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एक भी ‘पेड न्यूज’ नहीं थी, इन विज्ञापनों की बाकायदा रसीद काटी गई

चुनावों के दौरान पेड न्‍यूज का चलन बढ़ा है. सभी बड़े अखबार भिन्‍न-भिन्‍न तरीके से पेड न्‍यूज प्रकाशित करते हैं. हालांकि खबरों की भाषा शैली से तो पेड न्‍यूज समझ में आ जाते हैं, परन्‍तु इनको साबित करना मुश्किल होता है क्‍योंकि दोनों ही पक्ष अपने बचाव के लिए झूठ का सहारा लेते हैं. प्रत्‍याशी चुनावा आयोग के खर्च सीमा के डर से कुछ बताने को तैयार नहीं होता तो अखबार अपनी पोल खुलने से रोकने के लिए पेड न्‍यूज छापने की बात से इनकार करते हैं.

चुनावों के दौरान पेड न्‍यूज का चलन बढ़ा है. सभी बड़े अखबार भिन्‍न-भिन्‍न तरीके से पेड न्‍यूज प्रकाशित करते हैं. हालांकि खबरों की भाषा शैली से तो पेड न्‍यूज समझ में आ जाते हैं, परन्‍तु इनको साबित करना मुश्किल होता है क्‍योंकि दोनों ही पक्ष अपने बचाव के लिए झूठ का सहारा लेते हैं. प्रत्‍याशी चुनावा आयोग के खर्च सीमा के डर से कुछ बताने को तैयार नहीं होता तो अखबार अपनी पोल खुलने से रोकने के लिए पेड न्‍यूज छापने की बात से इनकार करते हैं.

चुनावों के दौरान पेड न्‍यूज प्रकाशित करने के आरोप सबसे ज्‍यादा दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान पर ही लगे. 14 जनवरी को पीसीआई ने हिंदुस्‍तान को पेड न्‍यूज छापने वाले अखबारों की लिस्‍ट में शामिल किया था. अंग्रेजी अखबार द हिंदू ने भी इस मामले में एक खबर प्रकाशित की थी. हालांकि इस मामले में पीसीआई ने हिंदुस्‍तान अखबार को सूची में शामिल करने का फैसला वापस ले लिया है, परन्‍तु सवाल वही है कि पेड न्‍यूज इस तरीके से छपते हैं कि पीसीआई या कोई इसे साबित नहीं कर सकता है.

तमाम अखबार प्रत्‍याशियों से एक मुश्‍त मोटी रकम वसूल लेते हैं तथा उनके जनसंपर्कों, सभाओं की व्‍यापक कवरेज करते हैं. पेड न्‍यूज में यह शर्त होती है कि वे उनको व्‍यापक कवरेज देंगे तथा कुछ खास मौकों पर इसी रकम में विज्ञापन भी प्रकाशित करेंगे. जो प्रत्‍याशी अखबारों के पेड न्‍यूज के खेल में शामिल नहीं होते हैं, उनकी खबरों को या तो प्रकाशित नहीं की जाती हैं या फिर उनके खिलाफ लिखना शुरू कर दिया जाता है, ताकि डर से वे अखबारों को मोटी रकम दे दें. भाजपा नेता लालजी टंडन खुद पेड न्‍यूज के बारे में एक बार शिकायत कर चुके हैं.

पीसीआई ने हिंदुस्तान को पेड न्‍यूज छापने वाले अखबारों की सूची से निकाल दिया है. इससे हिंदुस्‍तान के प्रधान संपादक शशि शेखर खासे प्रसन्‍न हैं. इस पर उन्‍होंने एक लंबा चौड़ा लेख लिख मारा है. साथ ही अपनी पीठ भी खुद ठोंक डाली है. पर सवाल वहीं आकर खड़ा हो जाता है कि बिना किसी पक्ष के पक्षद्रोही हुए कोई भी चुनावों के दौरान ये कैसे साबित कर सकता है कि कौन सी खबर पेड न्‍यूज है और कौन सी नहीं. खैर, आप पढि़ए शशि शेखर का लेख. 


हम खबर छापते हैं, बेचते नहीं

शशि शेखर

‘सांच को आंच नहीं’ -यह कहावत एक बार फिर पूरी आन बान और शान के साथ सच साबित हो गई है। और यह भी प्रमाणित हो गया कि ‘हिन्दुस्तान’ पेड न्यूज नहीं छापता है। दरअसल प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने 14 जनवरी 2013 को अपने एक फैसले में ‘हिन्दुस्तान’ को पेड न्यूज छापने वाले अखबारों की सूची में शामिल किया था। इससे दुखी और क्षुब्ध ‘हिन्दुस्तान’ ने अपने तर्क और साक्ष्य पेश किए थे। जिन्हें काउंसिल ने सही माना और अपना फैसला वापस ले लिया।

