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विधायकों की गुंडागर्दी (पांच) : विधायिका और पुलिस बल आमने-सामने, मीडिया पर भी प्रहार

मुंबई : पीएसआई रैंक के अपेक्षाकृत छोटे पुलिस कर्मी और गिनेचुने विधायकों के बीच अहम की टक्कर महाराष्ट्र विधानसभा में विधायकों और पुलिस बल के बीच दरार का कारण बन जाएगी, ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी। ऐसा होना भी नहीं चाहिए था। बुधवार और गुरुवार को यही सब कुछ हुआ और देखते-देखते इस द्वंद्व की चिंगारी ने यह अप्रत्याशित घटनाक्रम लोगों तक पहुंचा रहे मीडिया को भी अपनी जद में ले लिया। विधानसभा और विधानपरिषद में दो अलग-अलग मराठी चैनलों के खिलाफ विशेषाधिकार हनन के प्रस्ताव दाखिल ही नहीं हुए, स्वीकार करके कार्रवाई के लिए दोनों सदनों की विशेषाधिकार हनन समितियों के हवाले भी कर दिए गए।

मुंबई : पीएसआई रैंक के अपेक्षाकृत छोटे पुलिस कर्मी और गिनेचुने विधायकों के बीच अहम की टक्कर महाराष्ट्र विधानसभा में विधायकों और पुलिस बल के बीच दरार का कारण बन जाएगी, ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी। ऐसा होना भी नहीं चाहिए था। बुधवार और गुरुवार को यही सब कुछ हुआ और देखते-देखते इस द्वंद्व की चिंगारी ने यह अप्रत्याशित घटनाक्रम लोगों तक पहुंचा रहे मीडिया को भी अपनी जद में ले लिया। विधानसभा और विधानपरिषद में दो अलग-अलग मराठी चैनलों के खिलाफ विशेषाधिकार हनन के प्रस्ताव दाखिल ही नहीं हुए, स्वीकार करके कार्रवाई के लिए दोनों सदनों की विशेषाधिकार हनन समितियों के हवाले भी कर दिए गए।

पूरा दृश्य बदल गया : एक दिन पहले इकट्ठे आकर सभी विधायकों ने एक स्वर से अपने पांच साथी विधायकों को बचे हुए वर्ष तक के लिए निलंबित कर दिया था। एक ही दिन में हालात इतने बदले हुए दिखे कि इस बार सभी दलों के विधायक मिलकर निलंबन की कार्रवाई वापिस लेने के पक्ष में मुखर या मौन स्वीकृति देते नजर आए। विधायकों की पिटाई के कारण 'पीडि़त' मालूम दे रहे घटना के केंद्र बिंदु पुलिस अधिकारी सचिन सूर्यवंशी का खाका 'विलेन' के तौर पर खींचा जाने लगा। इस अधिकारी के पक्ष में बोलने वाले वरिष्ठ आईएएस अफसरों पर निशाना साधा जा रहा था। पूरी विधायिका को धमकाने, डराने और दबाने के आक्षेप ने एक बार तो कुछ देर के लिए ही सही, उनकी भी सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी होगी। महाराष्ट्र के पुलिस डीजीपी संजीव दयाल, पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह के नेतृत्व में पुलिस के आला अफसरों की फौज अपने बल के सबसे छोटे अफसर के लिए सरकार से न्याय मांगने पहुंची थी।

कल का पीडि़त, आज का विलेन : कानून बनाकर न्याय-व्यवस्था की चौखट तय करने का अधिकार विधायकों को हैं, इन कानूनों का पालन ठीकठाक तरीके से किया जाए यही निर्धारित करना भर तो पुलिस का काम है। बुधवार को 'घायल' पुलिस अधिकारी सूर्यवंशी के अस्पताल जाने के बाद दर्जन भर से ज्यादा विधायकों पर कार्रवाई की तलवार लटक रही थी। स्पीकर और मुख्यमंत्री के केबिन में कैसे खुद को बचाने के लिए विधायक किसी तरह रोए-गिड़गिड़ाए, इसका वर्णन खुद सत्ताधारी विधायकों ने विधानसभा को सुनाया। भावुक, आवेशपूर्ण, आक्रामक तेवर में दिया गया एकाध भाषण मर्यादा के उल्लंघन की सीमा छूता, तो भी उनको शायद इसका आभास न होने पाता!

इसका समर्थन तो नहीं किया जा सकता : मामूली ट्रैफिक नियमों के पालन को लेकर उठे विवाद के बाद पुलिस अफसर पर लात-घूसें बरसाने वाले विधायकों के कृत्य का समर्थन कतई नहीं किया जा सकता। विधानभवन परिसर से विधायकों को गिरफ्तार करने के दृश्य मीडिया को परोसने के पुलिस के 'जिद' भरे संकल्प को औचित्य, नैतिकता और संयम के कौन से मानक पर सही ठहराया जा सकता है? शायद पुलिस-प्रशासन और विधायकों, दोनों को ही धीरज और संयम बरतने की जरूरत है। इस टकराव से उभर रही खबरों को सनसनी से दूर रखते हुए कार्यपालिका, विधायिका और प्रशासन के सम्मान के साथ खिलवाड़ न करने की जिम्मेदारी से अखबार और चैनल भी अपना हाथ नहीं खींच सकते! (एनबीटी)

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