Anand Pradhan : असल में, जस्टिस काटजू गाड़ी को घोड़े के आगे खड़ा कर रहे हैं. पत्रकारिता की बुनियादी समस्याओं खासकर उसकी गुणवत्ता में आई गिरावट, नैतिक विचलनों और भ्रष्ट गतिविधियों के लिए पत्रकारों से अधिक मीडिया कंपनियों की मौजूदा संरचना जिम्मेदार है. अधिक से अधिक मुनाफा कमाने और निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए चलाई जा रही मीडिया कंपनियों में पत्रकार के पास कोई विकल्प नहीं है.
जब संस्थान ही भ्रष्ट हो, अखबार/चैनल को वह अपने दूसरे धंधों को संरक्षित और प्रोत्साहित करने का माध्यम समझता हो, पत्रकारिता का मतलब खबरों की बिक्री (पेड न्यूज) मानता हो, विज्ञापनदाताओं को खुश करने के लिए हल्की-फुल्की मनोरंजक ‘फीलगुड’ खबरों और अप-मार्केट पाठकों/दर्शकों के लिए सिनेमा-क्रिकेट-सेलेब्रिटीज को परोसने पर जोर देता हो तो पत्रकार चाहे जितना पढ़ा-लिखा हो, जितना ईमानदार-साहसी-संवेदनशील हो, वह इस ढाँचे में क्या कर सकता है?
पत्रकारिता के मौजूदा कारपोरेट-व्यावसायिक माडल में पत्रकार की भूमिका बहुत सीमित रह गई है. सच पूछिए तो पत्रकारिता एक नौकरी भर बनकर रह गई है और जस्टिस काटजू का सुझाव रही-सही कसर भी पूरी कर देगा, डिग्री के साथ पत्रकारिता क्लर्की बनकर रह जाएगी.
मुद्दा यह है कि ईमानदार-साहसी-संवेदनशील पत्रकारों की आज़ादी की सुरक्षा कैसे की जाए? मीडिया के मौजूदा पूंजीवादी बिजनेस माडल में अभिव्यक्ति की आज़ादी पत्रकार की नहीं, उसके मालिक की आज़ादी है. जब तक यह पत्रकार की आज़ादी नहीं बनेगी, कोई डिग्री या मानदंड पत्रकारिता के स्खलन को नहीं रोक पाएगी.
आईआईएमसी के शिक्षक आनंद प्रधान के एफबी वॉल से साभार.





