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भाजपा को अनाथ कर देते हैं राजनाथ!

भाजपा में राजनाथ सिंह जैसे कम नेता ही भाग्यशाली हैं, जिन्हे बिना किसी ठोस प्रयास के मुंह मांगी मुराद मिल जाती है। इसे हल्दी लगे न फिटकरी और रंग चोखा भी कह सकते हैं। अगर लोक भाषा में बात करें तो 'पूड़ा ना पापड़ी, पटाक बहू आ पड़ी' उक्ति भी राजनाथ सिंह पर चरितार्थ होती है। एक कहावत है बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना, यह कहावत भी राजनाथ सिंह पर एक दम फिट बैठती है। राजनाथ सिंह पर जितनी कहावतें और लोकोक्तियां चरितार्थ होती हैं उतनी भाजपा ही नहीं अन्य किसी दल के नेता पर भी चरितार्थ नही होतीं।

भाजपा में राजनाथ सिंह जैसे कम नेता ही भाग्यशाली हैं, जिन्हे बिना किसी ठोस प्रयास के मुंह मांगी मुराद मिल जाती है। इसे हल्दी लगे न फिटकरी और रंग चोखा भी कह सकते हैं। अगर लोक भाषा में बात करें तो 'पूड़ा ना पापड़ी, पटाक बहू आ पड़ी' उक्ति भी राजनाथ सिंह पर चरितार्थ होती है। एक कहावत है बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना, यह कहावत भी राजनाथ सिंह पर एक दम फिट बैठती है। राजनाथ सिंह पर जितनी कहावतें और लोकोक्तियां चरितार्थ होती हैं उतनी भाजपा ही नहीं अन्य किसी दल के नेता पर भी चरितार्थ नही होतीं।

आडवाणी जी द्वारा पाकिस्तान में जिन्ना के मजार पर जा कर जिन्ना को सेकुलर बताना आडवाणी जी को इतना भारी पड़ा कि उन्हें भाजपा अध्यक्ष पद से ही हटना पड़ गया। बस यहीं राजनाथ सिंह की लाटरी खुल गई गौर उन्हें आडवाणी जी के शेष कार्यकाल के लिए भाजपा अध्यक्ष बना दिया गया। उसके बाद इन्हें पूरे कार्यकाल के लिए दोबारा अध्यक्ष चुन दिया गया। और अब तीसरी बार तो इन पर सारी कहावतें और लोकोक्तियां चरितार्थ हो गईं। सारी बाधाओं को पार करते हुए नितिन गडकरी का दोबारा भाजपा अध्यक्ष बनना तय हो गया था, बस चुनाव की औपचारिकता भर रह गई थी कि ऐन चुनाव से एक दिन पहले उनके प्रतिष्ठानों पर आय कर के छापों की खबर आ गई तो नितिन गडकरी को मैदान छोड़ना पड़ गया।

संघ की भी मजबूरी हो गई। आडवाणी खेमा पहले ही गडकरी से खार खाए बैठा था, मगर इस बीच राजनाथ सिंह का नाम कहीं भी नहीं था। गडकरी के मैदान से हटते ही संघ ने राजनाथ सिंह का नाम आगे कर दिया और इस प्रकार तीसरी बार राजनाथ सिंह बिना हल्दी फिटकरी लगे भाजपा के अध्यक्ष बन गए। यह तो बाद में पता चला कि जिसे गडकरी के प्रतिष्ठानों पर छापा बताया गया था, वह तो सामान्य आयकर सर्वेक्षण था, मगर अब पछताने से क्या हो सकता था, राजनाथ सिंह के नाम की घोषणा हो चुकी थी। बाद में उनके नाम पर दल की कार्यकारिणी की मुहर भी लग गई। राजनाथ सिंह अध्यक्ष बन गए और जो भी नेता इस पद पर आंख लगाए थे सब टापते रह गए।

इस प्रकार अपने भाग्य के भरोसे राजनाथ सिंह उत्‍तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और दल के अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान होते रहे हैं, मगर उनका यह भाग्य भाजपा के लिए कभी भी शुभ नहीं रहा। 2002 के चुनाव में राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे। यह सरकार बसपा से दल बदल कर बनाई गई थी, जिसके चलते बसपा से आए सभी विधायकों को मंत्री बनाया गया था। मुख्यमंत्री को यह अधिकार नहीं दिया गया था कि वह किसी मंत्री को हटा दें या उसका विभाग बदल दें। इस हालत में भाजपा की काफी किरकिरी हुई, मगर मजबूरी थी, इसी मजबूरी के चलते यूपी में विधान सभा चुनाव हुए और भाजपा सत्ता से बेदखल हो गई। उसकी सीटों की संख्या 176 से घट कर 88 पर सिमट कर रह गई। राजनाथ सिंह ने अपने इस कार्यकाल में भाजपा का वोट बैंक बढाने के लिए दलितों में अति दलित और पिछड़ों में अति पिछड़े का कार्ड भी खेला था, मगर दलितों और पिछड़ों को भाजपा की ओर आकर्षित करने का राजनाथ सिंह का यह दांव भी काम न आ सका और भाजपा सत्ता से बाहर हुई तो फिर सत्ता के निकट भी न आ सकी।

