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इलाहाबाद

उत्‍तर प्रदेश के पूर्व मंत्री नजमुद्दीन का इंतकाल

इलाहाबाद। दलितों को अपना हक और हकूक पाने के लिए अब किसी से याचना करने की जरूरत नहीं है, इसे छीनकर लेने की जरूरत है। जनसभाओं और बैठकों में दलित-शोषितों के बीच अक्सर इस जुमले को दोहराने वाले नेता नजमुद्दीन जीवन की चिरनिंद्रा में हमेशा-हमेशा के लिए सो गए। सूबे के पूर्व मंत्री रहे नजमुद्दीन का लंबी बीमारी के बाद 17 मार्च को रायबरेली के पास इंतकाल हो गया। वे पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे। 18 मार्च को दोपहर उनके पैतृक गांव महरौड़ा में हजारों चहेतों ने नम आंखों से अपने नज्जू भाई को आखिरी विदाई दी। परिजनों, दोस्तों और उनके राजनैतिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया।

इलाहाबाद। दलितों को अपना हक और हकूक पाने के लिए अब किसी से याचना करने की जरूरत नहीं है, इसे छीनकर लेने की जरूरत है। जनसभाओं और बैठकों में दलित-शोषितों के बीच अक्सर इस जुमले को दोहराने वाले नेता नजमुद्दीन जीवन की चिरनिंद्रा में हमेशा-हमेशा के लिए सो गए। सूबे के पूर्व मंत्री रहे नजमुद्दीन का लंबी बीमारी के बाद 17 मार्च को रायबरेली के पास इंतकाल हो गया। वे पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे। 18 मार्च को दोपहर उनके पैतृक गांव महरौड़ा में हजारों चहेतों ने नम आंखों से अपने नज्जू भाई को आखिरी विदाई दी। परिजनों, दोस्तों और उनके राजनैतिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया।

बीमार नज्जू भाई का महीनों से इलाज चल रहा था। 17 मार्च को दोपहर में उनकी तबियत ज्यादा बिगड़ गई। परिजन उन्हें इलाहाबाद के अस्पताल से निकाल कर पीजीआई लखनऊ ले जा रहे थे। रास्ते में रायबरेली के पास पहुंचकर उन्होंने दम तोड़ दिया। सोरांव तहसील के महरौड़ा गांव निवासी नजमुद्दीन नज्जू मियां के नाम से भी जाने जाते थे। इलाहाबाद के नवाबगंज विधानसभा क्षेत्र (नए परिसीमन के बाद अब फाफामऊ विधानसभा) से सन् 1993 और 1989 में दो बार बसपा से विधायक चुने गए। एक समय ऐसा भी आया कि बसपा सुप्रीमो मायावती के ये खास बन गए। 1993 में चुने गए विधायक नजमुद्दीन की किस्मत अच्छी रही। बीच में सरकार गिरने की नौबत आने पर सन् 1995 में सपा और बसपा के बीच गठबंधन हो गया। इसमें नजमुद्दीन राजस्व राज्यमंत्री बने।

बसपा के कभी कद्दावर नेता माने जाने वाले नजमुद्दीन का जल्द ही मायावती से मोहभंग हो गया। उन्होंने दलितों के नाम पर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरा करने का आरोप लगाते हुए मायावती और बसपा दोनों से नाता तोड़ लिया। नजमुद्दीन ने दलित-शोषितों के बीच रहकर उनको जागरूक करने का कार्य किया। जब कभी उन्हें छले जाने का अहसास हुआ तो दूरी बनाते भी देरी नहीं की। चाहे वह बहुजन समाज पार्टी रही हो या अपनादल। सत्ता, समाज, शोशित और शोशक इन सभी को लेकर उनका नजरिया साफ रहा। नवाबगंज क्षेत्र में दो बार सन् 1993 और 1989 में विधानसभा चुनाव के समय उन्हें समझने-बूझने का कई बार मौका मिला। विरोधी खेमा में रहकर अपने अग्रज प्रभाशंकर पांडेय के लिए तब भाजपा वाले ‘कमल’ के लिए चुनाव प्रचार करते हुए यह महसूस किया था कि नजमुद्दीन का अलग ही सही एक दायरा तो था ही। उनके अपने लोग भी थे। वैसे ही हजारों लोग किसी के पीछे काहे को दिनरात घूमेंगे। काफी दिनों तक नजमुद्दीन अपना दल के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। कुछ ही महीने पहले कथनी-करनी में अंतर देख नजमुद्दीन ने अपनादल से नाता तोड़ लिया था।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

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