पिछले कई दिनों से मीडिया में काम कर रहा था. शुरुआत की एक लोकल चैनल के कैमरामैन के रूप में. उसके बाद मेहनत करने के बाद उसी में वीडियो एडिटर हो गया. एक दौर ऐसा आया कि सभी लोकल चैनल बंद हो गए. मैं भुखमरी की कगार पर पहुँच गया. फिर याद आया कि फोटोग्राफी का डिप्लोमा किस दिन काम आएगा. शुरू कर दी फोटोग्राफी. इधर उधर काम ढूंढता रहा लेकिन कहीं कोई भी काम देने को तैयार नहीं.
फिर आया महाकुम्भ. एक ऐसा इवेंट जहां छायाकारों की कमी पड़ गयी. देश-विदेश से छायाकार आये. भास्कर जैसे बैनर को भी छायाकार की जरूरत पड़ी. शुरुआत में राहुल और पंकज दो छायाकारों ने ज्वाइन किया, लेकिन दस दिन बाद हो वो गायब हो गए. फिर आया मैं, भास्कर ज्वाइन किया. एक बड़े सपने के साथ कि कुछ सिखने को मिलेगा और करने को भी. पूरे कुम्भ जी लगा कर भास्कर के लिए काम किया, लेकिन बड़े-बड़े दावे करने वाले लोग काम खत्म होते ही ठेंगा दिखा कर भाग खड़े हुए.
मुकेश, जो कि आउटपुट हेड थे, उन्होंने फोन ही करना बंद कर दिया. अनुराग जी, जो ब्यूरो चीफ थे, ने भास्कर ही छोड़ दिया. अंत में बचे आशीष जी, रोज़ फ़ोन करते हैं देखो पैसा आया, लेकिन आएगा कहां से जब कहीं पैसा डिपॉजिट ही नहीं किया गया. रोज़-रोज़ की आफत, पैसा आया कि नहीं आया. पूरे कुम्भ उधार लेकर काम किया. नतीजा ये रहा कि खुद का कैमरा तक बेच डाला उधार चुकाने के लिए, लेकिन सैलरी की बात तो दूर लोगों ने बात तक करना बंद कर दिया.
नंगी फोटो डाली खुद और बदनाम किया हमें. हम भी मजबूर थे कि काम नहीं करेंगे तो पैसा नहीं मिलेगा. अंततः उब कर काम छोड़ दिया १५ फरवरी को, उम्मीद थी कि पैसा मिलेगा लेकिन अब तक फूटी कौड़ी भी भास्कर की तरफ से नहीं मिली. फिलहाल एक आखिरी कोशिश है कि कम से कम मैं जिस चीज़ का शिकार हूँ, उसका शिकार और कोइ भाई न हो, इसीलिए ये पत्र लिख रहा हूँ. हो सके तो प्रकाशित करने की कृपा करें.
प्रभात कुमार वर्मा
छायाकार
इलाहाबाद
मो. ९३३६०५५०५२





