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शर्मनाक! अपराधी अभिनेता के पक्ष में उतरे मीडिया घराने और काटजू

21 मार्च 2013 की सबसे बड़ी खबर आप से पूछी जाये तो जबाब 1993 में मुम्बई बम विस्फोटों का सुप्रीम कोर्ट के द्वारा न्याय सुनाना होगा। पर हमारे देश के सभी मुख्य मीडिया घरानों ने एक व्यक्ति विशेष के हृदय परिवर्तन को ध्यान में रखकर डीबेट और बाइलाइन दर्शकों और पाठकों को पेश कर दी। किसी भी जिम्मेदार पत्रकार ने 1993 में मुम्बई बम विस्फोटों के मृतकों का जिक्र तक नहीं किया यहां तक पीड़ित की कोई चर्चा भी किसी मीडिया हाउस ने नहीं की। जो मेरी नजरों में मीडिया घरानों के लिये शर्म की बात है।

21 मार्च 2013 की सबसे बड़ी खबर आप से पूछी जाये तो जबाब 1993 में मुम्बई बम विस्फोटों का सुप्रीम कोर्ट के द्वारा न्याय सुनाना होगा। पर हमारे देश के सभी मुख्य मीडिया घरानों ने एक व्यक्ति विशेष के हृदय परिवर्तन को ध्यान में रखकर डीबेट और बाइलाइन दर्शकों और पाठकों को पेश कर दी। किसी भी जिम्मेदार पत्रकार ने 1993 में मुम्बई बम विस्फोटों के मृतकों का जिक्र तक नहीं किया यहां तक पीड़ित की कोई चर्चा भी किसी मीडिया हाउस ने नहीं की। जो मेरी नजरों में मीडिया घरानों के लिये शर्म की बात है।

हमारे देश के कानून में कोई छोटा बड़ा नहीं है अर्थात संवैधानिक कानून सभी के लिये बराबर है। वहीं टाडा जैसे देश विरोधी कानून में पहले दोषी पाये गये और बाद में दोष मुक्त किये गये पूर्व खेल मंत्री और अभिनेता स्व0 सुनील दत्त के बेटे संजय दत्त भी गैर कानूनी ढंग से इसमें संलिप्त पाये गये। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 257 निर्दोष लोग इन विस्फोटों मे मारे गये। साजिश रचने वालों में दाऊद इब्राहिम, दाइगर मेमन, याकूब मेमन, रुबिना मेमन, युसुफ मेमन जैसे संदिग्धों की संलिप्पतता थी। संजय दत्त के पास से 1993 में प्रतिबंधित एके 56 राइफल और एक पिस्टल बरामद किया गया था। जिन्हें विस्फोटों को अंजाम देने वाले लोगों ने अभिनेता को ये सब उपलब्ध कराया था।

93 में संजय दत्त महीनों अखबारों की सुर्खियों में रहे थे। प्रतिबंधित हथियार रखने के आरोप में उस समय प्रभावी टाडा के तहत मामला दर्ज कर जेल भेज दिया गया। लगभग डेढ साल तक संजय जेल में रहा। बाद में जेल से निकले के बाद संजय दत्त ने पीआर यानि जनमानस में अपनी छवि सुधारने के लिये फिल्मी और जमीन स्तर पर कई कार्य किये। उनमें कई तरह की सुपरहिट फिल्में और चुनावों के दौरान सपा सहित कई पार्टियों के लिये उम्मीदवारों के लिये चुनावी सभा में हिस्सा लेना शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार 21 मार्च बारी-बारी से दोषियों को सजा सुनाना आरंभ की। मीडिया चैनलों के कई कानूनी जानकार पत्रकार कोर्ट परिसर से पल पल की जानकारी ऑन एयर कर रहे थे। अधिकतर संजय दत्त के विषय में अधिक व्याकुल थे, कोई भी 20 साल में उन लोगों के दर्द की चर्चा बिल्कुल नही कर रहा था, जिन्होंने अपनी जान गंवाई और जिनमें सगे संबंधी अब किस हाल में है, इसकी भी कोई चर्चा नही हो सकी।

टीआरपी और बालीवुड कनेक्शन के कारण लगभग सभी इलेक्ट्रानिक चैनल संजय दत्त की 5 साल की सजा से दुखी लगे। बड़े अफसोस की बात है कि कई प्रतिष्ठित चैनलों के पत्रकार अपराधी संजय दत्त के मुम्बई स्थित बंगले पर सुबह से ही डंटे थे लेकिन जिन्होंने अपनी जान गवाई उनकी आवाज देश का पहॅुचाने वाला कोई नहीं था। 24 घंटे सच दिखाने का दावा करने वाले सभी न्यूज चैनल संजय दत्त के जुड़वा बच्चों, नई पत्नी और उनके फिल्मों के चर्चा पर केन्द्रित हो गये। कोई वरिष्ठ टीवी वक्ता सांसद बहन के आसुंओं की चर्चा कर रहा था, कोई संजय दत्त के हृदय परिवर्तन की चर्चा, तो कोई नयी शादी की दुहाई दे रहा था। मैं लगभग सभी चैनलों को बारीकी से देखा सभी का एक ही रुख था।

सवाल यहां यह है कि टीवी न्यूज चैनलों की जिम्मेदारी यही है कि एक सुप्रीम कोर्ट से सजा पाये अपराधी का दिन भर सिम्‍पैथी करना और बार बार आदेश पर सवाल उठाना। मुझे यह कहने में कोई संकोच नही हो रहा है कि खास तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने जाने अनजाने एक सजायफता अपराधी को इतना तवज्जो दिया। पत्रकारिता से जुड़े लोगों को निष्पक्ष होकर लोगों की बातों को देश के सामने रखना चाहिये। अतएव मुम्बई ब्लास्ट में 1993 में मारे गये लोगों के पीड़ितों का ध्यान रखना भी मीडिया की जिम्मेदारी थी। जिसे पूरी निगलेक्‍ट कर दिया गया। अगर मैं संजय दत्त के बारे में और अधिक तथ्य परक बातें रखूंगा तो मैं भी अन्य मीडिया घरानों की पंक्ति वाला बन जाउंगा। ईश्वर बम धमाकों गुजरे लोगों की आत्मा को शांति दे।

राहुल त्रिपाठी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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