समापन के साथ ही धरती के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन की लोकग्राही उपयोगिता को लेकर कुछ विचारणीय बिंदु भी खडे हो रहे हैं। यह किन बातों के लिए जाना जाएगा? क्या हमारे धर्मगुरु कोई ऐसा समवेत संदेश दे पाये हैं, जिससे देश-समाज की स्थिति में सुधार हो? आखिर, 12 कुंभों पर 144 साल बाद आये इस महाकुंभ से हासिल क्या हुआ?
बीस वर्ग किमी क्षेत्र में कुंभ नगरी बनाने-बसाने की लम्बी कवायद के बाद और 11-12 सौ करोड़ रुपये खर्च होने का फलितार्थ क्या रहा? संगमतीरे परलोक सुधारने की कामना के केवल ‘आस्था की डुबकी’ अगर यही पुण्य लाभ ही इसका प्रापक है तो यह धार्मिक मेला कैसे? धर्म के तो सभी रास्ते लोक से ही होकर जाते हैं। वह तो संसार संवारने की भित्ति पर ही खड़ा होता है।
वैसे तो हर माघ में साधु-संतों और सनातन धर्मावलम्बियों के प्रयाग पहुंचने की पुरानी परंपरा है- माघ मकरगत रवि जब होई, तीरथपतिह आव सब कोई। इस अवसर का उपयोग ज्ञान-विज्ञान पर चर्चा, सामाजिक समस्याओं-मुद्दों पर विचार-विनिमय, आत्मशुद्धि तथा सदभाव, संयम व सह अस्तित्व जैसे भारत के शास्वत मूल्यों के संर्वधन में होता था। यानी लोक-परलोक दोनों को सुधारने का समागम। इसी लिए जन भागेदारी बढ़ाने को इसे धार्मिक महत्ता से जोड़ा गया होगा। कुंभ, अर्धकुंभ और महाकुंभ में यह महत्ता उत्तरोत्तर विशेषरूप से बढ़ जाती है। ऐसे अनूठे आयोजन भाषा, संस्कृति और शासक सत्ता वगैरह की विभिन्नताओं वाले देश को एक सूत्र में बांधे रखने में प्रमुख भूमिका निभाते थे और विश्वगुरु के रूप में भारत का डंका बजता था।
लेकिन 2013 का महाकुंभ आया और यूं ही चला गया। वैसे बहुत कुछ हुआ। दो ढाई महीने के दौरान देश – दुनिया से कई करोड़ लोग जुटे। विशाल प्रवचन पांडाल बने। धर्म-अध्यात्म की बड़ी बड़ी बातें हुई। संन्यासियों- वैरागियों के मंहगी कारों के काफिले दौड़े। लाखों की लागत वाले उनके लिए सुविधा सम्पन्न कक्ष व बाथरूम बने। मुरारी बापू, आशाराम बापू, बाबा रामदेव, स्वामी अवधेशानंद गिरि, चिदानंद मुनि महराज लगायत प्राय: सभी आचार्य, महामंडलेश्वर और पीठाधीश्वरों ने अपने अपने ढंग से उपिस्थित दर्ज करायी। दद्दा के कैम्प में हजारों नर नारी कामधाम छोड़ कर मिट्टी के सवा करोड़ शिवलिंग बनाने में लगे रहे। अखाड़ों-महंतों की शाही सवारियां निकलीं और शाही स्नान हुए। पदवियां बंटी। दक्षिण के विवादित स्वामी नित्यानंद ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिये। महामंडलेश्वर बन गये। पर, ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे लगे कि हमारे अधिकांश धर्मगुरु देश के बदलते चेहरे व चरित्र को लेकर वाकई चिंतित- गंभीर हैं। ऐसी आवाज नहीं निकली जो जनता की आवाज बनती और सकारात्मक बदलाव की अपेक्षित भावभूमि बनाती। जैसे सब को रस्म अदायगी, मीडिया केन्द्रित प्रचार प्रियता और अपनी मान-प्रतिष्ठा व शान-शौकत बनाने-दिखाने की ही पड़ी हो।