इस के बाद राजनाथ सिंह के अध्यक्ष के रूप में पहले कार्यकाल 2007 में उ. प्र. विधान सभा के फिर चुनाव हुए तो इस बार भाजपा 88 से घट कर मात्र 51 सीटों पर सिमट कर रह गई। इस प्रकार भाजपा के लिए न उनका मुख्यमंत्री बनना शुभ रहा और न ही दल का अध्यक्ष बनना। अध्यक्ष के रुप में भी राजनाथ सिंह भाजपा में कोई नई जान फूंकने में भी सफल न हो सके, इसके विपरीत भाजपा में कलह निरंतर बढती ही रही। दरअसल भाजपा की ब्राह्मण और पंजाबी लाबी को राजनाथ सिंह का अध्यक्ष बनना रास नहीं आता।

राजनाथ सिंह के दूसरे फुल टर्म कार्यकाल पर जब नजर डालते हैं तो यहां भी निराशा ही हाथ लगती है। 2009 में भाजपा ने राजनाथ सिंह के नेतृत्व में लोकसभा का चुनाव लड़ा था। इस से पहले 2004 के चुनाव में भाजपा को 138 सीटों पर विजय मिली थी, मगर राजनाथ सिंह के नेतृत्व में लड़े गए चुनाव में यह संख्या 116 पर सिमट कर रह गई। यही नही 2004 के मुकाबले भाजपा मत प्रतिशत 22.16 से घट कर 18.80 प्रतिशत पर आ गया। इस प्रकार भाजपा के लिए राजनाथ सिंह का यह कार्यकाल भी शुभ नहीं रहा। अब 2014 का लोकसभा चुनाव भी राजनाथ सिंह के नेतृत्व में ही लड़ा जाना है इस की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा मगर पिछले अनुभव को नकारा भी नहीं जा सकता।

राजनाथ सिंह के इस कार्यकाल के आरंभ में एक नई बात यह हुई है कि जो भाजपा कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाती रही है, वह भी अब इस आरोप के दायरे में कम से कम उत्तर प्रदेश में तो आ ही गई है। लंबी प्रतीक्षा के बाद उ. प्र. की नवगठित कार्यकारिणी में तीन नेता पुत्रों एवं एक पुत्री को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। राजवीर सिंह पुत्र कल्याण सिंह और गोपाल टंडन पुत्र लालजी टंडन को उपाध्यक्ष और पंकज सिंह पुत्र राजनाथ सिंह को महामंत्री बनाया गया है। वरिष्ठ भाजपा नेता प्रेम लता कटियार की पुत्री नीलिमा कटियार को मंत्री बनाया गया है। इस प्रकार अब भाजपा में भी परिवारवाद की परंपरा का आरंभ हो गया है।

राजनाथ सिंह यूपी में मंत्री और मुख्यमंत्री रह चुके हैं। केन्द्र में भी वह मंत्री रह चुके हैं और भाजपा अध्यक्ष तो अब हैं ही, मगर इतना सब होने पर भी भाजपा का एक वर्ग उन्हें राष्‍ट्रीय नेता नहीं मानता। इस वर्ग के अनुसार वह केवल राज्य स्तरीय एवं ठाकुरों के ही नेता हैं। यही कारण है कि यह वर्ग उनकी बातों पर ध्यान नहीं देता। उदाहरण स्वरूप बार बार राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री के लिए किसी का नाम न उछाला जाए, मगर उनकी इस अपील या आदेश पर ध्यान न दे कर प्रतिदिन कोई न कोई भाजपा नेता प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का नाम उछाल ही देता है और अध्यक्ष महोदय अपना मन मसोस कर रह जाते हैं। इस से क्या यह सिद्ध नहीं होता कि दल पर उनका नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। इस सब के चलत वह भाजपा की आंतरिक गुटबाजी समाप्त करने में कितने सफल हो पाएंगे यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता।

लेखक महर उद्दीन खां वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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