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‘मिड-डे से निकाले गए एडिटर का बयान पढ़ आंसू आ गए’

: दर्जनों मीडियाकर्मियों की नौकरी चली गयी लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया के किसी भी मंच पर एक लाइन की खबर नहीं : मिडे डे के संपादक दीप हलधर ने अपनी नौकरी जाने की बात जिस तरह से अपनी एफबी वॉल पर लिखी है, पढ़कर आंखों में आंसू आ गए। मेरा मन दहाड़े मारकर रोने का हो रहा है। बहुत कम ऐसे मौके होते हैं, जब अंग्रेजी की पंक्तियों को पढ़कर आंखों में अपने आप आंसू आते हों। आज तो रहा नहीं जाएगा, मैं तो जार-जार रोउंगा। एक-एक पंक्ति पढ़ते हुए हिचकी निकल रही है। हलधर ने लिखा कि उनसे कागजातों पर गलत तरीके से साइन कराया गया और उन्होंने किया। आप भी पढ़िए न, मेरी बात पर आपको यकीन न हो तो…

: दर्जनों मीडियाकर्मियों की नौकरी चली गयी लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया के किसी भी मंच पर एक लाइन की खबर नहीं : मिडे डे के संपादक दीप हलधर ने अपनी नौकरी जाने की बात जिस तरह से अपनी एफबी वॉल पर लिखी है, पढ़कर आंखों में आंसू आ गए। मेरा मन दहाड़े मारकर रोने का हो रहा है। बहुत कम ऐसे मौके होते हैं, जब अंग्रेजी की पंक्तियों को पढ़कर आंखों में अपने आप आंसू आते हों। आज तो रहा नहीं जाएगा, मैं तो जार-जार रोउंगा। एक-एक पंक्ति पढ़ते हुए हिचकी निकल रही है। हलधर ने लिखा कि उनसे कागजातों पर गलत तरीके से साइन कराया गया और उन्होंने किया। आप भी पढ़िए न, मेरी बात पर आपको यकीन न हो तो…

A big thanks to my ex-bosses Abhijit Majumder, Pradyuman Maheshwari and Avirook Sen for taking time out and showing concern for what happened in Midday Delhi. Big hug to my brother Yasser Ali for posting that comment. Very reckless, Yaseerbhai, but feels good. I have been in the game long enough to know how hard it is to be working in the media and still stick your neck out for others. And Jayita Sinha, I am trying to achieve nothing through all this. I am just pissed at the way two editions were shut through an insensitive email. And no one bothered to even address the teams. And then asked to sign an illegal document. There is a way to deal with such sensitive issues. Maybe MiD DAY management needs to watch that George Clooney film Up in the Air!

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मिड डे का ये पहला मौका नहीं है कि जब उसने बेरहमी से संस्करण बंद करके दर्जनों पत्रकारों को सड़क पर ला दिया। साल 2008-09 में हमने सैंकड़ों मीडियाकर्मियों का करिअर और कुछ की तो समझिए जिंदगी ही खत्म होते देखी है। व्ऑइस ऑफ इंडिया चैनल का नाम सुनकर मुझे भोपाल गैस कांड की याद आ जाती है।

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मिड डे के पत्रकार अभी सोच रहे होंगे कि काश वो किसी अखबार/मीडिया संस्थान में काम करने के बजाय किसी फैक्ट्री या चीनी मिल में काम कर रहे होते। कुछ नहीं तो रातोंरात रोजी-रोटी छिन जाने की खबर अखबार और चैनलों में तो आती। गांव-देहात में आस लगायी मां को पता तो चल पाता कि मेरा बेटा बेरोजगार हो गया है, अब लाल इमली इस साल नहीं, अगले साल लेंगे। सच में कितने निरीह हैं हमारे देश के पत्रकार जिनके बेरोजगार होने से लेकर मरने तक की खबर अपने ही मीडिया का हिस्सा नहीं बनने पाती।

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मिड डे का दिल्ली और बैंग्लोर संस्करण बंद कर दिया गया। दिल्ली के संपादक दीप हलधर सहित दर्जनों मीडियाकर्मियों की नौकरी चली गयी लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया के किसी भी मंच पर एक लाइन की खबर नहीं है। यही काम किसी दूसरे सेक्टर में होता तो मीडिया का सरोकार उफान मारने लग जाता। इतना ही नहीं, देश के बाहर के किसी अखबार को लेकर ऐसी घटना होती तो इंटरनेशनल एजेंड़ा, देश-दुनिया और सात समंदर पार जैसे कार्यक्रमों की प्रमुख खबर बनती। मीडिया का सरोकार मीडियाकर्मियों के काम नहीं आता। ठीक उसी तरह नाइकी, रिबॉक के जूते बनानेवाला मजदूर उस जूते को कभी पहन नहीं पाता।.

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विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से साभार

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