दृढ़ इच्छाशक्ति एवं शिक्षा ने नारी मन को उच्च आकांक्षाएं, इंद्रधनुषी सपने और अंतर्मन की परतें खोलने की नई राह दी है। जरूरत है उसे आत्मविश्वास के साथ खुद को बनाए रखने की। इस बार के बजट में सरकार ने महिलाओं के लिए 97 हजार करोड़ का प्रावधान किया है, लेकिन दिनोंदिन बढ़ते यौनशोषण व आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए किसी भी तरह के प्रावधान की बात नहीं की गई।
मार्च का महीना आते ही महिला दिवस की तूती बजने लगती है। क्या न्यूज़ चैनल, अखबार, कॉर्पोरेट हाउस सभी जगह। हर साल 8 मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है और महिला सशक्तिकरण के लिए न जाने क्या-क्या नए नियम और कानून बनाने की घोषणा की जाती है। महिला सशक्तिकरण यानी भौतिक, आध्यात्मिक, शारिरिक या मानसिक, सभी स्तर पर महिलाओं में आत्मविश्वास पैदा कर उन्हें सशक्त बनाने की प्रक्रिया है। कहा जाता है कि आज महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है, लेकिन यह कितना सच है?
वैसे तो भारत-वर्ष में पुरातन काल से ही नारी शक्ति का अत्यधिक महत्व रहा है। यहाँ की संस्कृति में नारी को एक महान शक्ति के रूप में आदर-सम्मान दिया जाता रहा है। वैदिक काल में नारी सामाजिक-धार्मिक व आध्यात्मिक क्षेत्रों में पुरूष की सहभागिनी रही है। इसके अलावा, नारी ने अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, समाज व जीवन के हर क्षेत्र में अपना गौरव व सम्मान बढ़ाया। आदिकाल से स्त्री — माँ, बहन, प्रेयसी, पत्नी व पुत्री आदि रिश्तों के दायित्वों को निभाती चली आ रही है। किसी ने कहा था कि महिलाओं की स्थिति को देखर किसी भी देश की स्थिति का जायजा आसानी से लगा सकते हैं।
मध्य काल में नारी का जीवन संकटग्रस्त था, क्योंकि इस वक्त शिक्षा लगभग समाप्त सी हो गई थी। फिर भी इस काल के दौरान, अपनी विद्वता, वीरता, लगन से अपना, अपने परिवार, समाज व देश का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखने वाली रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई, महारानी पद्मिनी, जीजाबाई आदि युगों-युगों तक प्रेरणादायी रही हैं और आगे भी रहेंगी। इतना ही नहीं, दिल्ली पर शासन करने वाली पहली महिला रज़िया सुल्ताना थी, जो बहुत ही बेहतर ढंग से अपने शासन को चला रही थी, लेकिन पुरुष प्रधान समाज में महिला का शासन करना लोगों को पसंद नहीं आया और एक साजिश के तहत उसे मार दिया गया।
हर युग में महिलाओं का शोषण होता रहा है। आधुनिकता के इस दौर में, सिर्फ कहने के लिए महिलाएं स्वतंत्र हैं, उनका शोषण तो आज भी जारी है। बस अब इसका ट्रेंड बदल गया है। नि:संदेह अंग्रेजों का शासन बहुत बुरा था, लेकिन महिलाओं की स्थिति में जो मौलिक बदलाव आए वो इसी जमाने में आए।
इसके अलावा उसी समय में राजाराम मोहन राय और ईश्वरचंद विद्यासागर ने महिलाओं की उन्नति के लिए आवाज उठाई। उनका साथ पूरे देश में देने के लिए महाराष्ट्र से ज्योतिबा फुले और डॉ. अम्बेडकर आगे बढ़े। वहीं दक्षिण में पेरियार ने इसमें पहल की। भारत में पुनर्निर्माण का दौर चल रहा था। ऐसे में भला महिलाओं के पिछड़े होने पर यह कैसे संभव था। राजा राममोहन राय ने मैकाले की शिक्षा नीति का विरोध किया तो दूसरी ओर महिलाओं की उन्नति के लिए आवाज बुलंद भी की। ब्रह्म समाज और उसके बाद आर्य समाज ने भी महिलाओं की उन्नति के रास्ते खोले। महिलाओं को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया गया। भारत में आज़ादी के बाद राजनैतिक-सामाजिक व शिक्षा-रोजगार के क्षेत्रों में महिलाओं ने तेजी से तरक्की हासिल की है। इन सबके बावजूद भी भारत में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण कटु सत्य है कि‘‘यत्र नारी पूज्यंते, तत्र देवता रमन्ते’’की अवधारणा वाले भारत देश में सामाजिक व पारिवारिक स्तर पर महिलओं की दशा सोचनीय व दयनीय है, क्योंकि महिलाओं के लिए जो भी नए कानून और प्रावधान बनते हैं, वह सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं। और स्त्री शक्ति को पूजनीय बनाता है तो वहीं दूसरी ओर उसे बेइज्जत करने का कोई मौका भी नहीं छोड़ता। इसका ताजा उदाहरण है पिछले दिनों दिल्ली में हुई गैंग रेप की घटना के बाद तो ऐसी वारदातों की जैसे झड़ी लग गई है। महिला सुरक्षा को लेकर सरकार दावे तो बहुत करती हैं, लेकिन वो सारे के सारे खोखले निकलते हैं या फिर उसे लागू होते-होते ऐसी ही दूसरी घटना हो जाती है। ऐसे में मीडिया को अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कुछ गणमान्य लोगों को बुलाकार सरकार की खामियां निकालने बजाय सरकार पर दबाव डालकर अपराधी को खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए जोर देना चाहिए।
वर्तमान दौर में, महिलाओं को जागरूक होकर, अपने अधिकारों के प्रति सजग होने की जरूरत है। दृढ़ता से अपने पंख फैलाकर उड़े और छू ले अपने-अपने हिस्से के आकाश को.
लेखिका निष्ठा पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं.





