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मुझे भी राहुल देव जी के बारे में कुछ कहना है

Ajai Malik : सभी सुविज्ञजनों से क्षमा याचना करते हुए मुझे भी राहुल देव जी के बारे में कुछ कहना है। सबसे पहले तो यह कहना सही रहेगा कि मेरा अपना कोई परिचय नहीं है, सिवाय एक ऐसे भारतीय के जो हिन्दी और सभी भारतीय भाषाओं का अंध समर्थक है। राहुल देव जी से मेरी मुलाक़ात मुंबई में हुई। मुलाक़ात से पहले ही जनसत्ता में वे मेरे द्वारा किए गए चार फिल्मी हस्तियों के साक्षात्कार छाप चुके थे। फिर रेखा देशपांडे जी ने उनसे मेरी मुलाक़ात कराई थी।

Ajai Malik : सभी सुविज्ञजनों से क्षमा याचना करते हुए मुझे भी राहुल देव जी के बारे में कुछ कहना है। सबसे पहले तो यह कहना सही रहेगा कि मेरा अपना कोई परिचय नहीं है, सिवाय एक ऐसे भारतीय के जो हिन्दी और सभी भारतीय भाषाओं का अंध समर्थक है। राहुल देव जी से मेरी मुलाक़ात मुंबई में हुई। मुलाक़ात से पहले ही जनसत्ता में वे मेरे द्वारा किए गए चार फिल्मी हस्तियों के साक्षात्कार छाप चुके थे। फिर रेखा देशपांडे जी ने उनसे मेरी मुलाक़ात कराई थी।

मैं पत्रकार नहीं था बस एक मित्र के बड़बोलेपन को थोड़ा सा सतह पर लाने के लिए मैंने वे साक्षात्कार किए थे। लगभग चार साल तक साक्षात्कारों का वह सिलसिला चलता रहा, उसके बाद पहला फिल्म समारोह देखने को मिला। राहुल जी ने शिक्षा-मनोविज्ञान पर भी कुछ लेख लिखवाए। इस लिहाज से वे मेरे गुरु हैं। इस दौरान मेरा किया हुआ सिर्फ एक साक्षात्कार ऐसा था जो नहीं छप सका।

आज संघ लोक सेवा आयोग की अँग्रेजी के मुद्दे पर 22 साल पहले टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से संबन्धित उस साक्षात्कार की याद मुझे आती है- साक्षात्कार के दौरान एक विद्वजन ने कहा था- “ बिना अँग्रेजी जाने कोई स्नातक कैसे हो सकता है!!” आज भी कहीं उसकी रिकार्डिंग पड़ी होगी।

एक बार मैंने उन्हें बताया कि लक्षद्वीप में हिन्दी का कोई अखबार नहीं जाता है, उन्होंने कवरत्ती सचिवालय का पता मांगा और वहाँ जनसत्ता भिजवाना शुरू करा दिया। हिंदी की लड़ाई में अकेले उन्होंने जितना साथ दिया अगर उसका एक-एक प्रतिशत भी अन्य लोग देते तो अब तक बहुत कुछ बदल गया होता।

कई मंत्रालयों की हिन्दी सलाहकार समितियों में भी वे रहे और सिर्फ खानापूर्ति के लिए नहीं रहे बल्कि कुछ ठोस मुद्दे उठाते रहे। व्यक्तिगत स्तर पर भी जितना समय, संबल और सहारा मुझ अनजान व्यक्ति को उनसे मिला वह यहाँ नहीं लिखा जा सकता । लगभग साढ़े तीन वर्षों से उनसे मुलाक़ात नहीं हुई है मगर ऐसा नहीं लगता है कि संपर्क कहीं टूटा है। जब भी किसी भी फोन से उन्हें फोन करता हूँ तो नाम बताने की जरूरत नहीं पड़ती, आवाज सुनते ही वे कहते हैं- हाँ, अजय जी … ।

मैं चेन्नई में हूँ और वे दिल्ली में। एक अङ्ग्रेज़ी पत्रकार के रूप में पत्रकारिता शुरू करने वाले राहुल जी हिंदी के समर्थन में हमेशा साथ रहे। कुछ नाम और भी गिना दूँ- रामबहादुर राय जी, मनोज मिश्र जी, लालमणि मिश्रा जी, विष्णु नागर जी …ये ऐसे नाम हैं जो हिंदी के हर प्रयास के न सिर्फ समर्थक रहे हैं बल्कि हिंदी के लिए कुछ भी करने का जज़्बा उनमें रहा है। मेरे लिए राहुल जी एक गुरु, एक मित्र, एक बड़े भाई, एक मार्गदर्शक रहे हैं और हैं।

उपरोक्त टिप्पणी अजय मलिक ने फेसबुक पर की है. टिप्पणी पढ़ने के लिए लिंक यूं है- एफबी पर अजय का कमेंट

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