरे द्वारा ही पहुंच रही थीं। हमने मीडिया को एक सूची जारी की थी, जिसमें मरने वालों और लापता लोगों के नाम थे, जिनकी संख्या 100 के आसपास थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जबरदस्त आलोचना के बाद पी चिदंबरम मलियाना आए थे और मुझसे मिले थे। उनके हाथ में वह सूची थी, जो हमने जारी की थी। वह इस बात से खफा थे कि इस तरह की सूची क्यों जारी की गई है। उन्होंने ढके-छुपे शब्दों में धमकी भी दी थी कि आगे से ऐसा कुछ न किया जाए, वरना अच्छा नहीं होगा।

दरअसल, सरकार कतई नहीं चाहती थी कि मलियाना की वास्तविक स्थिति दुनिया को पता चले। उससे अगले दिन थाना टीपी नगर के एसओ वीके सिंह ने मुझे एक राहत कैंप में धमकी दी थी कि यदि आपने अपनी गतिविधियां बंद नहीं की तो अच्छा नहीं होगा। उन्होंने रासुका लगाने तक की धमकी दे डाली थी। यह अलग बात है कि जिला प्रशासन में सहमति बनी थी कि यदि दंगा पीड़ितों की मदद करने वालों पर ही कार्रवाई की गई, तो और ज्यादा बदनामी होगी।

प्रशासन चाहता था कि मरने वालों की तादाद कम से कम बताई जाए। यही वजह थी कि जिला प्रशासन, उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय मरने वालों की तादाद अलग-अलग बताता रहा। हालांकि बाद में हमारी दी गई सूची में से कुछ लोग वापस लौट आए थे और मरने वालों का आंकड़ा 73 पर आकर रुका था। सरकार ने भी मरने वालों के परिजनों को 40-40 हजार रुपये का मुआवजा दिया था। शर्त यह थी कि जो लोग लापता हैं, यदि उनमें से कोई लौट आता है तो मुआवजा राशि वापस ले ली जाएगी। लेकिन आज तक कोई वापस लौटकर नहीं आया है।

लेखक सलीम अख्‍तर सिद्दीकी पत्रकार हैं तथा इन दिनों मेरठ से प्रकाशित जनवाणी से जुड़े हुए हैं.

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