Harishankar Singh : आज हिंदुस्तान अखबार में एक लेख पढा, जिसमें लिखा था कि कैसे अखिलेश यादव ने लखनउ में 10 हजार लैपटॉप बांटकर युवाओं को सूचना प्रौद्योगिकी की दिशा में एक नया आयाम दिया है। लेख को पढने के बाद ऐसा लगा कि माननीय स्थानीय संपादक जी ने अखिलेश की तारीफ में पक्षपातपूर्ण कसीदें पढी हों। हो सकता है कि इसका कुछ लाभ वो यूपी सरकार से लेना चाहते हों। लेकिन लैपटाप को गावों तक बांटने के प्रभाव की हकीकत का श्वेत पहलू कम और श्याम पहलू ज्यादा है। वो ऐसे कि कोई भी विद्युत चलित य़ंत्र बिना बिजली के बेकार है और यूपी के सूदूर गावों में बिजली की हा़ल किसी से भी नहीं छिपा है।
दूसरा बिंदु है तकनीकी के बारे में कुशल प्रशिक्षण जिसके बिना कोई भी यंत्र एक डब्बे से ज्यादा कुछ नहीं है। इसमें तीसरी बात है कि आईटी की जहां आवश्यकता नहीं है वहां इसका केवल दुरुपयोग है। इसमें तमाम अश्लील प्रतिबंधित वीडियो और फोटो शामिल हैं जो दिमाग में सबसे तेजी से घर कर जाते हैं और उसका लत लगते समय नहीं लगता। गौर करें कि कैसे सेलफोन बायरल होने से पहले ब्लैकमेलिंग औश्र अश्लील एमएमएस का कांसेप्ट नगण्य था, आज कोई भी शत्रुता निकालने के लिए यह हथियार अपनाने में संकोच नहीं करता। इन तमान श्याम बिंदुओं के बीच एक श्वेत बिंदु है वो है कि लैपटाप के तकनीकी प्रयोग का फोबिया कम हो जाएगा, लेकिन प्रश्न यह है कि किसी के हाथ में परमाणु बम देकर हम कैसे यह मान लें कि वह उसका उपयोग उर्जा के लिए ही करेगा, विध्वंस के लिए नहीं। अपने वोट बैंक को बढाने के लिए माननीय सीएम जी ने जो खिलौना मासूमों के हाथ में समय से पहले पकडा दिया है, देखिए वह क्या रंग लाता है। एक तरफ तो उनकी सरकार में विद्यार्थियों को नकल कराकर अच्छे अंकों के साथ डका दिया जाता है तो दूसरी ओर मार्डन बनाने के लिए लैपटाप पकड़ा दिया जाता है। कितनी अजीब विडंबना है ना।
हरिशंकर सिंह के फेसबुक वॉल से.





