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सभी लड़कियों को देखना चाहिए ‘डर्टी पिक्चर’

पिछले दिनों 'राकस्टार' देखा था. फिल्म देखने के बाद कुछ शब्दनुमा डायलाग्स याद रह गए थे. जैसे- जंगली जवानी, गंध मचाते हैं, कुछ गंदा काम करते हैं, चलो दारू पीते हैं… आज के दौर के युवाओं की मेंटलटी और आजकल के प्यार के तौर-तरीके पर बनी 'राकस्टार' में आधुनिकता व आदर्शवाद की खिचड़ी पकाने की कोशिश की गई थी.

पिछले दिनों 'राकस्टार' देखा था. फिल्म देखने के बाद कुछ शब्दनुमा डायलाग्स याद रह गए थे. जैसे- जंगली जवानी, गंध मचाते हैं, कुछ गंदा काम करते हैं, चलो दारू पीते हैं… आज के दौर के युवाओं की मेंटलटी और आजकल के प्यार के तौर-तरीके पर बनी 'राकस्टार' में आधुनिकता व आदर्शवाद की खिचड़ी पकाने की कोशिश की गई थी.

अगर इसी आधुनिकता को 'डर्टी पिक्चर' से कनेक्ट करते हैं तो समझ में आता है कि सच में सिल्क स्मिता नामक साउथ इंडियन एक्ट्रेस अपने दौर में जिस कदर बिंदास और खुले दिल-दिमाग वाली थी, वैसी लड़कियां संभवतः अब कुछ कुछ मात्रा में सामने आ रही हैं. बोलचाल में बिलकुल मुंहफट और हाजिरजवाब. जीवन में बिलकुल प्रैक्टिकल. सफलता हर कीमत पर चाहिए वाले दर्शन को मानने वाली.

बाजारीकरण के दौर में अब देह भी आजाद हो चुका है. पुरुष अगर देह के जरिए आनंद पाता है तो औरत भी आनंद पाने का हक रखती है. लेकिन देह का दर्शन दिल व मन को संतोष नहीं दे पाता. जो अंतरमन को छूने वाला प्यार होता है, उसकी तलाश सभी को होती है. डर्टी पिक्चर में विद्या बालान का अभिनय बेहद सराहनीय तो है ही, नसीरुद्दीन समेत सभी कलाकारों ने अपना अपना पार्ट खूबसूरती से निभाया है. नसीरुद्दीन ने इस उम्र में जितनी शानदार भूमिका एक सफल व बिगड़ैल साउथ इंडिय एक्टर की निभाई है, वह काबिलेतारीफ है.

फिल्म में इश्क सूफियाना गाना सबकी जुबान पर चढ़ने वाला है. इस फिल्म के डायलाग्स इसकी जान हैं. फिल्म देखने पहुंचे दर्शकों के मुंह से बार बार डायलाग्स की तारीफ में वाह वाह निकल रहे थे. इस एडल्ट फिल्म को एडल्ट लोग खूब इंज्वाय इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि काफी डायलाग्स सेक्स के इर्द गिर्द घूमते हैं.

फिल्म देखकर निकलने पर ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि पैसा और वक्त बेकार गया. काफी कुछ सोचने को मिलता है. सफलता, असफलता, इमोशन, सेक्स, देह, दिल, बाजार, मनुष्य, समाज… इन सबके बीच के अंतरद्वंदव देखने वाले के दिल-दिमाग में कई सवाल छोड़ते हैं. जाकी रही भावना जैसी के अंदाज में हर दर्शक अपने लिहाज से इस फिल्म से कानक्लूजन ड्रा करता है.

लड़कियों को इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए. पुरुषों की किसी भी लड़की के कमर में हाथ डालने वाली मेंटलटी को बखूबी उजागर करती यह फिल्म सोचने को मजबूर करती हैं कि हम सब लड़की के सिर पर हाथ क्यों नहीं रखना चाहते. और यह भी कि, कई लड़कियां सफल होने के लिए आंख मूंदकर समझौते करती जाती हैं और आखिर में उनका इस्तेमाल करने के बाद कुंठित समाज के कुंठित मर्द उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं.

साउथ इंडियन एक्ट्रेस सिल्म स्मिता के जीवन पर आधारित इस फिल्म को देखकर एक बार मन में यह भी खयाल आता है कि सिल्म स्मिता के जीते जी उसके देह का इस्तेमाल कर साउथ के फिल्म निर्माताओं ने जमकर पैसा बनाया और अब उसके मरने के बाद उसकी कहानी को दिखाकर इस दौर में भी पैसा बनाने का काम बालीवुड वालों ने कर लिया है. मतलब, जिस चीज से पैसा निकलने की उम्मीद नहीं, वह चीज लाख ठीकठाक होते हुए भी चर्चा और चलन में रहने के काबिल नहीं. यही आज के दौर के बाजार व सिस्टम का नियम भी बन चुका है.

रिपोर्ट : यशवंत सिंह

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