आपको याद दिला दें कि ‘हिन्दुस्तान’ ने समय-समय पर सार्वजनिक तौर पर अपनी इस नीति का इजहार किया है कि हम ‘पेड न्यूज’ को मीडिया की निष्पक्षता और स्वच्छता के खिलाफ मानते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और झारखण्ड के चुनावों से पहले मैंने खुद इस संकल्प को अपने पाठकों तक पहुंचाया, ताकि लोकतंत्र के इस महा-उत्सव में हम अपनी जिम्मेदारी का पालन जरूरी पवित्रता से कर सकें।

अंग्रेजी के अखबार ‘द हिन्दू’ ने अपने 29 जनवरी के अंक में जब छापा कि ‘हिन्दुस्तान’ ने 2010 के बिहार चुनावों के दौरान पेड-न्यूज प्रकाशित की तो हमें दुख, क्षोभ और आश्चर्य हुआ था। उन्होंने इसके लिए प्रेस काउंसिल के एक निर्णय का हवाला भी दिया था। आश्चर्य यह कि वस्तुस्थिति जानने के लिए ‘द हिन्दू’ के संपादकीय कर्मियों ने हमसे कोई संपर्क तक नहीं किया। हकीकत इस रिपोर्ट की ठीक उल्टी है। यह इस ताजा फैसले ने साफ कर दिया है। यहां यह बताना जरूरी है कि ‘द हिन्दू’ हमारे सहयोगी अखबार ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ का व्यावसायिक प्रतिस्पर्धी है।

भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष ‘हिन्दुस्तान’ में छपी जिन तीन तथाकथित खबरों को पेश किया गया था वह खबरें नहीं थीं। इन पर स्पष्ट रूप से विज्ञापन, एडीवीटी, मीडिया मार्केटिंग इनीशिएटिव लिखा हुआ था। इनके फांट भी अलग थे। कहने की जरूरत नहीं, इनमें से एक भी ‘पेड न्यूज’ नहीं थी। इन विज्ञापनों की बाकायदा रसीद काटी गई और उन्हें विज्ञापन विभाग ने अपने बही खातों में दर्ज किया। इस पर बाकायदा टैक्स भी अदा किया गया। सभी विज्ञापनों के साथ ऐसा ही किया जाता है। सवाल उठता है – ऐसे में कोई कहे कि मैंने विज्ञापन के लिए ‘हिन्दुस्तान’ अखबार को पैसे दिए तो इसमें किस नियम-कायदे की अवहेलना होती है?

मैं समूची विनम्रता के साथ पाठकों को स्मरण दिलाना चाहूंगा कि ‘हिन्दुस्तान’ ने चुनावों की घोषणा होते ही एक जैकेट प्रकाशित किया था। उस जैकेट में हमने अपने मकसद का खुलासा किया था – ‘हिन्दुस्तान का अभियान – लोकतंत्र: पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए।’ हमने 14 संकल्प भी छापे थे। इसमें पहला संकल्प था- ‘हम पेड-न्यूज प्रकाशित नहीं करेंगे।’ इसी तरह 11 वां संकल्प था- ‘प्रचारक चुनावी विज्ञापनों के नीचे ‘विज्ञापन’ जरूर लिखेंगे।’ 14वां संकल्प था- ‘चुनाव से जुड़े विज्ञापन-सप्लीमेंट में हम ‘मीडिया मार्केटिंग इनिशिएटिव’ का उल्लेख करेंगे।’ तीनों मामलों में हमने अक्षरश: इन संकल्पों का पालन किया। अब आप ही बताइए कि हमने किस आचार-संहिता का उल्लंघन किया? यह तो थी हमारी सार्वजनिक घोषणा। इसके अलावा मैंने अपने सहकर्मियों को दिनांक 12-8-2010 को एक ईमेल भेजा था। इसमें न केवल सभी सिद्धांतों का खुलासा किया था बल्कि यह भी कहा था कि जो सहयोगी इनकी अवहेलना करेगा उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि ‘हिन्दुस्तान’ के पत्रकारों ने पत्रकारिता की मर्यादाओं की हर तरह से रक्षा की।

इसीलिए हम अपने तर्कों और तथ्यों के साथ भारतीय प्रेस परिषद के संपर्क में थे। मैं खुद प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष माननीय मार्कण्डेय काटजू से मिला था। उन्होंने हमें ध्यानपूर्वक सुना और पुनर्विचार का आश्वासन दिया। अंतत: परिषद के माननीय अध्यक्ष और सदस्यों ने हमारे तर्कों पर गौर फरमाया और हमें न्याय मिला। यहां मैं एक बार फिर ‘हिन्दुस्तान’ के इस प्रण को दोहराना चाहूंगा कि हम पेड-न्यूज के खिलाफ थे, हैं और रहेंगे। हम खबर छापते हैं, बेचते नहीं।

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