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… तब तब अफजल गुरु पैदा होंगे

अफजल गुरु के फांसी के मुद्दे पर भारत-पाक के बीच तनाव बढ़ने लगा है। इसी प्रसंग में एक वैश्विक समाचार साइट पढ़ते समय एक लिंक पर अचानक माउस चल गया। लिंक था अफजल गुरु की एक चिट्ठी के बारे में जो उसने श्रीनगर के एक समाचार पत्र को लिखा था। मैं उन लोगों में से हूं जो एक दौर में अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के प्रबल समर्थक थे। फांसी के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को मैं भी राष्ट्रद्रोही मानता था।

अफजल गुरु के फांसी के मुद्दे पर भारत-पाक के बीच तनाव बढ़ने लगा है। इसी प्रसंग में एक वैश्विक समाचार साइट पढ़ते समय एक लिंक पर अचानक माउस चल गया। लिंक था अफजल गुरु की एक चिट्ठी के बारे में जो उसने श्रीनगर के एक समाचार पत्र को लिखा था। मैं उन लोगों में से हूं जो एक दौर में अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के प्रबल समर्थक थे। फांसी के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को मैं भी राष्ट्रद्रोही मानता था।

चिट्ठी से अफजल के बारे में कुछ ऐसी चीजें जानने को मिलीं जिनसे मेरी धारणा में थोड़ा सा बदलाव हुआ। इसमें कोई शक नहीं कि देश की संसद पर हमले की साजिश रचने वाला अफजल ही था और उसको दी गई सजा भी गलत नहीं ठहराई जा सकती लेकिन कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका दमन फांसी की सजा भी नहीं कर पाएगी।

अफजल एक चिकित्सा छात्र रहा और शिक्षक भी था। किसी आतंकी संगठन का मुखिया वह जीवन के अंतिम दौर तक नहीं रहा। अफजल गुरु के सामान्य जीवन में एक उग्रवादी बदलाव तब आया जबकि उसके इलाके में भारतीय सुरक्षाबलों ने महिलाओं के साथ बलात्कार किया। ‘बलात्कार’……जिसके लिए दिल्ली की सड़कों पर उतरकर हजारों देशवासी सख्त कानून की हिमायत करते हैं। बलात्कारियों को फांसी चढ़ाने की मांग करते हैं और किसी बलात्कारी की आत्महत्या को राष्ट्रीय जश्न का विषय माना जाता है। मुझे लगता है कि अफजल के मन का उग्रवाद भी इसी ‘बलात्कार’ शब्द की परिणति थी।

उसकी फांसी के पहले और बाद में भी मेरी उत्सुकता का विषय रहा कि एक आतंकी के पक्ष में पूरा श्रीनगर लामबन्द क्यों हो जाता है? क्यों अफजल के शव के लिए कश्मीर जलने लगता है? इन सवालों का जवाब मुझे कश्मीर की वादियों से नहीं बल्कि पूर्वोत्तर की उन पहाड़ियों से मिलता है जहां की बुजुर्ग महिलाएं सड़क पर उतरकर सुरक्षाबलों को ललकारती हैं कि ‘आओ मेरा बलात्कार करो….’।

यह सही है कि कश्मीर हो या फिर पूर्वोत्तर, बगैर सुरक्षाबलों के हमारी राष्ट्रीय अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी। वहां सैन्य ताकत चाहिए लेकिन हमारी मां-बहनों के बलात्कार की कीमत पर नहीं। जब-जब सैन्य ताकतों में शामिल चन्द अनैतिक तत्व ‘बलात्कार’ करेंगे और किसी वर्ग विशेष का मान मर्दन करते रहेंगे, तब-तब अफजल गुरु पैदा होंगे और दिल्ली की संसद पर खतरा बना रहेगा क्योंकि हर कोई मणिपुर की वह साहसी महिला शर्मिला इरोम नहीं बन सकती जो पिछले एक दशक से भूख हड़ताल पर बैठी है। उन्हें लगता है कि सैन्य कानून उनका और उनके जैसे लोगों का मान-मर्दन करने के लिए ही बना है।

लेखक वेद प्रकाश पाठक गोरखपुर में स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हैं.

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