केन्द्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और उसके प्रभारी मंत्री मो. आजम खां के लिए तो महाकुंभ महज एक बड़ा मेला भर था। इससे ज्यादा किसे फुरसत है। ऐसा न होता तो इलाहाबाद रेलवे स्टेशन और मेला क्षेत्र में 45- 50 लोग कुचल कर न मारे जाते। मौनी अमावस्या पर व्यवस्था चरमरा न जाती। हादसे के 20 घंटे बाद भी लाखों धर्मभीरु कलपते-कराहते फंसे न रहते। बारिश होने पर कीचड़ बनीं सडकें, गिरे टेंट, कटी बिजली और भूख से बिलबिलाते हजारों कल्पवासी व्रत अधूरा छोड़ कर वापस लौटने को विवश न होते। आम स्नानार्थियों को भूखे-प्यासे घंटों मीलों पैदल न चलना पड़ता। हाई कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाता कोई नवनीत सिकेरा लाव लश्कर के साथ धड़धड़ाते घाट न पहुंचता।
महंतों-मठाधीशों के वैभव की सारी चमक भक्तों के पैसे पर ही टिकी है। समाज की दिशा- दशा बदलने वाली अन्य शक्तियों- साहित्यकारों और राजनेताओं से भी अधिक उनका असर है। इस लिए उनसे अपेक्षायें भी ज्यादा हैं। कहा जाता है मार्ग वही है जिस पर महपुरुष चलते हैं – महाजनो येन गत: स पंथान:। भगवान श्रीकृष्ण गीता में गाते हैं- यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:, स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते। श्रेष्ठ मनुष्य जो जो आचरण करता है, दूसरे लोग वैसा वैसा ही करते हैं, वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, दूसरे मनुष्य उसी के अनुसार चलने लगते हैं। इस कसौटी पर देखें तो निराशा ही हाथ लगती है। प्रदूषण, पर्यावरण, जलसंरक्षण, लैंगिक समानता-सम्मान, सामाजिक सदभाव जैसे बड़े मुद्दे प्राय: अछूते ही रह गये। नरेन्द्र मोदी पर तो दिलचस्पियां ली जाती रहीं पर आटा, दाल, चावल से लेकर दूध, सब्जी, दवाई तक में जहरीली मिलावट की बढ़ती प्रवृत्तिचिंता का बिषय नहीं बनी। जगह और डुबकी लगाने क्रम व समय को लेकर तो आवाजें उठीं लेकिन विश्वसनीयता के संकट को दूर करने को आगे आने की आवश्यकता नहीं समझी गयी।
देश की आन बान, शान और पहचान गंगा – यमुना शहरों के शौच-सीवर का नाला बन गयीं हैं और शंकराचार्य चतुष्पथ की जगह के नाम पर रूठते-ऐंठते रह गये। कोई नवनीत हृदय नदियों के दुख से द्रवित नहीं हुआ। शहरों में तालाब पट गये हैं और गांवों के सूख गये हैं। बाग के बाग विकास की भेंट चढ चुके हैं लेकिन इनके बजाय राधे मां, नित्या नंद आशाराम बापू और रामदेव को बयान-विवाद होते रहे। बाबा रामदेव को महाकुंभ में महाक्रांति के लक्षण दिखे। उन्हों ने इस वर्ष के अंत तक देश में बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद जतायी। तो दूसरी ओर उन्हें एक अखाडे द्वारा शाही स्नान के लिए चांदी के सिंहासन पर बैठाये जाने को लेकर विरोध-विवाद हो गया। विरोधी का कहना था कि वे बाबा राम देव को संत ही नहीं मानते। बाबा किसी अखाडे या साधु समाज से नहीं जुड़े हैं, इसलिए संत नहीं हैं। दूसरे उन्होंने धर्म को व्यवसाय बना रखा है। दिल्ली में बलात्कार पीडिता के बारे में विवादित बयान देने की वजह से लोगों का कोपभाजन बने आशाराम बापू को
सफाई देने से ही फुरसत नहीं मिली। धर्मसंसदों ने इस पर विचार नहीं किया कि महज पांच साल में महामंडलेश्वर 125 से बढ़ कर 327 कैसे हो गये। इस पर भी विचार नहीं किया गया धार्मिक समागमों में तो जयकारे सनातन धर्म के लगते हैं, लेकिन लोक व्यवहार में सनातन धर्म के बजाय ‘हिंदू धर्म’ शब्द क्यों चलता है। एकरूपता क्यों नहीं है?
लेखक शंभू दयाल वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं. ये लंबे समय तक दैनिक जागरण में वरिष्ठ पद पर रहे हैं. इनसे संपर्क मो. 9927003000 के जरिए किया जा सकता है.






